मधेशी हिम्मत करें कि काठमाण्डौ त्यागना है, घर लौटना है और वहीं स्वराज चलाना है

कैलाश महतो,परासी,२९ नोभेम्बर | मधेश के बुद्धिजिवियों को अब आगे आ जाना चाहिए

संसार का सबसे पहला देश “मधेश” । देवताओं के आवश्यकता और आशिष से निर्मित देश “मधेश” । वेद, जो “भेद” से अपभ्रंस शब्द है, जिसका अर्थ “रहस्य” होता है–के अनुसार भगवान् विष्णु के इच्छा अनुसार निर्माण किया गया देश है मधेश । महाभारत के अनुसार मध्य देश का प्रथम राजा पृथु रहे–जिन्हें स्वयं भगवान् विष्णु ने राजा बनाया था । कालान्तर में उन्हीं पृथु के शासन रहे भूमि को पृथ्वी कहे जाने का वेदीय प्रमाण माना जाता है । पृथु के शासन रहे इस भूमि को ही सम्राट मनु द्वारा मध्यदेश कहा गया, जिसकी सीमा उत्तर में महाभारत श्रृंखला और दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वत तथा पूरब में प्रयाग और पश्चिम में सरस्वती नदी रहे । देखें मनुस्मृति, अध्याय दो, श्लोक नं. २१, २२ और २३ । सारे वेदों तथा ग्रन्थों की रचना भी इसी पवित्र भूमि पर हुई है ।

aaa
आज वही मध्य देश को अपहरण कर लिया गया है । अपहरणकारी लोग ही आज सीना ठोककर कहने लगे हैं कि मधेश नहीं है । कुछ हद तक उनका सीना ठोकना भी सही ही है, क्यूँकि अपहरित उस मधेश का उसने नाम ही बदल दिया है–जिससे उसका जीवन निर्वाह हो रहा है, ऐशो आराम चल रहा है, वे सु–सम्पन्न हो रहे हैं । कभी कभी ऐसा होता है कि कोई अपराधी किसी बच्चे को अपहरण कर लेता है, बहुत दुर ले जाकर उसका नाम बदलकर अपना बेटा बना लेता है और कालान्तर में वह बच्चा अपने सही पिता का नाम भी भूल जाता है और सारा कमाई उसी अपराधी को सौंपता है । लेकिन क्या वो अपहरणकारी को हम सही कह सकते हैं ? वास्तविकता पता चलने पर कानुन क्या उसे छोड देती है ? वैसे ही सैकडों सालों से कोई किसी का जमीन जोत रहा हो और उस जमीन के सही मालिक को सैकडों साल बाद पता चले कि कोई मूक व्यक्ति द्वारा जोते जा रहे जमीन उसके परदादा का रहा है तो क्या कानुन वह जमीन उसे वापस नहीं दिलाता ?

हम मधेशीयों को इस कानुनी युग में कुछ खोना ही नहीं है, अपितु हमें हमारा मधेश को पून: प्राप्त करना है । बस्, हम हिम्मत कर ले कि हम आजाद हैं । हम गुलामी नहीं करेंगे । हमने आज से करीब ५० रोज पहले ही क्याटेलोनिया को देखा है, जिसने गुलामी की ६०० वर्षों के इतिहास को अलविदा कहकर आजादी की आवाज को बुलन्द की है । हम मधेशी तो वेद, ग्रन्थ, कुरान, त्रिपिटक आदि जैसे मानव जीवन का भेद, रहस्य तथा उद्देश्य उजागर करने बाले ग्रन्थ लेखकों के सन्तान हैं । हम मानव सभ्यता का जग निर्माण करने बाले युग पुरुषों के औलाद हैं । हम तो पढने, पढाने और शिक्षा की ज्योती फैलाने बाले महर्षियों के वंश हैं । हम तो अन्याय और अत्याचारों के खिलाफ लडकर न्याय स्थापित करने बाले वीर महापुरुषों के सन्तान हैं । हमारे पूर्खों ने तो हमें सिखाया है कि अन्याय से लडो और शान से जिओ शेर के तरह । हम राम को पूजते हैं, कृष्ण को मानते हैं, भगवान् शंकर को महादेव कहते हैं । दुर्गा को सत्य की देवी कहते हैं, बुद्ध को अपना पूर्खा मानते हैं । क्यूँ ? क्यूँकि राम ने हराम को मारा, कृष्ण ने अत्याचार को मारा, शंकर ने देवताओं को बचाया, दुर्गा ने सत्य को साथ दिया और बुद्ध ने अहिंसा को फैलाया । लेकिन वे सारे के सारे हमारे पूर्खों ने जो सदाचार किया, वो अकेले संभव नहीं रहा । और आज भी मधेश को काई अकेले बचा नहीं पायेगा, न अत्याचार को मिटा पायेगा ।

आज करीब साढे तीन महीने बित गये मधेश को आन्दालन में । नेपाली राज्य इस आन्दोलन को मानने को तैयार नहीं है । जिस सुजाता के बडे पिता विशेश्वर प्रसाद कोइराला भारत बिहार के तत्कालिन एक सशक्त पार्टी के सचिव हुआ करते थे, वे नेपाली भी हो गये । जो सुजाता जर्मन नागरिक से शादी कर लेती है, सारा घर परिवार और बाल बच्चा बना लेती है, सत्ता के लिए वो फिरसे नेपाली हो जाती है । जो देउवा खुद भारतीय बाप का बेटा होने का प्रमाण देता है, वह भी नेपाल का प्रधानमन्त्री बन जाता है । और २०४६ के कथित प्रजातन्त्र आने से पहले ठमेल के एक आमसभा में भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर जी के “बडे बडे राजायें मिट्टी मे मिल गये और ये तो एक छोटा राजा है ।” कहने पर तालियाँ पिटने बाले अन्ध राष्ट्रभक्त कश्पियन, बेबीलोनियन तथा मेसोपाटोमियन खस नेपाली लोग मधेशियों को राष्ट्रियता और राष्ट्रभक्ति का पाठ पढाते हैं । मधेश आन्दोलन को भारतीय आन्दोलन कहते हैं । अगर मधेश आन्दोलन भारतीय है तो मधेशियों का दोहन, शोषण और पीडा क्या है ? ये भी भारतीय है ?

कुछ मधेशी बुद्धिजिवी लोग काठमाण्डौ में ही मधेश का हिसाब किताब निकालने में व्यस्त दिख रहे हैं । उनके बुद्धि पर हमें गर्व होता है । मगर उनके लाचारीपन पर हमें तरस आती है | बेचारे बुद्धि के मालिक भी काठमाण्डौ में ही दिन बिता रहे हैं । मधेश में पैदा होकर काठमाण्डौ में क्या चले गये, वे काठमाण्डौ बाले हो गये हैं । काठमाण्डौ उन्हें तिरष्कार ही क्यूँ न करे, उन्हें दुत्कार ही क्यों मिले, काठमाण्डौ भले ही उन्हें छोड दे, लेकिन वे नहीं छाडेंगे । वे इमानदार हैं ।

काठमाण्डौ को नहीं छोडने के उनके इमानदारी ने ही कुछ ही वर्षों में थप बर्दिबास को खा लिया, फूलजोर को खा लिया, चन्द्रनिगाहपुर और पथलैया को खा लिया, इटहरी को खा लिया और कुछ ही वर्षों में विराटनगर, राजविराज, जनकपुर, मलंगवा, गौर, कलैया, बीरगंज, नेपालगञ्ज आदि को भी खाने बाला है । आज मधेशी मोर्चा का कार्यकम इटहरी में नहीं हो पाया, फलजोर में सडक जाम मोर्चा ने नहीं कर पाया, बर्दिबास को बन्दी में बस पार्क बनाया गया ।

मधेशी हिम्मत कर ले कि हमें काठमाण्डौ त्यागना है, अपने घर को लौटना है और वहीं स्वराज चलाना है तो हम सारे के सारे बुद्धिजिवी, व्यापारी, शिक्षक, पाध्यापक, पेशाकर्मी आदि अपना मधेश देश पुन:स्थापना जल्द से जल्द कर सकते हैं ।

“आप इरादा पक्का बनायें, हम आपको आजाद मधेश देंगे ।”

Loading...