मधेशी मोर्चा आतंककारी है- ईश्वर पोखरेल, देख मधेशी देख, तेरा हाल क्या है !

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कैलाश महतो , परासी. फाल्गुन २७ गते | (रि–मिक्स बातें), फाल्गुण २६ गते के दिन में मैं एक सार्वजनिक बस में सफर कर रहा था पूर्वी मधेश के इटहरी में । उस बस में एक सीट पर बैठे मधेशी से दो नेपालियों ने सीट छोडने को कहा । जबाव में मधेशी ने कहा कि वो दूर लहान से ही सिट पर बैठा है तो क्यूँ छोडे ? नेपालियों का जबाव रहा, “ऐ मूजी, तेरो घर कहाँ ? इण्डिया हैन ? तिमीले बसी सक्यौ । अब हाम्लाई बस्न दे ।” बेचारा वो प्रतिवाद करते हुए सीट को छोड दिया, जिसपर एक नेपाली बैठ गया ।
कुछ देर बाद फाल्गुण २३ को राजबिराज में घटे एमाले और मधेशी मोर्चा घटना का जिक्र उन्हीं लोगों ने शुरु किया । उस मधेशी के पूर्व सीट के बगल में ही बैठ रहे एक नेपाली ने कहा, “अब हाम्रो गोर्खाली दाइभाइहरु यी मूला मधेशीहरु विरुद्ध मैदान मा उत्रि सके । नेपाल सरकारले अब गोर्खाली सिपाहीहरुलाई पूरा अधिकार दिनु पर्छ साले धोतीहरु लाई तह लगाउन । केही हजार भारतीय साला मदिसे फटाहाहरुलाई हान्ने हो भने सारा बबालै खत्तम हुन्छ ।” सीट से उठाया गया वो मधेशी तो कुछ बोलने से रहा, मैं खुद बेचारा खामोश बैठकर उनकी बातें सुनता रहा । प्रतिवाद करने की हालात ही नहीं थी । बस में उनकी ही संख्या जो थी । सब उनके ही बातों में हामी भर रहे थे ।
सन्ध्या के ६ः३० बजे News24 TV च्यानल पर एमाले के महासचिव ईश्वर पोखरेल ने अपने अन्तवार्ता के क्रम में एक प्रश्न का जबाव देते हुए कहा कि पुलिस गोली चलाने को बाध्य इसलिए हुआ क्यूँकि मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने प्रहरियों पर ४०–५० बम प्रहार किए । कोई भी समान्य से भी सोंच के आदमी यह सबाल खडा कर सकता है कि उतने सारे बम प्रहार के बावजुद प्रहरियों के किसी सदस्य का उन बमों से एक बाल भी बांका नहीं हो पाना आश्चर्य की बात नहीं तो क्या है ? क्या नेपाली प्रहरियों ने बम प्रूफ शरीर बना ली है ? वहीं पर प्रहरियों के बन्दुकों से मधेशियों के शर छलनी होकर सारी इन्द्रियाँ बाहर हो जाती हैं, छातियाँ चिर जाती हैं और पेट फट जाता हैं ।
एक दूसरे प्रश्न के उत्तर में पोखरेल कहते हैं कि एमाले मधेश में राष्ट्रिय एकता, राष्ट्रिय हित तथा विकास आदि अभियानों को लेकर मेची महाकाली राष्ट्रिय एकता जागरण करने चला है जो मधेशी मोर्चा से संभव नहीं है । मधेश का विकास ही एमाले का लक्ष्य है ।
मैं एमाले का ही पूर्व कार्यकर्ता होने के नाते इतना तो मुझे पूर्ण ज्ञान है कि एमाले के ज्ञान कुण्डली से कहीं ज्यादा अच्छा कौरवों का अत्याचार मण्डली हो सकता है । मधेश के सारे आय, अवसर, योजना और भावना तथा संस्कृतियों को लुटने और बलत्कार करने के आलावा वैदेशिक रोजगारी के रेमिट्यान्स से आने बाले ७ खर्ब ३३ अर्ब रुपयों में से मधेश के विकास के लिए कितने प्रतिशत् मधेश को दिए जाते हैं ?

तीसरे प्रश्न के उत्तर में पोखरेल जबाव देते हैं कि ओली के “माखे साङ्गलो” बाले बात को मधेशी मोर्चा ने समझ ही नहीं पाया है । पोखरेल के अनुसार माखे साङ्गलो का तलब होता है–एक वह डोरी जिसमें किसी चीज को कसकर बाँधकर रखा जाता है ।

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जिस मधेशी ने ओली और पोखरेल जैसे भूखे पेट को रोटी, नङ्गे वदन को वस्त्र और बेहाल अनपढ प्राणियों को शिक्षा दीक्षा देकर आज का शासक बनने को काविल बनाया, उसी मधेशी को वे उन शब्दों का अर्थ समझाते हैं ।
चौथे एक प्रश्न का जबाव देते हुए पोखरेल कहते है, “लोकतन्त्रमा पार्टीले सभा सम्मेलन मार्फत आफ्नो विचार जनतामा राख्न पाउनुपर्छ । सोही क्रममा एमालेले मेची महाकाली अभियान चलाएको हो ।”
लोकतन्त्र में ही तो मानव अधिकार, अभिव्यक्ति स्वतन्त्रता, सभा सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता, प्रेस स्वतन्त्रता आदि होती है । जब एमाले को लोकतन्त्र में ये सब चीजों की छुट होनी चाहिए तो फिर टिकापुर में थारुओं द्वारा हो रहे शान्तिपूर्ण विरोधसभा को एमाले लगायत के नेपाली पार्टियों द्वारा होने क्यूँ नहीं दिया गया ? मधेशी मोर्चा द्वारा होने बाले कार्यक्रमों को बारम्बार अस्तव्यस्त क्यूँ किया गया ? डा.सिके राउत को अपना विचार रखने क्यूँ नहीं दिया जाता है ? उनके सभा सम्मेलनों पर रोक क्यूँ ? उनके साथ ही उनके नेता कार्यकर्ताओं के उपर गैरकानुनी मुद्दे क्यूँ लगाये जाते हैं ? मोर्चा का कार्यक्रमों को इटहरी, फूलजोर, नवलपुर में क्यूँ नहीं होने दिया गया ? जो प्रहरी एमाले का सभा करबाने के लिए मलेठ में मञ्च तैयार करता है, वो प्रहरी मधेशी मोर्चा के कार्यक्रमों को असफल बनाने से लेकर मधेशियों पर गोलियाँ क्यूँ बरसाती है ?
अगले प्रश्न के उत्तर में पोखरेल बोलते हैं, “संविधानले तोकेको समयभित्र चुनावमा जानु भनेकै संविधानलाई मान्नु हो ।”
विचार यह करना होगा कि जिस संविधान को मधेश ने माना ही नहीं है, उस संविधान के अन्तर्गत मधेशी चुनाव में कैसे जाएगा ? मधेशी नेता ने संविधान को मानकर दो दो बार प्रधानमन्त्रीय चुनाव में भाग लिया है, मधेशी जनता ने नहीं । जो संविधान मान्य ही नहीं है, वह चुनाव कैसे करवा सकता है ?
छठे प्रश्न के उत्तर में वे बोलते हैं कि मधेशी मोर्चा आतंककारी है । अब सवाल यह उठता है कि मधेशी मोर्चा ने कितने नेपालीयों का हत्या की है ?, कितने नेपालीयों के घर में आग लगायी है ?, कितने नेपालीयों का सम्पति लूटा है ?
सातवें प्रश्न के जबाव में पोखरेल का कहना है कि मधेशी मोर्चा के कुछ वरिष्ठ नेता ने मधेश में एमाले के साथ टिकापुर और गौर जैसे घटनायें घटा सकने की चुनौती दे रखा हैं ।
तो पोखरेल बताये कि गौर घटना के प्रणेता या उत्पादक मधेशी मोर्चा या नेपाली पार्टी रही है ? टिकापुर की घटना क्या कोई थारु मधेशी ने घटाया है ? नेपालगञ्ज की घटना का नायक मधेशी ही है ?
हिन्दी भाषा के तरफ इंगित करते हुए पोखरेल ने आठवें प्रश्न का जबाव में मधेशी मोर्चा हिन्दी को मान्यता दिलवाकर राष्ट्रिय अहित तथा अन्य राष्ट्र का प्रेम नेपाल में पनपाने का आरोप मधेशियों पर लगाने का दुष्प्रयास की है । वे हिन्दीभाषी मधेशियों को भारतप्रेमी या भारतीय कहना चाहते हैं । जिसका न धर्म का, न जात का, न राष्ट्र का और न सम्मान का कोई ठिकाना है, वह मधेशियों को भारतीय और अपने को राष्ट्रवादी मानता है । जो मधेश नेपाल का ही नहीं है, उसपर नेपालीपन अब और ज्यादा लादना नेपालियों के लोकतान्त्रिक चरित्र के विपरीत काम होगा ।
देख मधेशी देख, तेरा हाल क्या है ! नेपाली बन्दुकों से हत्या किए गए मधेशियों के बारे में जो नेपाली मीडिया, नेपाली समाज, उसका राजनीति और सुरक्षानीति सकारात्मक रुप में चूँ तक नहीं बोलते या मधेशियों को गोली मारकर अपने को गार्खाली बहादुर कहता है, उसी के समुदाय के कंचनपुर के सीमा पर भारतीय प्रहरी द्वारा मारे गये एक नेपाली के बारे में कितना हंगामा मचा रखा है । उसे देश के लिए मरने बाले बहादुर शहीद का नाम दिया जा रहा है ।
वीर तो तब मानी जानी चाहिए जब सप्तरी के तिलाठी के मधेशियों के तरह लडा होता । अपने अस्तित्व के लिए मधेशियों के तरह नेपालीयों से लडकर कुबार्नी दिया होता । लेकिन वे उधार में ही शहीद बन जाते हैं और कायरपना में ही बहादुर कहला जाते हैं ।

मधेशी मोर्चा आतंककारी है :ईश्वर पोखरेल

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