मधेश आंदोलन का अंंजाम क्या होगा ?

मनोज कुमार कर्ण:आखिरकार २० सितम्बर २०१५ यानि कि विक्रम संवत् २०७२ साल आश्विन ३ गते रविवार को नेपाल के मधेश क्षेत्र में हो रहे मधेशियों के अधिकार का आंदोेलन को नजरअन्दाज करते हुए संविधान बहुल कार्यकर्तावाले काँग्रेस, एमाले, एमाओवादी, राप्रपा नेपाल (कमल थापा), माले (सीपी मैनाली) जैसी पार्टियाँ सबने मिलकर संविधान घोषणा कार्य कर ही डाला । नेपाल में मधेशी कहने से मधेश क्षेत्र में, उपर लिखित पार्टियाँ में सदियाँे से पहाड़ी द्वारा ठगे जाने के बाद भी विविध कारणवश गुलामी को गले लगानेवाले को छोड़कर, आम मधेशी, थारु, मुस्लिम सब को जाना जाता है । इनकी जनसंख्या तथा भौगोलीकरूप से मधेश में रहने वालों अन्य जाति को भी लिया जाय तो देश की जनसंख्या का करीब ५१ फिसदी है । संविधान घोषणा के महीनों पहले से मधेश क्षेत्र में न केवल नेता और पार्टियाँ बल्कि आम मधेशी के प्रत्यक्ष संलग्नता मेंं हो रहे मधेशी अधिकार के आंदोलन को तृण बराबर भी अपने अहंं से न गिनकर मधेश विरोधी संविधान को लागू किया गया । इस आंदोलन को बहुत तरह से पहाड़ी बहुल पार्टी के नेता लोग बद्नाम करने को सोचा । कोइ कुछ भी क्यों न बोले पर इस बार एक ही सारांश देखा गया कि मधेश आंदोलन को जानबुझकर भटकाने के लिए और विश्वस्तर पर कन्फ्यूजन करने के लिए उपर लिखे गये पार्टियाँ के तत्कालीन प्रधानमंत्री सुशील कोइराला, गृहमंत्री वामदेव गौतम और अन्य शीर्ष कहलानेवाले नेता वर्तमान प्रधानमंत्री केपी ओली, प्रचण्ड, शेरबहादुर देउवा, रामचन्द्र पौडेल, माधव कुमार नेपाल, झलनाथ खनाल, विजय गच्छेदार, कृष्ण प्रसाद सिटौला, भीम रावल, लेखराज भट्ट, रमेश लेखक, मीनेंद्र रिजाल जैसे नेतागण कभी ‘मधेशी का मांग अस्पष्ट है या फिर मधेशी को भारत ने आंदोलन करने को कहा है या संविधान पढ़ के तो मधेशी देखें उसमे हर सुविधा दी गई है या सार्क÷विश्व में ही यह संविधान उत्कृष्ट है’ कहते रहें हैं ।
नया संविधान दरअसल में पहाड़ी नेता कुछ भी कहें पर यह पहलेवाली अंतरीम संविधान २००७ जनवरी १५ तारीख से भी मधेशी के अधिकार के मामले में बदतर है । इस नयी संविधान २०१५ में, कानून जाननेवालों के मुताबिक, देश के हरेक सरकारी नौकरियाँ और राजनैतिक÷संवैधानिक नियुक्ति में जनसांख्यिक समानुपातिक प्रतिनिधित्व की सुनिश्चितता को हटा दिया गया है तो वहीं जनसांख्यिक के भार पर देश में निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण, सभी मधेशियों को पहाड़ी जनता के स्वाभिमान बराबर की नागरिकता÷सिटिजनशीप का प्रदान करना, राज्य की पुनर्संरचना में मधेश का सभी भाग को अक्षुण्णरूप से मधेश में ही प्रदेश या संघ का निर्माण किया जाय जैसे कुछ भी मधेशी का इस नेपाल नामक देश में अपना जल, जमीन, जंगल पर आत्मनिर्णय दर्शाते हुए स्वायत्तता देखानेवाला मांग को नहीं रखा गया है । हाँ, अवश्य किसी पड़ोसी या नेपाल से सामरीक महत्व रखनेवाले देश का अपना क्षेत्रीय संंतुलन के लिए कुछ अहं सवाल नयी संविधान में रखाजाय मनसुवा रहा होगा । चीन, बेलाएत, अमरीका के साथ भारत का भी रहा होगा पर जनता को इस क्षेत्रीय राजनीति से पहले अपने रोजमर्रा की जिंदगी कम से कम अब सदियों जैसी गुलामी का न रह जाए, इसी से परेशान रहते हैं । सो मधेशी भी इसी शाश्वत सत्य को लेकर अभी तक आंदोलित रहते हुए परेशान है । हालांकि नेपाल के जनसांख्यिक हिसाब से तकरीबन ९० फिसदी जनता हिन्दू सापेक्ष राज्य नेपाल को घोषणा की जाय की अपेक्षा करते हुए संविधान घोषणा के पूर्व महीनों से प्रतिदिन राजधानी काठमाण्डू सहित देश के अन्य भाग में प्रदर्शन, नारा, जुलुस करते रहे जिसमें केवल साधुसंत उपस्थित न होकर आम जनता, नेता, विद्यार्थी, महिला सबों का उपस्थिति रही । परन्तु उपर लिखे गये पहाड़ी बहुल सत्ताधारी तथा संविधानसभा में अभी के हिसाब से बहुमत में रहने का दाबा करनेवालों ने एक भी किसी की नहीं सुनी और वही किया जो धर्मनिरपेक्षता के लिए विदेश से करोड़ों रुपये नेताओं के हाथ में थमा दिया गया ।
अंग्रेजी विषय का ‘आइरनी’ शब्द तो तब देखा गया नयी संविधान घोषणा के दौरान जब संविधान के पक्ष में कोइ ८५ तो कोइ ९० फिसदी जनमत का ढिंढोरा पीटा जबकि सारा मधेश में उस रोज विरोध में ब्ल्याक आउट था, देश में कफ्र्यू था तो फिर संविधान के विरोध में ही पूरव–पश्चिम नेपाल के राजमार्ग ११३५ कि. मी लम्बी लोगों ने हाथ जोड़ कर लाइन बनाकर अपनी एक्यबद्धता जताई । संविधान घोषणा करने का कोई भी संवैधानिक विधि फास्ट ट्रयाक के नाम पर पालन नहीं किया गया ! इतना ही नहीं, संविधान वास्ते जनता से चोरीछुपे महीनों दिन में की जानेवाली सलाह कर्म केवल दो दिन में किया गया जहां प्रचण्ड, माधव नेपाल जैसे नेता पर लोगों ने मधेश में कुर्सी और जुत्ते फेंककर अपना क्रोध दिखाया । यह कैसा बहुमत था और है ? मधेश के २० जिलों में इस संविधान को लगातार, इस आर्टिकल को लिखने के दिन तक, लोेग विरोध करते आ रहें हैं । समाचार के मुताबिक करीब ५० लोग असंवैधानिक परिचालित सेना के आड में और गृहमंत्री वामदेव गौतम का सितंबर ८ तारिख को नेपाल पुलिस के डीआइजीपी को दिए गए ‘मधेशी आंदोलनकर्मी को दबाओ, नेता भी आए तो फिल्ड में गोली मारदो, संविधान घोषणा सितंबर २० या २२ के दिन मीडिया में सेंसर लगाया जाएगा, जितना गोलीगट्ठे खरीदना हो सो खरीद लो’ इस निर्देश के मुताबिक मारे जा चुके हैं । सैकड़ों लोग घायल हैं । कोई पानी पी रहा था, आंदोलनकर्मी कह के मधेशी शब्द से ही नफरत रख उसे मार दिया गया । हमारे महोत्तरी जिले में एक ही घर का पहले पोते को पहाड़ी पुलिस ने गोली मारा तो कफन के लिए बाहर निकले उसके अपने दादाजी को भी गोली मारी गई । इतना ही नहीं अधिकार के आंदोलन को दबाने के लिए सेना और पुलिस ने मधेशी के घर में रात में घुसकर महिलाओं के साथ बदसलुकी की । पर्सा जिले में उषा श्रीवास्तव और कलावती जैसे बहुत महिलायें का संवेदनशील अंग में पहाडी पुलिस ने मधेशी शब्द को घृणा करते हुए मारा । जब की अप्रील २५ तारिख को नेपाल के पहाडी इलाके में गए महाभूकंप के दौरान पडोसी देश भारत सहित मधेशी लोगों ने आधा पेट खाकर इन पहाडी लोगों के लिए खाने, कपडे और मकान का सामान ट्रकका ट्रक पठाए । मधेश में हमारी बहनों, माताओं, भाइयों को जब छाती, सर में राज्य आतंक से गोली मारी गयी तो पहाडी जनता किसी ने नहीं विरोध जताया । वे लोग मधेशी के मातम पर तीज में नाचते रहे ! मधेश में रक्षाबंधन, कृष्ण जंन्माष्टमी जैसे सब त्योहार में मधेश के हर शहर में दंगा, निषेधित क्षेत्र और संकट काल लगाये जाने के कारण फीका तो पड़ा ही, वहीं मधेशी शहीदों की लाश घर में थी तो इधर पहाड़ी पार्टियाँ और नेता मधेश विरोधी संविधान घोषणा करते हुए दीपावली मनायी गई ।
आज मधेशी अड़े हुए हैं कि अपने अधिकार को पाकर रहेंगे । मधेशी का वर्षों पहले सन् २००७ का सितंबरवाले २२ बँुदे और २००८ का फरबरी २८ तारीखवाले ८ बँुदे राज्यद्वारा किया गये मधेशी के समझौते को नये संविधान में स्थान दिलाकर रहेंगे । अगर यह ग्यारेंटी एमाले पार्टी और उसकी सबसे बडी मधेश विरोधी प्रधानमंत्री केपी ओली तथा दूसरे पहाड़ी पार्टियाँ नए संविधान में नहीं करते हैं तो मधेशी जनता अब वार्ता के नाम पर राज्य के किसी झांसे में नहीं फंसेंगीे और विश्वस्तर पर इस संविधान को नहीं मानने की अपील भविष्य में भी करती रहेगी । क्योंकि अगर इतने शहादत देनें के बाद भी हम मधेशी को उल्टे पहाड़ी लोग राज्य के वैधानिक गोली से मारकर हमारी भाइ, माँ, बहनों की जान और इज्जत लेता है तो हम तो यही कहेंगे कि ‘हाय अल्लाह ! तुने शैतान तो पैदा कर दिया पर उसे खत्म करनेवाला फरिश्ता को पैदा करना भूूल गया !’ ‘इस बार नहीं तो फिर कितनी पीढियाँ पीछे’ वाली सोच मधेशी आम पब्लिक में आप पढ सकते हैं । अगर संविधान में अधिकार का ग्यारेन्टी नहीं की जाती है तो वे लोग अब इस नेपाल में ही नहीं रहेंगे कह के जनमत संग्रह की माँग जोरशोर से उठाने लगे हैं जो नेपाली हुकुम्मत के लिए पेट से कचुम्म निकाल देनेवाली बात है । समय रहते ही शासकवर्ग को अंधापन दूर हो जाए तो अच्छा है । मधेशी को इस देश में नेता और जनता कोई भी पहाड़ी अपना नहीं दिखाई देता है । आज इन शैतान पहाड़ी जनता और नेता (मधेश विरोधी) को मधेशियों को गोली मारने के बाद और मधेशी विरोधी संविधान घोषणा करने के बाद भी विना मधेशी का मांग संविधान में समाविष्ट करते हुए पेट्रोलियम पदार्थ, एलपी गैस दशैं में मांसभात खाने के लिए चाहिए वरना मधेशी और भारत, इनके लिए, मानवता विरोधी है !

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