मधेशी या नेपाली –

gopal thakur

गोपाल ठाकुर

गोपाल ठाकुर:इसी स्तंभ में मैंने इससे पहले राष्ट्रीय मुक्ति के सर्ंदर्भ में कुछ लिखा था । इसमें सामंती गोर्खाली साम्राज्यवाद के तहत अपनी बदहाली के कुछ दृष्टांत दिए गए थे । कथित मार्क्सवादियों के पाखंड का भी पर्दाफास किया गया था । इसके बावजूद एमांग्रेसी शासक खास तौर से मधेशियों के ऊपर जुल्म पर जुल्म ढाये जा रहे हैं । अब तो एमाले-सरदार हमें यू. पी. और बिहार भी भेजना चाहता है । वैसे ‘नेपाली’ पहचान के भीतर पूरा नेपाल नहीं आता, इसकी चर्चा तो पहले हो चुकी है, खास तौर पर मधेश और मधेशी जो नेपाल में तो हैं परंतु नेपाली नहीं हैं, इसी विषय पर कुछ बात करूंगा ।
मधेश मध्यदेश का अपभ्रंस के रूप में नेपाल में प्रयुक्त होता आ रहा है । वर्मा -२००७) के अनुसार प्राचीन और मध्यकाल में भारतवर्षके १३ जनपदों को संयुक्त रूप से मध्यदेश कहा जाता था । उन्होंने इन जनपदों को वहाँ बोली जाने वाली जन-भाषाओं सहित इस प्रकार रखा है ः- १. कुरु -खडÞीबोली), २. पंचाल -कन्नौजी), ३. शूरसेन -ब्रजभाषा), ४. कोसल -अवधी), ५. काशी -भोजपुरी), ६. विदेह -मैथिली), ७. मगध -मगही), ८. अंग -अंगिका), ९. दक्षिण कोसल -छत्तीसगढÞी), १०. वत्स -बघेली), ११. चेदि -बुंदेली), १२. अवंति -मालवी) और १३. -जयपुरी) ।
इन जनपदों के नाम और इनकी भाषाओं को देखने के बाद स्पष्ट होता है कि तत्कालीन कोसल, काशी और विदेह का आंशिक हिस्सा सन् १८१६ की सुगौली संधि और १८६० की बेलायत-नेपाल संधि के तहत नेपाल की सीमा के भीतर आया । अर्थात अवध, भोजपुर और मिथिला का नेपालीय हिस्सा जो मध्यदेशीय क्षेत्र था नेपाल में मध्येश, मध्येस होते मधेश या मधेस कहलाने लगा । नेपाल का पहला लिखित कानूनी दस्तावेज मुलुकी ऐन, १९१० -व्रि|mम संवत) में इन शब्दावलियों के प्रयोग से ये बात सिद्ध होती है और ये परंपरा नेपाल के कानूनी दस्तावेजों में वि. सं. २०१२ तक चलती आई है । जहाँ तक देश के नाम की बात है तो गोरखा राज्य के तीन हिस्सों की बात हम यहाँ के कानूनी दस्तावेजों में पाते हैं, नेपाल, पहाडÞ और मधेशः
१. अपनी जागीर सरकार को देकर इसके बदले कहीं और मांगने वालों को नेपाल की जमीन के बदले नेपाल में ही, पहाडÞ की जमीन के बदले पहाडÞ में ही और मधेश की जमीन के बदले मधेश में ही नाप कर सरकार को २० में ५ मुनाफा होने के हिसाब से दाखिला कर बदल दें … …ृज्ञे
२. नेपाल, मधेश, पहाडÞ सभी जगह के लिए आवश्यक चाङ्, गाध्रा, करकच, साबरी, सेंधा नमक में से किस प्रकार का नमक कहाँ से किस जगह के लिए कितना नमक कितने महीने के अंदर ला कर किस दर से ब्रि|mी की जाए, अपनी शर्त सहित खोल कर नेपाल के लिए लाने वाले १ महीना के भीतर और मधेश, पहाडÞ के लिए लाने वाले २ महीने के भीतर इस मंत्रालय में पहुँच जाने के हिसाब से दर्खास्त दें ।ृद्दे
ऊपर के दोनों दृष्टांतों से यह सिद्ध होता है कि १९५१ के परिवर्तन के बाद भी सरकारी दस्तावेजों में इस राज्य का नाम नेपाल न होकर गोरखा ही है और नेपाल कहने से आज की राजधानी काठमांडू घाटी का ही बोध होता है । यह जाहिर करता है कि न मधेश नेपाल का अंग है ना ही मधेशी लोग नेपाली हैं । इसके साथ साथ वि. सं. १९६४ -१९०र्७र् इ.) तक तो देश का डाक टिकट भी गोरखा सरकार के नाम से ही निकलने का प्रमाण मिलता है । यह सिद्ध करता है कि नेपाल, पहाडÞ और मधेश पर गोरखा साम्राज्य का आधिपत्य था और अभी तक है ।
इसके साथ साथ वि. सं. १९९० तक यहाँ की कोई भाषा नेपाली नहीं थी । वि. सं. १९७० में बनी गोरखा भाषा प्रकाशिनी समितिको ही वि. सं. १९९० में नेपाली भाषा प्रकाशिनी समिति कर दी गई । परंतु वि. सं. २००७ के राजनीतिक बदलाव के बहुत बाद तक सरकारी दस्तावेजों में गोरखा राज्य ही लिखा जाता रहा जिसके प्रमाण ऊपर दिए जा चुके हैं । इससे भी लज्जास्पद बात तो यह है कि मधेशियों को कथित प्रजातांत्रिक नेपाल में भी मधेश से राजधानी आने के लिए पारपत्र, यानी राहदानी कहें या पासपोर्ट, लेना पडÞता था । ‘परतंत्र मधेश और उसकी संस्कृति’ के लेखक रघुनाथ ठाकुर ‘मधेशी’ ने अपने पारपत्र को भी उस पुस्तक में प्रकाशित किया है ।ृघे एक तरफ मधेश से नेपाल आने के लिए ऐसी स्थिति थी तो दूसरी ओर मधेशियों को, बेलायती भारत हो या स्वाधीन भारत, वहाँ जाने के लिए किसी दस्तावेज की जरूरत नहीं थी । इसका एक जबर्दस्त कारण था, मधेशी लोग पहली या दूसरी भाषा के रूप में गोरखा भाषा का प्रयोग नहीं करते थे ।
इस दरम्यान हिंदुस्तान सन् १९४७ से पहले तक भले परतंत्र रहा हो, परंतु कुरु की खडÞीबोली अरबी और फारसी के सर्ंपर्क में आकर हिंदीर्-उर्दू के रूप में विकसित होने लगी थी । अपनी तत्सम शब्दावली संस्कृत में ढूंढ कर देवनागरी लिपि में लिखने-पढÞनेवालों ने इसे हिंदी कहना पसंद किया और इसी रूप में स्थापित किया तो वही शब्दावली अरबी या फारसी में ढूंढ कर फारसी लिपि में लिखने-पढÞनेवालों ने इसे उर्दू के रूप में स्थापित किया । भारतवर्षमें प्रिंटिंग प्रेस स्थापित होने के बाद छपाई भी इन्हीं दो रूपों में होने लगी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इन्हें राजभाषा के रूप में विकसित करने का अभियान भी चला । सारे हिंदू धार्मिक साहित्य हिंदी में अनूदित होने लगे । साधु-संतो द्वारा प्रयुक्त इसके रूप को सधुक्कडÞी भी कहा जाने लगा । संस्कृत में रहे धार्मिक साहित्य का धडÞल्ले से हिंदी अनूदित प्रकाशन और वितरण भी शुरू हो गया था जो हिंदू मधेशियों के लिए भी सुगम था । इसी तरह मुस्लिम मधेशी भी उर्दू से परिचित होते चले गये थे । अतः मधेशियों की सर्ंपर्क भाषा के रूप में हिंदी का विकास हो चुका था ।
इसके साथ-साथ आजादी के दिन तक आते-आते भारत में रहा मध्यदेशीय क्षेत्र का पर्ूण्ातया भारतीयकरण हुआ सहज ही प्रतीत होता है । क्योंकि वहाँ मध्यदेश या मधेश नाम की न कोई शासकीय इकाई है ना ही कोई मधेशी हैं सिवा कुछ हिंदू पेशेवर जातियों के जो अपने को मदेशिया कहा करते हैं । तो मध्यदेश का अवशेष अगर कुछ बचा हुआ है तो वह है गोरखा साम्राज्य अधिनस्थ मधेश । इस प्रकार अगर हम अपनी ऐतिहासिक, भौगोलिक, भाषिक, सांस्कृतिक पहचान और हमारे शासकों की मनोवैज्ञानिक वृत्तियों का विश्लेषण करें तो हम यह पाते हैं कि मधेश एक पर्ूण्ा राष्ट्र के रूप में विकसित है जो गोर्खा साम्राज्य के अधिनस्थ अब भी अपनी विलग राष्ट्रीय पहचान के कारण नारकीय हालात का शिकार होकर रह गया है । ये गोर्खाली शासक बडÞी चुश्तचालाकी से अपने को नेपाली बता रहे हैं, जो ये हैं नहीं । पर निर्रथक दुष्यप्रयत्न करते जा रहे हैं गोर्खाली साम्राज्यवाद की निरंतरता में अंध नेपाली राष्ट्रवाद को हम पर थोपने का ।
दूसरी ओर हमारे सगोत्री कहें या सहोदर, मध्यदेशीय सांस्कृतिक विरासत को लिए उत्तर भारत के हमारे बंधु-बांधवों को भी भ्रम है कि हम गोरखा साम्राज्य में आप्रवासी के रूप में आ बसे हैं । अगर इनको ये भ्रम है तो स्वाभा विक है अन्य भारतियों में तो यह अनभिज्ञता होगी ही । कई बार भारत में मुझ से ही पूछा गया है कि हम कब से नेपाल में रह रहे हैं । सिर्फइतना ही नहीं नेपाल में मधेश पर काम करनेवाले बहुत-से राजनीतिकर्मी भी हमारी समस्या को जातीय, भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामुदायिक या क्षेत्रीय बताते हैं । निश्चित रूप से हमें इन भ्रांतियों से निकलना ही होगा ।
इसके लिए मैं आप सभी पाठकों से एक जिज्ञासा रखना चाहता हूँ । किसी संधि-समझौते या युद्ध में ही सही, अगर कोई भूभाग किसी साम्राज्य के अधिनस्थ हो जाता है तो वहाँ के मूलबासी उस साम्राज्य के आप्रवासी कहे जायेंगे या आदिवासी धरतीपुत्र – ठीक वैसे ही ऊपर उल्लेखित संधियों के तहत हम मधेशी अपने मधेश सहित गोरखा साम्राज्य के अधिनस्थ कर दिए गए हैं । इसी लिए तो हम गर्व से कहते हैं, हम मधेशी हैं, कोई विदेशी भगौडÞे नहीं, यहाँ के धरतीपुत्र हैं ।
अब आते हैं हम, हमारे शासकों द्वारा हमारे सामने अंधराष्ट्रवादी सवाल खडÞे किए जाते हैं, उस पर । अभी अभी कुछ वर्षों से हम से पूछा जाने लगा है, ‘आप अपने को पहले नेपाली कहते हैं या मधेशी -‘ ये सवाल फिर नेपाल यानी काठमांडू के नेवार लोग शायद ही पूछते हैं । ये पूछते हैं वही गोर्खाली जो खुद नेपाली नहीं हैं । वस्तुतः वर्तमान नेपाल की सीमा के भीतर उनकी कोई आदि भूमि नहीं है । वे खुद बाहर से आए हैं । कोई कुमाऊ से, कोई गढÞवाल से, कोई कान्यकुब्ज से, कोई चितौडÞ से, तो कोई राजस्थान से । लेकिन वे हैं बडÞे शातिर दिमाग के नेपाल में आकर उन्होंने पहले खसान कब्जा किया था और अपने को खस बताने लगे जो वहाँ के आदिवासी खस लोग इसका बारीकी से खुलासा करने लगे हैं । इसके बाद वे गोर्खा कब्जा किए और गोर्खाली हो गये । फिर नेपाल कब्जा करके नेपाली बन गये । तो ये अस्थिर पहचान वाले आज एक तरफ नेपाल के शासक बने हैं तो दूसरी तरफ अब पश्चिमी मुल्कों के ग्रीनकार्ड और पीआर कार्ड भी हथिया कर बैठे हुए हैं ।
हाँ, तो हम से पूछा गया उस प्रश्न का सीधा जवाब ये है कि हम मधेशी हैं । गोर्खा साम्राज्य अधिनस्थ नेपाल में हैं इसलिए हम नेपाल के नागरिक हैं परंतु जिस पहचान को हमे दरकिनार करने के लिए ही गढÞा गया हो, वो भला हमारी हो ही कैसे सकती है – इसलिए हम एक संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र नेपाल का निर्माण करना चाहते हैं जहाँ हम अपने मधेश पर खुद की हुकूमत करें और संघीय हुकूमत में जनसांख्यिक रूप से नेपाल में रहे सारे राष्ट्रों की सांझी हुकूमत हो । इसके लिए हम अगले संविधान में राष्ट्रीय आत्म-निर्ण्र्ााका अधिकार सुनिश्चित करवाना चाहते हैं । इसलिए राज्य राष्ट्र ९ब् क्तबतभ या ल्बतष्यलक० नेपाल को राष्ट्र राज्य ९ब् ल्बतष्यल क्तबतभ० की बलजफ्ती परिभाषा देकर यहाँ की विलग राष्ट्रीयताओं को गोर्खाली उपनिवेश बनाने की धृष्टता अगर ना की जाए तो अच्छा है ।
सर्ंदर्भसूचीः
१. वर्मा, धीरेंद्र. २००७. मध्य देश ः ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक सिंहावलोकन. पटना ः बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् ।
२. ठाकुर, रघुनाथ. १९५८. परतंत्र मधेश और उसकी संस्कृति. महानंद ठाकुर ।
३. मुलुकी ऐन, १९१०. -धधध।बिधअommष्कष्यल।नयख।लउश्र
४. उद्योग र वाणिज्य मन्त्रालयको सूचना. २००८ -वि. सं.). नेपाल गजेट, भाग ३, भाद्र २५ गते, वि. सं. २००८ साल ।

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