मधेशी पत्रकारों द्वारा अब तक का सबसे बडा अनशन

हिमालिनी प्रतिनिधि
काठमांडू । वैसे तो नेपाल में मधेशी नेता मधेशी जनता, मधेशी राजनीतिक दल और मधेशी पत्रकारों को हमेशा से ही विखण्डवादी कहने का चलन इस देश में रहा है। लेकिन वास्तव में देखा जाए तो कभी भी किसी मधेशी नेता, मधेशी जनता, मधेशी संचारगृह या मधेशी पत्रकारों ने खुद से विखण्डन की बात नहीं की है। लेकिन मधेशी विरोधी मानसिकता से ग्रसित संचारमाध्यमों के गतिविधियों ने मधेशी को विखण्डन की बात सोचने पर मजबूर कर देती है। मधेशी के साथ इस देश में जिस तरीके से व्यवहार किया जाता है उससे एक्खतरनाक मनःस्थिति मधेश के युवाओं में पनपने लगा है। और वह यह है कि नेपाल के साथ रह कर कभी भी उन्हें सम्मान नहीं मिल सकता है। देश में विखण्डन की स्थिति पैदा करने में नेपाल की तथाकथित मीडिया घराना और देश के स्वघोषित राष्ट्रीय तथा वरिष्ठ पत्रकार काफी अहम भूमिका निर्वाह कर रहे हैं। जिस तरिके से नेपाल की तथाकथित राष्ट्रीय मीडीया में मधेश, मधेशी मुद्दा और मधेश के सवालों के बारे में प्रस्तुति दी जा रही है उसे देश तेजी से विखण्डन की ओर बढता दिखाई दे रहा है।
इसी भयावह स्थिति को रोकने और राष्ट्रीय एकता तथा देश की भौगोलिक अखण्डता को कायम रखने के लिए और विखण्डन की ओर बढ रही देश के प्रति सरकार और बुद्धिजीवी वर्ग को सचेत करने के लिए मधेशी पत्रकारों ने यह बीडा उठाया है। काठमाण्डू के मधेश मीडिया हाउस में पिछले १५ दिनों से लगातार अनशन कर शान्तिपर्ूवक तरीके से सचेतना फैलाने का काम कर रहे हैं। मधेशी पत्रकार समाज के नेतृत्व में हो रहे इस अनशन में मधेशी पत्रकारों के लिए कार्यरत तीन दर्जन से अधिक संघ संस्थाओं के संयुक्त अभियान के रूप में चल रहा यह अभियान साबित करता है कि राष्ट्रीय एकता और भौगोलिक अखण्डता के लिए समय रहते सचेत नहीं होने पर इसके दुष्परिणाम से कोई भी अछुता नहीं रहेगा। मधेश का खुद को ठेकेदार समझने वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मधेशी मोर्चा से आबद्ध दल हों या फिर किसी ना किसी रूप में सत्ता के र्इद गिर्द रहे अन्य मधेश केन्द्रित दल जिस समय दलों और नेताओं के लिए सत्ता में टिके रहना ही र्सवाेपरि लग रहा है ऐसे में मधेशी पत्रकारों के द्वारा चलाए जा रहे इस शान्तिपर्ूण्ा तथा अहिंसक आन्दोलन धीरे धीरे ही सही लेकिन आम मधेशी जनता के मानस पतल को छु रहा है।
कहने के लिए तो इस अनशन में अब तक करीब सभी राजनीतिक दल, सरकार में शामिल सभी मधेशी मंत्री, मधेश केन्द्रित दल के प्रमुख, नागरिक समाज, पत्रकारों के सभी संगठन, बुद्धिजीवी वर्ग, छात्र युवा सहित सभी वर्गाें का र्समर्थन मिल चुका है। लेकिन इस आन्दोलन के जरिये उठाए गए जायज मांगों के प्रति सरकार के कर्मचारियों की उदासीनता और सरकार में शामिल मधेशी मंत्रियों की गैर जिइम्मेवार रवैये से आन्दोलन और अधिक सशक्त और कडा होते जा रहा है। मधेशी को सिर्फएक क्षेत्रीय मुद्दा मानने, समावेशी शब्द का रट लगाने लेकिन उसे व्यवहार में नहीं उतारने, मधेश को उसका जायज अधिकार तक देने के लिए तैयार नहीं होने, मधेश के प्रति हमेशा ही नकारात्मक रूख अपनाने के विरोध में यह आन्दोलन चल रहा है। आन्दोलनरत पत्रकार चाहते हैं कि इस ऐतिहासिक बदलाव की शुरूआत संचार माध्यमों से ही किया जाए। आन्दोलन के बाद मीडिया ही एक ऐसा क्षेत्र है जो कि समाज में बदलाव लाने की कुव्वत रखता है। इस देश को विखण्डन से बचाना है तो तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया को अपने आचरण अपने सोच और मानसिकता में बदलाव लाना ही होगा। यदि समय रहते मधेश को देखने के नजरिये और मधेश को सोचने की मानसिकता में बदलाव नहीं आया तो फिर इस देश को भौगोलिक विखण्डण से कोई भी नहीं रोक सकता है। आन्दोलनरत मधेशी पत्रकारों ने इस प्रतिअभी से ही संबंधित पक्ष को आगाह करने के लिए जो ६ पन्नों का दस्तावेज तैयार किया है उसमें उस भयावह स्थिति की ओर साफ संकेत कर दिया गया है कि यदि मीडिया घरानों ने अपनी सोच और अपने व्यवहार में बदलाव नहीं लाया तो वह दिन दूर नहीं जब खुद को राष्ट्रीय संचारगृहका प्रतिनिधि कह कर रोब झाडÞने वालों को मधेश से खदेडÞ दिया जाए, राष्ट्रीय संचार माध्यम का ढोंग करने वाले अखबार आग के हवाले कर दिए जाएं, उनकी गाडियों को जला दिया जाए। इस भयानक स्थिति के कल्पना मात्र से आने वाली परिस्थिति का बखुबी आकलन हो जाता है।
मधेश के साथ किस कदर सरकारी और निजी क्षेत्र के संचार माध्यमों में विभेद किया जाता है कि एक दर्जन से अधिक टीवी चैनल और चार दर्जन से अधिक एफ स्टेशन हो या फिर दर्जन भर अखबार सभी को जोड लिए जाने पर भी मधेशी, दलित, जनजाति और अन्य पिछडा वर्ग का समुचित समावेशी नहीं है। यह अत्यन्त ही दुखद स्थिति है। इसे तत्काल दूर करना सभी संचारगृह के संचालकों का कर्तव्य है तो सरकार को तत्काल इसके लिए आन्दोलनरत समूह के मांगों को मान कर ठोस कदम उठाना चाहिए। यदि इस काम में देरी हुआ तो आने वाले अनिष्ट से देश को कोई नहीं बचा सकता है।  वैसे तो सूचना तथा संचार मंत्री राजकिशोर यादव ने आन्दोलनरत मधेशी पत्रकारों का संज्ञान लेते हुए उन्हें वार्ता में भी बुलाया था। खुद अनशन स्थल पर पहुंचे संचार मंत्री यादव ने इस भेदभाव के बारे में सब कुछ जानते हुए भी वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति का हवाला देते हुए अपनी मजबूरी दिखाई थी। फिर भी उन्होंने इस बारे में संचार गृहों के मालिकों को बुलाकर विचार विमर्श भी किया और उन्हें तत्काल मधेशी पत्रकारों की चिन्ता से अवगत कराया। अगले ही दिन संचार मंत्री के ही प्रयास से आन्दोलनरत मधेशी पत्रकारों को वार्ता के लिए बुलाया गया वार्ता भी हुआ लेकिन सरकारी कर्मचारियों की मधेश विरोधी मानसिकता उस वार्ता में भी हावी हो गई और मंत्री के लाख चाहने पर भी कोई परिणाम नहीं निकल पाया। नियम कानून ऐन का पाठ पढा कर सरकारी कर्मचारी मंत्री को तो घुमा सकते हैं लेकिन उसी नियम कानून और ऐन के भीतर ही रात दिन खेलने वाले पत्रकारों को घुमा देना आसान नहीं हुआ सरकारी कर्मचारियों के लिए। अनशन स्थल पर आकर बडी बडी बात कहने और इस मांग के बारे में मंत्रिपरिषद की बैठक में र्समर्थन करने की बात कहने वाले मधेशी दल के नेताओं की भी पोल खुल गई। माओवादी के साथ बैठक में महेन्द्र राय यादव के अलावा और किसी ने कुछ भी नहीं कहा। इसी तरह मोर्चा की बैठक में तमलोपा के अध्यक्ष महन्थ ठाकुर द्वारा मुद्दा उठाने पर भी अन्य नेताओं ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन आने वाले दिनों में मधेश के प्रति इमानदारी करने वाले और मधेश के साथ गद्दारी करने वालों दोनों की समीक्षा होगी।

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