मधेशी सहिदो से कुछ अहम सवाल : कैलाश महतो

कैलाश महतो,परासी,१३ दिसम्बर |

मधेश के सहिदो १ प्रणाम । कोईआपको डरपोक या कायर नही कह सकता । कोई आपको मधेशद्रोही या नेपाल गुलाम भी नही कह सकता । मगर वीर की गरीमा को साझने बाला आपको बहादुर या सुरवीर नही कह सकता । कोई आपको मधेश का अनुयायी या फिर आजादप्रेमी भी नही मान साकता । कम से कम मै तो नही ।

11215701_480534228792867_323094198110764596_nआप अपने श्मसान घर मे क्या हिसाब किताब कर रहे होङ्गे, यह हमे नही पता । मगर यह निश्चित है कि आप खुद गुलाम बनकर चले गए और अपने सर का थप गुलामी अपने घर परिवार, बालबच्छे तथा ईष्टमित्रो मे लाद कर भी चले गए । मनोवैज्ञानिको को माने तो जब कोई बाप या नेता अपने जीवन मे हार मान जाता है अपने विपक्षी से तो वह बौखला जाता है । वह उसका बदला लेना चाहता है अपने प्रतिद्वन्दी से । वह हर कोशीश करता है । मगर जब वह हार जाता है या नाकाम हो जाता है तो अपने आपसे ही बदला ले लेता है । उस क्रम मे या तो वह अपने आप को मार लेता है या अपने ही रिस्तेदारो से बदला लेता है । हमारे मधेशी सहीदो ने भी वही किया है । और उनकी सहादत को अगर अपराध, अन्याय और नाइन्साफी कह दे तो कोई गुनाह नही होना चाहिए । अगर आपको लगता है कि आपने बहादुरी की है, मरने की हिम्मत की है, लडाई की है अपने वतन के लिए, मौत को स्विकारा है अपने परिवार और सगे सम्वन्धियो के लिए तो मुझे इसे गलत मान लेने दिजिए । अगर मै आपके बगावत को एक भावनात्मक पागलपन मानू तो मुझे गलत मत समझिए । आपकी जीवन की कुर्बानी को अगर मै सहादत ना मानू तो मुझे अपना विरोधी मत मानिए । क्यूकी आपने अन्याय किया है अपने परिवार बालो से । आपने नाइन्साफी किया है अपने बच्चो से । आपने धोखा दी है मधेश मा को । आपने मझधार मे छोडा है मधेशियो को । आपने पाप किया है आजादी से ।

क्या आपके मौत ने सहादत प्राप्त कर ली रु क्या आपके कुर्बानियो ने अधिकार ले ली रु क्या आपकी बहादुरी ने आपके परिवार तथा बच्चो का जिन्दगी सन्वार दी रु क्या आपके सहादत ने मधेश को अधिकारपूर्ण बना दी रु क्या आप की बगावत ने मधेश को आजाद करा दी रु आपके मृत शरीरो पर फूल और मालो के साथ भावपूर्ण श्रद्धान्जली अर्पण कर्ने बाले नेता तथा उनके पिछे लगे भिडो ने आपको अमर सहीद का नाम दे दी । आप तो अमर हो गए, मगर अपने पिछे अपने अरमान को क्यू मार गए । अपने घर परिवार को क्यूआर गए रु वही अमरत्व आपको फूल(माला चढाने बाले नेताओ को क्यू स्विकार नही होता रु वही सहादत की वाह्वाही नेताओ के बेते बेटियो को नसीब क्यू नही होता रु खैर वो आपकी मर्जी रही । उसमे हमारा विरोध नही है, मगर आप सहिदो से सवाल जरूर कर्ना होगा कि आपको अधिकार के लिए गोली बन्दूक की गोलीयो ने वह त्रास नही दे पाया, जितना आजाद मधेश के लिए स्वतन्त्र मधेश का झण्डा ने आपके हिम्मत को दहला दिया । ऐसा क्यू रु क्या अजादी की झण्डा मौत की गोलियो से भी डरावना है रु

आजाद मधेश के लिए हमने न तो पुलिस से लडने, न उनसे डन्डे खाने, न गोलियो के शिकार होने और न उन्हे कोई शारीरिक तकलीफ देने की बात की है । हमे खाली हाथ स(शान्तिपूर्ण रूप मे आजाद मधेश के लिए आवाज देने के लिए आपसे विन्ती की है । शुन्य ५ के क्षती मे १००५ की आजादी की सफलअता के लिए लोकतान्तृक तथा अहिन्सात्मक तरिको से नेपाली उपनिवेश की अन्त तथा स्वतन्त्र मधेश देश की पूनर्स्थापना के लिए आगे आने को ही तो हमारा निवेदन है ।

हम विगत ६५ वर्षो से एक ही मुद्दे को ढोते आ रहे है, कुर्बानिया देते आ रहे है । इन ६५ वर्षो मे खाने को तरसने बाले मलेसिया दुनिया के लोगो को रोजगार देने मे पहला स्थान प्राप्त कर ली । दर दर भटकने बाले सिङ्ग्गापुर अपने जनता के प्रती व्यक्ती आय अमेरिका से भी ज्यादा कर ली । पहाड ही पहाडो से बनी देश स्विटजर्ल्याण्ड की उदाहरण सारे दुनिया मे व्याप्त है । सिर्फ ७५ जमीन को उब्जाने बाले चीन अपने अरबो के जनता को भरपूर रूप से खिलाकर सारी दुनिया को भी खिलाने का औकात रखता है । जमीन मे पानी न होने के बावजूद दक्षिण अफृका अपने जनता को भरपूर पानी दे सकता है । एक किलो भी अनाज न उब्जा पाने बाला सिङ्गापूर के जनता सैकडो व्यन्जन के खाने खा सकते है । मगर हम मधेशी अभी भी अपने पहचान, अपने अधिकार, रोजगार, समानता, समावेसिता, नागरिकता आदी जैसे आधारभूत चीजो के लिए असभ्य आन्दोलन कर रहे है । जानवरो के तरह मर रहे है, एक ही मुद्दे को आजतक ढोते चल रहे है तो दुसरी तरफ हम अपने ही आन्दोलन के शिकार होते जा रहे है । एक गुलामी से मुक्त होने के लिए हजारो गुलामियो को न्यौता देते जा रहे है और उसी को हम अपना सफलता मानते आ रहे है ।

विचित्र चरीत्र है हमारा कि हमे पूर्णता से ज्यादा टुक्रे चाहिए । मालिकपना से ज्यादा भिख चाहिए और सम्मन से ज्यादा अपमान चाहिए । हम अपने ही सम्पती को भिख के रूप मे प्रयोग कर्ना चाह्ते है । हम शेर गिदर मे तब्दिल होना पसन्द करते है । आ बैल मुझे मार की न्यौता देना चाह्ते है । अपने इतिहास को जन्जीर मे कैद कर्ना चाह्ते है और निश्चित खतरे को राह देना चाह्ते है ।

शान्तिपूर्ण आन्दोलन कर्ने तथाआनव अधिकार के बात कर्ने बाले लोगो पर झूठा तथा कपोलकल्पित मुद्दा लगाने तथा न्याय के कहे जाने बाले मन्दिर मे बैठा अन्याय का पक्षपोषक अन्यायकर्ता मौजुद बेशर्मो को हम न्यायमूर्ती मानकर उसकी इज्जत करते है । और मधेशियो का रबैया अगर ऐसा ही रहा तो अन्याय कर्ने बालो से ज्यादा खत्रा न्याय की वकालत कर्ने बालो से होना निश्चित होगी ।

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