मधेशी मोर्चा नेपाली अत्याचार का केवल सामना कर सकती है, समाधान नहीं

कैलाश महतो :साढ़े चार महीने लम्बे समय को भी थका देने वाले, मधेश आन्दोलन को सलाम । आन्दोलन को भी आन्दोलित बना देने वाले मधेशी योद्धाओं को अभिवादन । अधिकार के नाम पर कुर्बानी देने वाले सैकड़ों ज्ञात अज्ञात मधेशी शहीदों को नमन, दिलोजान से मधेश आन्दोलन को नेतृत्व दे रहे मधेशी नेताओं को धन्यवाद तथा लोभ, लालच एवं मजबूरी में अपना ईमान, धरम एवं मधेशीयत बेचकर तस्करी करने वाले नेता, व्यापारी तथा इमानखोरों को ।
किसी भी देश को संचालन करने हेतु तीन आवश्यक शक्तियों की विशेष जरुरत होती है ः शासन, प्रशासन और सेवा । नेपाली राज्य को चलाने वाली वही तीन शक्तियाँ ः शासक, प्रशासक और सेवक हैं । इन तीन शक्तियों में शासक और प्रशासक की श्रेणियों में मधेशियों की उपस्थिति दयनीय या यूँ कहें कि शून्य के बराबर है । मधेशियों की तकरीबन ९५ प्रतिशत से भी ज्यादा सहभागिता नेपाली राज्य में सेवा के क्षेत्र में देखने को मिलती है, जहाँ उन्हें खेती, मजदुरी, सेवा, चाकरी, गुलामी, चमचागिरी तथा अपनी भूमि और भाइयों से गद्दारी करने के सिवा बाकी कोई काम नसीब नहींं होता । वे खेती एवं मजदूरी करके अपने खेतों में उपजे पतले चावल, स्वास्थ्यवर्धक दाल, साग, सब्जी, दूध, दही, मक्खन आदि शासक तथा प्रशासकों को पहँुचाते हैं । चाकरी, चापलूसी, गुलामी तथा घूस खिलाकर कुछ शिक्षक, प्रहरी, खरीदार, सुब्बा, प्राविधिक, चपरासी आदि जैसे छोटे छोटे नौकरियों में भाग लेकर सेवाओं के काम में मधेशियों की उपस्थिति देखने को कभी–कभार मिल जाती है । मधेशियों को आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, भाषिक तथा अवसरीय रूप में इस तरह कमजोर करने की नेपाली राज्य ने षड्यन्त्र रचा है कि उसके हक हित के लिए हो रहे आन्दोलन को भी धोखा देने में मधेशी कोई कसर नहीं छोड़ता । करीब पाँच महीनों से हो रहे मधेश आन्दोलन तथा उसके नाकाबन्दी को चुनौती देकर मधेशी विरोधी नेपाली शासक तथा उसके पक्ष पोषक सन्यन्त्रों के घर आंगन तक इन्धन लगायत के अन्य मधेश आन्दोलन से प्रतिबन्धित सामानों को मधेशी द्वारा ही पहुँचाया जाता है । मधेशियों के इसी स्वभाव को देख नवलपरासी के सुनवल इलाके में नेपालियों ने बड़ बड़े अक्षरों में “मधेशमा मधेशी कुकुरहरु रहुन्जेल हामी नेपालीहरु मर्न सक्दैनौं, मधेशीले पैसा पाए घरको इज्जत पनि बेच्न सक्छन्” नाम का बैनर मुख्य सड़क पर ही लटकाया था, जिसको समाचार बनाकर बुटवल से निकलने बाले समाचार पत्रों में समेत प्रकाशित होने की चर्चा व्याप्त रही ।
मधेश विकास तथा मधेशियों के उन्नति के विरोधी रहे नेपाली राज्य ने बहुत बड़े षड्यन्त्रपूर्ण तरीके से जनकपुर जानकी मन्दिर में अवस्थित राम जानकी की दर्शन करने को आतुर भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का जनकपुर भ्रमण को रोका । मधेश आन्दोलन के क्रम में नेपाली सम्राज्य के बड़े से बड़े माने जाने बाले खस गोर्खाली तो क्या, खस पार्टियों के मधेशी नेता तक को मधेश आना प्रतिबन्ध लगे जैसी अवस्था में नेपाल की राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी को मिथिला के महान् उत्सव विवाह पञ्चमी के मेले में राम जानकी मन्दिर दर्शन हेतु जनकपुर आना या भेजना भी एक कूटनीतिक षड्यन्त्र ही रही है । नेपाली राज्य ने यह जानकर राष्ट्रपति को जनकपुर भेजा कि विवाह पञ्चमी के अवसर पर उनके जनकपुर जाने से मधेशी जनता भड़केगी । जब जनता भड़केगी तो प्रहरी प्रशासन मजबूर होकर लाठी और गोलियाँ चलायेंगी । अयोध्या लगायत भारत के विभिन्न स्थानों से जनकपुर आये भारतीय दर्शनार्थी लगायत मधेशी जनता के उपर भी लाठी और गोलियाँ चलेगी और वहाँ भागमभाग की स्थिति होगी । लोग मेले में जाने से डरेंगे, मेला असफल होगा और मधेशियों की आमदनी कमजोर होगी । दूसरी तरफ भारतीय दर्शनार्थियों के साथ होने वाले नेपाली दुव्र्यवहार के कारण आने वाले समय में भारतीय लोग मधेश में नेपाली प्रशासन के अत्याचार के सन्त्रास के कारण आने में घबराहट महसूस करेंगे और मधेशी तथा भारतीय लोग और परिवारों के बीच रहे सम्बन्ध में शिथिलता आयेगी । तीसरा कारण यह भी होने की संभावना हो सकती है कि मधेश के आन्दोलन को मापन करने के लिए नेपाल के सर्वोच्च व्यक्ति को ही भेजा गया हो ।
जब राष्ट्रपति विद्यादेवी जी का मधेश भ्रमण मधेश ने स्वीकार नहीं किया तो नेपाली सरकार, नेपाली मीडिया और नेपाली लोगों ने मधेश और मधेशियों को बदनाम करने का एक अनोखा प्रपञ्च रचा नेपाली राष्ट्रपति को महिला होने का, जो सर्वथा गलत है । मधेशियों ने किसी महिला का नहीं, अपितु नेपाली राष्ट्रपति के मधेश आगमन को नहीं स्वीकार किया है । जिस मधेश में महिला को देवी, दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, शिवांगिनी के रूप में पूजा जाता है, क्या वो मधेश महिलाओं के साथ दुव्र्यवहार कर सकता है ? कतई नहीं । जिस जानकी मन्दिर में श्रद्धालु अपनी पवित्र भावना के साथ पुष्प चढाते हों, क्या कोई राष्ट्रपति इतना बड़ा हो गया कि वो अपने पैर में जूते लगाकर किसी के विश्वास, आस्था और भरोसे को कुचले ? मधेश को नेपाली राष्ट्रपति ने उसके मधेशियत के साथ बदतमीजी की है, न कि किसी सुहागन या विधवा महिला ने ।
मधेशियों के मौलिक हक अन्तर्गत के माँगो को लेकर मधेश आन्दोलन को शक्ति प्रदान कर रहे मधेश आन्दोलन के साहसी वीर मधेशी नेता राजेन्द्र महतो के शान्तिपूर्ण तरीके से मधेश–भारत सीमा जोगबनी पर धरना देते वक्त नेपाली सशस्त्र तथा जनपद प्रहरीयों द्वारा अन्धाधुन्ध बर्बरतापूर्वक उनके तथा उनके योद्धा नेता साथियों के उपर लाठी चार्ज कर घायल करना, मोरंग के एस.पी द्वारा “ राजेन्द्र महतो आइ.सी.यू मा दाल भात खाँदै ” बोलकर कटाक्ष करना लोकतन्त्र तथा पदीय मर्यादा विपरीत कार्य तथा असभ्य शैली है । श्री महतो लगायत के घायल नेताओं के स्वास्थ्य लाभ के कामना तथा प्रहरी ज्यादती के विरोध में मधेशी जनता द्वारा हो रहे विरोधसभा में खस उछृंखल युवाओं को नेपाली सुरक्षाकर्मियों के सहयोग से दो दर्जन से ज्यादा मधेशी आन्दोलनकारियों पर खुकुरी से प्रहार कर गम्भीर बनाना, यह सब नेपालीपन की पराकाष्ठा है, जिसको अब मधेश स्वीकार नहीं कर सकता ।
पाँच दर्जन से भी ज्यादा मधेशियों को नेपाली सरकार तथा उसके पुलिस प्रशासन द्वारा हत्या करने के बाद भी हम मधेशी, मधेशी मोर्चा और मधेशी चेहरे के कोई और किसी भी पार्टी के नेता कार्यकर्ता अगर यह समझते हैं कि संविधान की पुनर्लेखन, या उसमें कोई संसोधन, मधेश प्रान्त या सीमांकन सहित का मधेश स्वायत्त प्रदेश से मधेशियों का कल्याण हो जायेगा तो हम सब के सब भ्रम में ही हैं ।
विगत २४७ वर्षों से आज तक हम मधेशियों ने नेपाली अत्याचारों का सिर्फ सामना किया है । कल भी हम बहुत से बहुत उनका सामना ही करेंगे, न कि हमारे उपर उनके द्वारा लादे गये या लादे जाने वाली किसी अत्याचार का समाधान कर सकेंगे । उनके द्वारा हमारे उपर लादे गये और लादे जाने बाले समस्त समस्याओं का समाधान सिर्फ आजादी है यह बात धीरे–धीरे जड़ पकड़ती जा रही है । लोगों में यह विश्वास बढ़ता जा रहा है कि आजाद मधेश देश ही हमें हमारे सारे समस्याओं का समाधान दिला सकता है । बांकी सारी मार्ग व्यर्थ है ।

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