मधेशी हर हाल में नेपाली जोंक से अलग रहना चाहता है : कैलाश महतो

madhesh-morcha

कैलाश महतो,परासी, २ दिसिम्बर | जीव तीन प्रकार के होते हैं ः स्वजिवी, श्रमजिवी और परजिवी । इन तीनों की अपनी अपनी खासियत और विशेषतायें होेते हैं ।
स्वजिवी वह होता है जो दाना पानी, जीना सोना और जीवन को अपने और अपने परिवार तक सीमित रखकर जिता है । वैसे स्वजिवी मधेश और नेपाल दोनों में व्याप्त हैं । अपने व्यक्तिगत सुख और खुशी के लिए बहुत सारे नेपाली अपनी मातृभूमि और अपने सम्बन्धित तक को धोखा देने और बेचने के काम करते हैं तो वहीं कुछ मधेशी लोग भी नेपाली राज्य सत्ता की चम्चागिरी कर व्यक्तिगत लाभ उठाने में ही अपने को पावरफूल और ताकतवर समझते हैं ।
श्रमजिवी लोग संसार में अपना श्रम बेचकर इमानदारी से अपने साथ अपने परिवारों का गुजारा चलाते हैं । वे और उनके जमात हमेशा कमजोर दिखायी देती है जिनके श्रम, बलिदान और मेहनत पर ही संसार की सारी परिवर्तन टिकी होती है ।
परजिवी वे होते हैं जो दूसरों के कमाई को अपना मानते हैं । उनके कमाई और उनके सम्पति को अपने बेहुदे नजर और कमिनेपन से अपना बनाने का दुःस्वप्न देखते है । और एमाले लगायत के मधेश विरोधी नेपाली पार्टियों द्वारा जारी आन्दोलन परजीवियों सी ही चेतावनी है कि मधेश उससे अलग नहीं होना चाहिए । क्यूँकि मधेश उसका खाना है जिसके बगैर वो जी नहीं सकता । जब कोई जोंक (Leech) किसी आदमी या जानवर को धोखे से पकड लेता है, उसके शरीर से चिपक कर उसका खून पीने लगता है तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि उसका अधिकार ही उस आदमी या जानवर पर हो गया हो । जब उस आदमी या जानवर को पता चलता है कि उसके शरीर से चिपक कर कोई चालाकी पूर्वक उसका खून चुस रहा है तो वह तुरन्त उसे नोंचकर फेंक देता है और वह जोंक चाहे जितना भी आन्दोलन कर लें, चेतावनी दे दें, धाक धम्की देखा लें या फिर भावना और प्रेम के गीत गा लें, उसका कोई मायने नहीं होता ।
एमाले लगायत के नेपाली दलों का हावादारी तर्क यह निकलना शुरु हुआ है कि शदियों से नेपाली और मधेशी के बीच में रहे सहीष्णुता और आत्मीयता खत्म नहीं होनी चाहिए । हिमाल, पहाड और मधेश हड्डी और मांस के जैसे सम्बन्ध में रहे हैं जिसे अलग रुप में नेपाली लोग स्वीकार नहीं कर सकते । कोई नेपाली मधेश और पहाड को अलग देखना नहीं चाहते । जबकि तथ्य बिल्कुल अलग है । शदियों से भ्रम में रखे गये कोई भी मधेशी अब अपने को नेपाली कहलाने को नहीं स्वीकारते और नेपालियों ने कभी किसी मधेशी को नेपाली न माना है और न मान सकते ।
झापा, मोरंङ्ग, सुनसरी, कंचनपुर और कैलाली को अखण्ड देखने बाले लोगों द्वारा वहाँ जनमत संग्रह कराने की बात करते हैं । वही जनमत संग्रह बाँकी के मधेश के जिलों में क्यूँ नहीं हो सकता ? मधेश में मधेशी जनता के बीच नेपाल या मधेश देश के विकल्पों को चुनने के लिए जनमत संग्रह की माँग तो हो ही रहीे हैं । नेपाली राज्य सम्पूर्ण मधेश में जनमत संग्रह कराये । अगर मधेशी जनता नेपाली ही बनना चाहती है तो फिर कोई बात ही नहीं । नेपाली राज्य इस बात को मान लें कि उसके विखण्डनकारी कह देने या नेपालगञ्ज प्रशासन के तरह स्वराजियों पर अत्याचार ढा देने से स्वतन्त्र मधेश के मुद्दा कमजोर नहीं हो सकता ।
मधेशी मोर्चा के अनवरत दबाव और आन्दोलन के परिणाम स्वरुप गत मंगलबार अगहन १४ गते के दिन संघीय संरचना के लिए सीमांकन, भाषा और वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता लेने देने का प्रावधान आदि का संसोधन विधेयक प्रस्ताव संसद में ले जाने का काम प्रचण्ड सरकार द्वारा होते ही ओली सरकार में ओली द्वारा हस्ताक्षरित प्रदेश नं. ५ के प्रस्ताव अनुसार हीे प्रचण्ड सरकार द्वारा पेश प्रस्तावों पर ओली के एमाले ने कुछ जिलों में आन्दोलन नाम का सडक नाटक मंचन किया है । वहीं पर मधेशी मोर्चा द्वारा बारम्बार स्वीकार कर ली गयी संविधान को नहीं मानने का दम्भ पेश करते हुए प्रचण्ड सरकार द्वारा संसद में पेश किए गए संविधान संसोधन प्रस्तावों को नहीं मानने, सरकार द्वारा भी मधेशी मोर्चा के हरेक मुद्दों को स्वीकार नहीं किए जाने की घोषणा तथा मधेश विरोधी प्रतिपक्षीें द्वारा घोषित आन्दोलन के बीच कौन सा परिणाम आ सकता है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि एमाओवादी, एमाले और काँगे्रस तक ने मधेशियों को उल्लू बनाने की साजिस रची हो |
परिणाम चाहे जो भी हो, मधेशी जनता अब नेपालियों के साथ किसी प्रकार के माथापिची या नाटकीय मायाप्रेम में रहना पसन्द नहीं कर सकती । नेपालियों का आरोप है कि मधेश अलग देश बन जायेगा अगर मधेशियों को मधेश दिया गया प्रदेश के रुप में । राज्य को समझन लेने में अब देरी नहीं करनी चाहिए कि मधेश अलग होने को ठान चुकी है जिसे नेपाली तो क्या दुनियाँ की कोई सेना या ताकत भी नहीं रोक सकता । क्यूँकि अगर सेना में ही सारी ताकत होती तो सिकन्दर भारत में ही शासक होता, हिटलर भी दुनियाँ पर शासन कर ही रहा होता, अंग्रेज आज भी साम्राज्य के मालिक होते और ज्ञानेन्द्र आज भी नेपाल के राजा होते ।
गे्रटर नेपाल लगायत के कुछ संस्था और राष्ट्रवादी पार्टियाँ यह दावा करते हैं कि नेपाल का बहुत बडा हिस्सा भारत ने ले लिया है, और सुना यह भी जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में गे्रटर नेपाल के लिए ज्ञापनपत्र भी दिए जा चुके हैं । ईश्वर करें कि राष्ट्रसंघ उस ज्ञापनपत्र को मानें और नेपाल को ग्रेटर नेपाल के दावे अनुसार वे भारतीय भू–भाग फिर्ता करा दें ।
और हकिकत यही है कि मधेशी हर हाल में नेपाली जोकों से अलग रहना चाहता है । क्यूँकि वह जोंक मधेशियों का सिर्फ खून ही नहीं चुसता है, अपितु संक्रमणीय दासता और गुलामीपन के रोग भी फैलाने में माहिर हैं । मधेश हर अवस्था में – चाहे वह अलग देश बनकर हों, या ग्रेटर नेपाल के भाग बनकर हों, या फिर नेपालियों के आरोप सही होकर भारत में ही अपने रिस्तेदारों के सुख दुःख के साथ एक हो जायें – नेपाल से अलग रहना ही अपना सुन्दर और स्वस्थ्य भविष्य मानता है ।

loading...

Leave a Reply

1 Comment on "मधेशी हर हाल में नेपाली जोंक से अलग रहना चाहता है : कैलाश महतो"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Pushkar
Guest

Jis thal mein khate ho usmein hi ched jate ho……tum duniya KO he samjhararehye ho hitler aur sikandar ki kahaniya ,bhul gaye agar Nepali apne aukat pe utre toh tujh jaise bhediye k 100 tukde honge

wpDiscuz