मधेशी पार्टी चुनाव में जाये तब और ना जाय तब भी चुनाव होना पक्का है : कैलाश महतो

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मधेशी पार्टियों के एकीकरण से मधेश में राजनीतिक शुन्यता का संकेत
कैलाश महतो, पराशी, १५ मई |
अभी मधेश में मधेशवादी पार्टियों के बीच हुए एकीकरण की चर्चा ने अच्छा खासा स्थान बनाया है । पार्टी एकीकरण के विषय पर मधेश में दो प्रकार की चर्चा व्याप्त हैं । पहला यह कि इसकी आवश्यकता थी और अब मधेश की राजनीति मजबूत होने की अनुमान है तो वहीं दूसरी तरफ कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मधेश की राजनीति में अब और ज्यादा अस्थिरता और वैमनस्यता शुरु होना पक्का है ।

वैसे पार्टी टुटना फुटना कोई अप्रत्यासित घटना नहीं है । दुनियाँ के बहुत सारे पार्टिंयों में ऐसी घटनायें घटती रहती है । एक परिवार भी टुटफुट का शिकार होता है । मगर उसका एक अवस्था होता है । परिवार में बच्चे जब बडे हो जाते हैं, शादी विवाह के बाद उनकी रुची और आवश्यकताओं में बदलाव आने लगते हैं तो एक ही परिवार के लोग अलग अलग घर और संसार बना लेते हैं जो प्राकृतिक है । मगर मधेशवादी दलों में विखराव होने का इतिहास बिल्कुल अप्रत्यासित और अस्वाभाविक रहा है । उनके बीच में टुटफुट होना केवल सत्ता स्वार्थ और एक दुसरे के साथ रहे आर्थिक प्रतियोगिता ही रही है, मधेश के मुद्दों का सही समाधान नहीं ।

मधेशवादी पार्टियों के बीच दर्जनों टुटफुट और गुट उपगुट के बाद एकीकरण की पगडण्डी उस अवस्था में निर्माण हुआ है जिस अवस्था में उनके पास आन्दोलन करने, शहीद बनाने, सम्झौते करने और चुनाव में जाने के अलावा दूसरा तीसरा कोई विकल्प ही नहीं है । मधेशी पार्टियाँ चुनाव में जाये तब भी चुनाव होना है और न जाने का नाटक करे, तब भी चुनाव होना पक्का है । हकिकत में मधेशी नेताओं ने अपने कुकृत्य के कारण मधेश को राजनीतक दरिद्र, पर निर्भर और अवसरहीन बना दिया है ।

नेपाली शासन की भाषा, नेपाली पार्टियों की तमाशा और निर्वाचन आयोग की दिलासा यही संकेत करता है कि मधेशवादी पार्टियाँ लाख ना नुकुर कर लें, उससे कोई पर्क पडने बाला नहीं है । नेपाली शासन यह नहीं जानता है क्या कि मधशी पार्टियाँ चिल्लाती रही, हमने उसके मतों को अपने बक्से में डाल लिया । मधेश आन्दोलन करता रहा और हमने संविधान बना डाला । मधशी नेता धम्की देता रहा और हम उसके ही मतों से बारम्बार प्रधानमन्त्री बनते रहे । मधेश आन्दोलन सालभर तक चलता रहा और उन्हीं मधेशी नेताओं से सारे आवश्यक वस्तुएँ मँगवाते रहें ।

दरअसल बात यह है कि चुनाव वहिष्कार करने की औकात किसी मधेशी पार्टी या मोर्चा के पास है ही नहीं । करे भी तो नेपालियों को कोई घाटा नहीं है । जो भी घाटे होने हैं, वे सारे मधेशी मोर्चा के हिस्से में आने बाले हैं । मधेशी पार्टियों के बीच हुए एकीकरण से भी मधेश को कोई लाभ नहीं हो सकता ।

कुछ विश्लेषकों का मानना यह है कि मधेशी पार्टियों का एकीकरण के पिछे भी नेपाली खसवादी लोगों का ही हाथ और रणनीति है । राजनीतिक संकट और नैतिक जाल में फँसे मधेशी मोर्चा को राह दिखाने का काम भी उन्हीं नेपाली नेताओं ने सुझाया है कि मधेश आन्दोलन के नाम पर शहीद हुए लोगों के परिवार और मधेश के सहानुभूति कायम रखने के लिए एकीकरण का एक भ्रम जाल फेको ता कि आम मधेशी समुदाय के लोग मोर्चा या एकीकृत पार्टियों पर कोई चार्ज न लगा सके । मधेशी खुश हो जाये और नेपाली सरकार, नेपाली पार्टियाँ और उसके उद्देश्य एक तरफ पूरा होजाये तो दूसरी तरफ मधेशी दल चुनाव में बाधा डालने से पिछे हट जाये ।

सोचनीय बात यह है कि दर्जनों पार्टियों के शक्ति से संचालित मधेश आन्दोलनों को नेपाली राज्य ने जब कोई अहमियत नहीं दिया तो नाम मात्र के पार्टियों के एकीकरण से सरकार और नेपाली मानसिकता डर कैसे मान लेगी ? क्या वे यह नहीं जानते कि इनके एकीकरण से भी फायदे नेपाली शासन को ही होना है ?

और सबसे गंभीर रणनीति नेपालियों का यही है कि मधेशी दलों में पहले एकता कराओ और फिर बाद में इन्हें फोड डालो । और नेपालियों का यह रणनीति पूर्णतः सफल होना है, क्यूँकि अलग अलग पार्टी बनाये हुए कमजोर मधेशी नेताओं को भी रोटेशन के क्रम में सरकार और सत्ता में जाने और मौज मस्ती करने का अवसर मिल जाते थे । लेकिन अब तो सिर्फ मजबूत और बडे कहे जाने बाले नेताओं को ही वह अवसर मिलने का ज्यादा गुंजायस रहेगा तो मन्त्री बनने के लिए पार्टी फोडने बाले नेता क्या सन्यासी होकर बैठेंगे ? एकीकरण से पहले पार्टी अध्यक्ष बनकर रहे नेताओं को जब अवसरों से पिछे हटना पडे तो वे क्या चूप रहेंगे ? बडे छोटे पार्टियों के दूसरे तीसरे स्तर के नेता केन्द्र से लेकर जिला स्तर तक मौन धारण कर पायेंगे ?

एकीकृत पार्टी पूनः टुटेगी और मधेशी जनता में मधेशवादी पार्टी तथा नेतृत्वों पर आक्रोष का सुनामी आयेगी, मधेशी जनता उनपर विश्वास करना छोडकर नेपाली पार्टियों के प्रति ही समर्पित होगी और नेपालियों का मधेश पर अन्तहीन शासन पसर जायेगा ।

मधेशवादी पार्टियों के बीच हुए एकीकरण वास्तव में एकीकरण नहीं, एक सोचा समझा विकृतिकरण है जिसमें नेपाली शासकों का लम्बा राजनीतिक रणनीति और मधेशवादी पार्टियों का मजबुरी है । मधेश के साथ धोखा और राजनीतिक प्रतिशोध ही है जिसमें मधेशियों का सर्वनाश होना तय और मधेश पर नेपालियों अन्तहीन राज्य और शासन होना निश्चित है । इन सारे झमेलों से पार होने का एक ही स्थायी उपाय है ः मधेश से औपनिवेशिक नेपाली राज्य का खात्मा और मधेश देश की पूनस्र्थापना ।

 

 

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