मधेशी नेता सरकार से दूर रहें : मधेशी बुद्धिजीवियों की चेतावनी

जनमत की राय : प्रस्तुति : विजेता चौधरी

२,अगस्त, काठमांडू |कांग्रेस तथा माओवादी केन्द्र के गठबन्धन में बनने वाली नई सरकार में मधेसवादी दल, मधेसी मोर्चा का अभी जाना व शामिल होना क्या सही सावित होगा ? इस सवाल के जवाव में बुद्धिजीवी जनमत की राय कुछ इस प्रकार हैं –

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सरकार में जाने से दबावशक्ति घट जाएगी, सत्ता से बाहर रहना ही उचित ः दीपेन्द्र झा

दिप्रन्द्र झा

दिप्रन्द्र झा

दिपेन्द्र झा, अधिवक्ता, मानवाधिकारविद, काठमाण्डू |

सीमांकन, नागरिकता तथा संविधान संशोधन का मुद्दा पूरा नहीं हुआ है । विगत में भी हुए समझौतों को कार्यन्वयन नहीं किया गया इसी लिए मधेसी दल को अभी सरकार में नहीं जाना चाहिये ।

अभी सरकार में जाने से दबाव शक्ति पूर्णतः घट जाएगी, दबाव नही पडेÞगा । इसीलिए सत्ता से बाहर रह कर ही दबाव श्रृजना करने का कार्य करना आवश्यक है ।

जनता की अपेक्षा भी यही है, वर्षो आन्दोलन हुआ, बहुत सारे शहादत हुए, विगत में भी समझौता किए गए मुद्दा वा एजेण्डा में से एक भी अगर सम्बोधन हुआ होता तो अभी की स्थिति को अवसर या मौका कहते । अब फिर से समझौता करके सरकार में नहीं जाना चाहिये ।

अभी सरकार में जाने से ये प्रमाणित हो जाएगा की मधेसवादी दल अवसरवादी है : डा.सुरेन्द्र लाभ

सुरेन्द्र लाभ

सुरेन्द्र लाभ

डा.सुरेन्द्र लाभ, वरिष्ठ साहित्यकार, प्राध्यापक, जनकपुरधाम |

मधेसवादी दल अभी अगर सरकार में जाती है तो फिर से एकबार बदनामी की राह पर चलेगी । इस से ये साबित हो जाएगा की ये दल अवसरवादी हैं । सवाल सरकार में शामिल होने का नहीं सवाल मधेस मुद्दा का, संवोधन का तथा संविधान संशोधन का है । और ये तभी संभव है जब दो तिहाई बहुमत कायम होगा । जो सरकार में जाने से प्राप्त नहीं किया जा सकता है । इस के लिए बाहर से ही दवाब श्रृजना किया जाना चाहिये । प्रतिपक्ष में रह के भी मुद्दे के लिए कार्य किया जा सकता है ।

यद्यपि दो तिहाइ बहुमत के लिए एमाले का सहयोग प्राप्त करने के तरफ भी नेताओं का ध्यान केन्द्रित होना चाहिये । एमाले के समर्थन बिना सरकार में जाने से भी मधेसी समस्याओं का समाधान नहीं किया जा सकता है । बहरहाल मधेसवादी नेताओं के लिए ये अवसर वार्गेनिङ्ग करने का तथा अपना रणनीतिक कौशल व क्षमता दिखाने का समय है ।

वैेसे अगर विगत का इतिहास देखें तो मधेसवादी दल सरकार में जाने के लिए हमेशा आतुर रहती है, ये सर्वविदित है, यद्यपि अभी का समय जल्दवाजी के साथ सरकार में सहभागी होने का नहीं है । मधेस के नेताओं को राजनेता की भूमिका में आना होगा तभी जनमत का विश्वास प्राप्त किया जा सकता है । सरकार में जाने से नेता का फायदा होगा जनता का नहीं । जनता अब समस्याओं का सामाधान चाहती है । हर समय अशान्ति नही,ं शान्ति व सुशासन चाहती है । जनता विकास खोज रही है ।

सरकार में नहीं जाना चाहिये ये आन्दोलन का कोई सेफ लैण्डिगं नहीं होगा ः चन्द्रकिशोर

 

चन्द्रकिशोर

चन्द्रकिशोर

चन्द्रकिशोर, राजनीतिक विश्लेषक, पत्रकार–साहित्यकार, वीरगंज

सरकार में जाना आन्देलन का सैफ लैण्डिगं नही है इसीलिए मेरे विचार में मधेसवादी दलों को सरकार में नही जाना चाहिये । मधेसी जनता सदैव मधेसी मुद्दों के साथ रहें हैं । जब भी मधेसी नेता मधेस का मुद्दा लेकर उठते हैं मधेसी जनता साथ हो जाती है । जनता की अपेक्षा आन्दोलन का सार्थक विकास है । अगर अब मधेसी दल वा नेता मधेसी मुद्दों के साथ नही चलते तो जनता उनसे दूर हो जाएगी ।

बहरहाल दल के भीतर अभी दो दबाव हैः सरकार में जाया जाय या नहीं तथा समर्थन की समीक्षा । यद्यपि आन्दोलन से नेतृत्व स्थापित नहीं हुआ है इसीलिए ये मौका है उन्हें सरकार में जाने दिया जाए ।

वृहत्तर जनता की सोच है अभी सरकार में नहीं जाना उचित होता । बाहर से ही दबाव सृजना करना चाहिये ।

वैसे तो दलों व नेताओं को खिड़की के रास्ते से सरकार में जाने की छूट है ।

 

 

 

 

 

 

विगत के लिखित समझौते कभी पूरे नही हुए हैं, सरकार में अभी जाना श्रेयस्कर नहीं होगा ः रीता साह

रीता शाह

रीता शाह

रीता साह,लेखिका. महिला अधिकारविद, काठमाण्डू |

विगत में भी लिखित समझौता व सहमति हुआ और मधेसी दल सरकार में गई लेकिन मुद्दा सम्बोधन नहीं हुआ और दूसरा मधेस आन्दोलन करना पड़ा । इसीलिए माँग पूरा नहीं होने तक सरकार में जाना श्रेयस्कर नहीं है । मधेसी आम जनता भी यही चाहती है । फिर से समझौता करके सरकार में गई तो माँग पूरा नहीं होने की आशंका है लोगों में ।

अभी दलों के लिए मौका व चुनौती भी है । मौके को कैसे रणनीतिक रुप में ले जाएँ इस बात का गृहकार्य करना आवश्यक है । क्योंकि कांग्रेस व माओवादी के मात्र चाहने पर भी संविधान संशोधन नही हो सकता । दो तिहाई का बहुमत चाहिये । इसीलिए सभी दलों को मिलकर एमाले की सहमति प्राप्त करना आवश्यक है ।

 

 

 

 

 

 

 

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