मधेश आंदोलन की वर्तमान चुनौतिया“

मधेश की जनता के प्रति नेपाली सरकार के इसी रवैये से स्पष्ट हो जाता है कि सिंह दरबार और मधेशी जनता के बीच के सम्बन्ध की प्रकृति कैसी है

सत्तासीन कम्यूनिष्ट और समाजवादी नेता मधेशियों को नजरअंदाज कर दिल्ली से सीधा सम्बन्ध स्थापित करने के लिए हिंदुत्व की विचारधारा को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, लेकिन मधेशी को संविधानतः सारभूत अधिकार देने के लिए कतई भी तैयार नहीं हैं ।

सरिता गिरी:मधेश आंदोलन पाँच महीनों की लम्बी अवधि को पूरा कर चुका है और अनिश्चितकालीन हड़ताल मधेश में अभी भी जारी है । स्थिति

sarita giri

सरिता गिरि,महिला नेतृ

अत्यन्त नाजुक है । मधेश की अवस्था उस अपहृत विमान जैसी हो चुकी है जिसमें बैठे हुए मधेशी सवारों को रह रह कर मार दिया जाता है, पूरे मधेश को आतंकित बनाए रखने के लिए और साथ ही मधेश आंदोलन के समर्थक पडोसी देश भारत को झुकाने के अथवा झुकाकर मनाने के लिए । निश्चित रूप से जीवित सीने को चीरने वाली हरेक इस्पात की गर्म गोली के साथ यही संदेश भेजा जाता है कि भारत पीछे हटो और मधेश आंदोलन के मुद्दों से अपने आप को अलग करो । मधेश की जनता के प्रति नेपाली सरकार के इसी रवैये से स्पष्ट हो जाता है कि सिंह दरबार और मधेशी जनता के बीच के सम्बन्ध की प्रकृति कैसी है । लेकिन क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में जल रहा सिंह दरबार २००७ साल से मधेशियों की असंख्य कुरबानियों के बावजूद आज भी नेपाली सत्ता यह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि लगभग तीन शताब्दियों के नेपाल के आधुनिक इतिहास के बाद मधेशियो को ऐसा क्यों लग रहा है कि वे औपनिवेशिक नेपाली शासन की दासता की जंजीर में छटपटा रहे हैं और इससे मुक्ति पाने के लिए वे हरेक प्रकार की कुरबानी देने के लिए आज भी तैयार हैं । नेपाल में मधेशी के सिर्फ आधुनिक इतिहास को ही लिया जाए तो मधेशियों का नेपाल में इतिहास अमेरिका में अफ्रीकन अमेरिकन के इतिहास से भी पुराना है । हालाँकि यथार्थतः यह सम्बन्ध सनातन काल से ही है । लेकिन अमेरिका में अफ्रीकन अमेरिकन

२०६२÷६३ के मधेश आंदोलन के दौरान स्वर्गीय गिरिजा प्रसाद कोइराला ने कम्यूनिष्टों के विरोध के बावजूद जिस प्रकार से मधेश आंदोलन को सम्बोधन किया था, उस प्रकार का नेतृत्व करने में कांग्रेस २०७२ साल में सरकार का नेतृत्व अपनी हाथ में रहने के बावजूद असफल रही है ।
मूल का एक व्यक्ति जिसका पिता विदेशी था और माँ अमेरिकन, अमेरिका का राष्ट्रपति हो चुका है जबकि मधेशी आज भी नेपाल में बराबरी का नागरिक होने के लिए अपना खून बहा रहा है । यह तथ्य ही इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि मधेशियों की दशा नेपाल में कैसी है ।
हाल के दमनकारी घटनाओं की श्रृंखला ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि मधेशियों का नेपाल में अस्तित्व भारत के संरक्षण पर ही टिका है और इस बार भारत भी भारत की जनता के साथ मधेशियों के रोटी और बेटी के सम्बन्ध को खुले रूप से स्वीकार कर परम्परागत कूटनीति के तरीकों से अलग तरीकों से प्रस्तुत हुआ है जो कि बहुत मायनों में एक स्वागत योग्य कदम है । भारत की इस बार की प्रस्तुति ने नेपाल भारत दौत्य सम्बन्ध में नये आयामों को जोड़ा है जिसका असर आने वाले दिनों में पूरे दक्षिण एशिया पर पडेÞगा । दक्षिण एशिया में श्रीलंका में तमिलों के संहार के बाद कुटनीतिक क्षेत्र में एक नयी शुरुवात के साथ यह अवधारणा विकसित हो रही है कि दो देशों के बीच दौत्य सम्बन्धों के लिए राज्य की सार्वभौम सत्ता ही नहीं बल्कि राज्य की जनता भी मायने रखती है और यह शुरुआत लोकतंत्र, शांति और सामाजिक न्याय के विस्तार के लिए ये सकारात्मक शुरुआत हैं । निश्चित रूप से यदि मधेश के पिछवाडे में भारत नहीं होता तो मधेशियो की अवस्था नेपाल में वैसी ही होती जो श्रीलंका में तमिलो की हुई । यह हम नहीं भूल सकते की इक्कीसवीं शताब्दी में जब तमिलों पर श्रीलंका में बम बरसाये जा रहे थे तो विश्व में लोकतंत्र तथा शांति के लिए कार्यरत संयुक्त राष्ट्र संघ लगायत विश्व की अन्य संस्थाओं के होने के बावजूद भी तमिलों की हत्या को रोकने में ये संस्थाएँ कामयाब नहीं हो पायीं । यह भले ही दूसरी बात है कि आज तमिलों की हत्या की छानबीन के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ क्रियाशील है । बोस्निया हर्जगोभिना में भी नैटो और अन्य अंतर्राष्ट्रीय समुदाय सक्रिय भी हुए तो उनको भी युद्ध का रास्ता ही चयन करना पड़ा । कहने का तात्पर्य यह है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के पास आज युद्ध अपराधियों को सजा दने के लिये अंतर्राष्ट्रीय अदालत जैसी संस्थाएँँ हैंं लेकिन युद्ध की त्रासदी और यातना को रोने के लिए विश्व समुदाय के पास कारगर संस्थाएँ और पर्याप्त कुटनीतिक अवधारणाएँ आज भी नहीं हैं । सीरिया और इराक में जारी युद्ध भी इसके प्रमाण हैं । युद्ध आज भी अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति के क्षेत्र में देशों द्वारा राजनीतिक स्वार्थ की पूत्र्ति के लिए एक आवश्यक और कारगर अस्त्र के रूप में ही देखा जाता है । मधेशी आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में भारत की सक्रियता यदि आंतरिक युद्ध जैसी अवस्था को रोकने में कामयाब रही है और यह भारत की कूटनीतिक सफलता है ।
तब प्रश्न यह उठता है कि इतनी लम्बी अवधि के बाद भी मधेश आंदोलन की मांगों का सम्बोधन क्यों नहीं हो रहा है ? बहुत सारे मुद्दे जिन्हें नेपाल सद्भावना पार्टी प्रारम्भ से उठाती आ रही थी जिन मुद्दों का अंतरिम संविधान तक आते आते सम्बोधन हो चुका था, हाल का संविधान उन समझौतों से पीछे हटा है । इससे स्पष्ट होता है कि संघीय शासन व्यवस्था के आने से सिंह दरबार के सत्ता केन्द्र को जो क्षति पहुची है, उनकी पूत्र्ति करने के लिए सिंह दरबार मधेश पर नियन्त्रण के नये तरीकों को स्थापित करने में लगा है । मधेश आंदोलन की मांगें और बातें कोई नई नहीं हैं । रूपान्तकारी परिवत्र्तन करने वाला जन आंदोलन २१ दिनों में ही सफल हो चुका था लेकिन मधेश आंदोलन अटका हुआ है । यह स्पष्ट है कि अभी की आंतरिक और वाह्य अवस्था जन आंदोलन से भिन्न है । जन आंदोलन में जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक दल एक परम्परागत निरंकुश राजतंत्र के विरुद्ध एकजुट थे । आज की अवस्था भिन्न है । इसीलिए बाह्य शक्तियों का हस्तक्षेप कम समय में ही कारगर प्रमाणित हुआ । आज टकराहट राजनीतिक दलों के बीच है । जन प्रतिनिधि राजनीतिक दलों के बीच टकराव की अवस्था का शीघ्र ही संवैधानिक और कानूनी समाधान नहीं निकलता है तो स्थिति संविधान की विफलता की सीमा तक जा सकता है । आज की अवस्था सरल भी नहीं है । आज बीजेपी सरकार को रिझाने के लिए साम्यवादी और समाजवादी अघोषित रूप से नेपाल को हिंदू देश बनाने के लिए तैयार है लेकिन मधेशियों और मधेश को बराबरी का अधिकार देने के लिए तैयार नहीं है । सत्तासीन कम्यूनिष्ट और समाजवादी नेता मधेशियों को नजरअंदाज कर दिल्ली से सीधा सम्बन्ध स्थापित करने के लिए हिंदुत्व की विचारधारा को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, लेकिन मधेशी को संविधानतः सारभूत अधिकार देने के लिए कतई भी तैयार नहीं हैं । नेपाल के समाजवादियों तथा साम्यवादियों का यह विशिष्ट नेपाली चरित्र है जो विश्वव्यापी चरित्र से मेल नहीं खाता है और जो उनकी विचारधारा से असंगत है । ढिलाई का दूसरा दूसरा कारण यह है कि अभी की राजनीति सत्ता परिवत्र्तन के खेल से भी जुड़ी हुई है । कांग्रेस अपने महाधिवेशन को सम्पन्न कर अगली सरकार अपने नेतृत्व में बनाने की तैयारी में है और वह मधेश की मांगों के प्रति कांग्रेस की विचारधारा स्पष्ट नहीं है । एकीकृत नेकपा माओवादी मधेश के मुद्दों का सम्बोधन राष्ट्रीय सरकार के गठन के साथ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुप से जोड़ रहा है । मांगों के सम्बोधन के पहले अगर एमाले नेतृत्व की सरकार गिरती है तो मधेश मुद्दों के सम्बोधन के लिए संविधान संशोधन लगभग असम्भव हो जाएगा । सत्ता के त्रिशंकु खेल में अभी मधेश लटका हुआ है । आज की इस अवस्था में तीन प्रमुख दलों को मधेश के बारे में एकमन और एकरूप बनाने वाली ताकत कहाँ से आयेगी, यह देखना अभी बाकी है ।
दलीय व्यवस्था अन्तर्गत सिंह दरबार पर अपनी पकड़ बनाये हुए क्रियाशील राजनीतिक दलों की विचारधारा और दृष्टिकोण और उनके बीच के अन्तर्सम्बन्ध को भी समझना होगा । इस बात को कदापि नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है कि उदारवादी लोकतंत्र में विश्वास करने वाली तराई कांग्रेस और नेपाल सद्भावना पार्टी जैसी पार्टियों का जन्म नेपाली कांग्रेस के गर्भ से हुआ है । इससे यह समझा जा सकता है कि मधेश की समस्या का जन्म कांग्रेस के गर्भ से ही हुआ है । कांग्रेस के बाद निर्दलीय पंचायती व्यवस्था शुरुआती दौर से ही मधेशी के दमन और मधेश के औपनिवेशिक शोषण के पक्ष में रही । इसके अलावा पंचायती व्यवस्था पक्षधर और कांग्रेस के बाद जन्मी हुई कम्युनिष्ट पार्टियो के बीच के सम्बन्ध और मधेश के प्रति के उनके दृष्टिकोण को देखा जाए तो इन दोनों के बीच कोई खास अंतर नहीं है । लोकतंत्र और परम्परागत राष्ट्रीयता के बीच द्वन्दकाल में इन्होंने सदैव परम्परागत राष्ट्रीयता अर्थात खस शासक वर्ग की राष्ट्रीयता को ही चुना दिया है । पंचायतकाल के दौरान निर्दलीय पंचायती विचारधारा के साथ कम्यूनिष्टों की निकटता भी उसका प्रमाण है और देखा जाए तो पंचायत के पक्षधर शक्तियों का जब क्षय हुआ है तो कम्यूनिष्टों की ताकत बढ़ी है ।
यह भी सत्य है कि माओवादी जनयुद्ध के बाद कम्युनिष्ट पार्टियों के गर्भ से ही मधेश की मुक्ति के लिए अलग से बंदूकें निकली हैं । अर्थात् सामंतियों के विरुद्ध वर्ग संघर्ष का ऐलान करने वाली कम्यूनिष्ट पार्टियाँ भी मधेश की अपेक्षा और आकांक्षा को समेट कर सम्बोधन करने में असफल रही हैं ।
लेकिन इस बीच कुछ सकारात्मक परिवत्र्तन भी दिखे हैं । अभी मधेशी मोर्चा और विरोधी पक्ष के बीच का द्वन्द सिर्फ पहाड़ी और मधेशी के बीच का द्वन्द नहीं है क्योंकि पहाड़ की जनजाति समुदाय भी अपनी पहचान और अधिकार के लिए जाग चुकी है । सामुदायिक पहचान से परे पहाड़ी समुदाय में वर्गीय चेतना भी जाग चुकी है और परम्परागत राष्ट्रीयता से परे सम्पूर्ण देश को प्रेम करने वाली जनता के मन में एक नए देश प्रेम का भाव भी जग चुका है जो देश में सहज जीवन के लिए विकास चाहता है और प्रगतिशील विकास के लिए सम्पूर्ण नागरिकों के समान अधिकार के पक्ष में है । परम्परागत संकीर्ण राष्ट्रीयता के पक्ष में अब सिर्फ सिंह दरबार और वे राजनीतिक दल हैं जो सिंह दरबार पर अपनी पकड़ बनाए हैं । मधेश आंदोलन अभी समस्त शोषित पीडि़त जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व कर रहा है ।
नेपाल सदभावना पार्टी ने जिस मधेश आंदोलन की नीव २०४६ साल में रखी उसको परिपक्व होने में लगभग १७ वर्ष तो लगे लेकिन २०६२ ६३ और उसके बाद २०७२ साल के मधेश आंदोलन ने पूरे देश और पुरानी पार्टियों की जड़ों को मधेश में झंकझोर कर रख दिया है और आज जब कम्यूनिष्ट और मधेशवादी दो विपरीत ध्रुवो पर खड़े हुए हैं तब अपने आप को मध्यमार्गी कहने वाली कांग्रेस की अवस्था भी नाजुक है । २०६२÷६३ के मधेश आंदोलन के दौरान स्वर्गीय गिरिजा प्रसाद कोइराला ने कम्यूनिष्टों के विरोध के बावजूद जिस प्रकार से मधेश आंदोलन को सम्बोधन किया था, उस प्रकार का नेतृत्व करने में कांग्रेस २०७२ साल में सरकार का नेतृत्व अपनी हाथ में रहने के बावजूद असफल रही है । इसीलिए आज की अवस्था अत्यन्त तरल है और ऐसी तरलता की अवस्था में देश बाहर की शक्तियों की सक्रियता स्वाभाविक है । लेकिन मधेश और नेपाल की समस्याओं का समाधान भारत और चीन के बीच सही और संतुलित समझदारी के आधार पर ही सम्भव है । आज चीन की प्रथम आवयकता स्थिरता और क्षेत्रीय सुरक्षा है तो भारत भी निश्चित रूप से लोकतंत्र, स्थिरता और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए क्रियाशील है । मानव अधिकार, लोकतंत्र तथा विकास के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ, अमेरिका और यूरोपियन समुदाय की चिंता और सक्रियता भी अपनी जगह स्वाभाविक है, लेकिन आगे का रास्ता अभी भी धुंधला ही है ।

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