मधेश आंदोलन पहचान की लड़ाई

‘होनहार बिरवान के, होत चिकने पात’, बचपन से ही रचनात्मक सोच रखने वाले आलोक कुमार शुक्ल का जन्म कपिलवस्तु के एक छोटे से गाँव बरकुल में हुआ ।’ फिल्म एण्ड टेलिविजन इन्टीट्यूट आफÞ इण्डिया, पूना ‘से पोस्ट ग्रेजुएट इन सेनेमैटोग्राफÞी कर चुके शुक्ल जी से, गंगेश मिश्र द्वारा लिए गए, साक्षात्कार का संपादित अंश ः
० आप अपने बारे में, अपने कैरियर के विषय में कुछ बताएँ ।
– जैसा की आप जानते ही हैं, मैंने फिल्म एण्ड टेलिविजन इन्स्टीट्यूट आफÞ इण्डिया, पूना से सेनेमैटोग्राफÞी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया हुआ है । शुरूआती दौर में, मैंने लघु फिÞल्में, कुछ विज्ञापन भी किए । मेरी लघु फिल्म “गार्वेजÞ” कैनेस फिल्म फेस्टिवल मे नामांकित हुई, “जोश” में टीम इण्डिया के लिए म्यूजिक विडियो भी किया है । मैंने अबतक नेपाली म्यूजिक विडियो के साथ ही साथ चार विज्ञापन में भी काम किया है और मधेश आन्दोलन पर बनी डकुमेन्ट्री ‘ब्लेक बुद्धा, रेवुलूशन ‘में पहली बार निर्देशन भी किया है । फिÞलहाल इस वक्त, एक नेपाली लघु फिल्म’ कलम’ सूर्खेत में शूट कर रहा हूँ और आगामी १५ गते से नेपाली फीचर फिÞल्म’ लाहूरे’ करने वाला हूँ ।

आलोक कुमार शुक्ल

आलोक कुमार शुक्ल

० आपके मन में, मधेश आन्दोलन पर ‘ब्लेक बुद्धा, रेवुलूशन’ डकुमेन्ट्री बनाने का विचार कैसे आया ?
– सीधा सा जवाब है, मधेश मेरा घर है, मेरी आत्मा बसती है, इसमें । मधेश को अपने पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, अधिकार की बात तो पूछिए ही मत । हमने सोचा, क्यूँ न एक ऐसा कार्य किया जाय, जिसके द्वारा विश्व पटल पर मधेश और मधेशियों की आवाजÞ पहुँचाई जा सके । जिसका एक सरल माध्यम था, डकुमेंट्रीस जो मेरा पेशागत क्षेत्र भी है । मधेश आन्दोलन के दौरान सरकार द्वारा, मधेशियों पर जो अमानवीय व्यवहार किया गया, उसने मुझे बहुत प्रभावित किया ।
० मधेश के इस आन्दोलन को, किस रूप में देखते हैं ?
– मधेश के इस आन्दोलन को, मैं पहचान की लड़ाई के रूप में देखता हूँ । जहाँ अधिकार कुंठित होती है, वहाँ संघर्ष अवश्यंभावी है और यही हो रहा है, नेपाल में । मधेश में एक और बड़ी समस्या है, जो है नागरिकता की, अब अगली डकुमेन्ट्री इसी विषय पर बनाने का इरादा है ।
० इस डकुमेन्ट्री का नाम ‘ब्लेक बुद्धा रेवुलूशन‘ रखने की खास वजह ? और इसकी पृष्ठभूमि क्या है ?
– विश्व में नेपाल की पहचान गौतम बुद्ध से है, चूंकि मधेश के लोग काले वर्ण के होते हैं, इसलिए प्रतीक के रूप में मधेश के लोगों को’ ब्लेक बुद्धा’ के रूप में प्रस्तुत किया गया और इस डकुमेन्ट्री को ‘ब्लेक बुद्धा रेवुलूशन ‘का नाम दिया गया है । यह डकुमेन्ट्री मधेश के इतिहास पर प्रकाश डालती है, जैसे मधेशी कब से ? मधेश कब से नेपाल का हिस्सा बना ? मधेशियों की पहचान, नेपाल के अर्थतंत्र पर मधेश का प्रभाव तथा हिस्सेदारी, पहाड़ की तुलना में मधेश का विकास न्यून क्यूँ है ? आदि विषयों पर आधारित है, ये डकुमेन्ट्री ।
० इस डकुमेन्ट्री के माध्यम से, आपने मधेश आन्दोलन को किस प्रकार प्रस्तुत किया है ?
– मधेश के संदर्भ में, यदि कहा जाय तो देश के सम्पूर्ण भाग का मात्र २३% भू–भाग का प्रतिनिधित्व, करता है । फिर भी देश की अर्थ व्यवस्था पूरी तरह, इसी भू–भाग पर निर्भर हैस इसके लिए यह कहना उपयुक्त होगा कि मधेश देश का मेरुदंड है ।
जहाँ ८७% वन स्रोत है, देश के सम्पूर्ण मालपोत का ८५% मधेश से उठता है । ९३% अंतः शुल्क, ७०% भन्सार, ७७% आयकर, इतना सब कुछ देश को देने के बावजÞूद, देश के बजेट का १२% ही मधेश के विकास पर खर्च होता है । यह मधेश के साथ सौतेला व्यवहार नहीं है, तो और क्या है ? ‘ब्लेक बुद्धा रेवुलूशन ‘में इस विषय को भी उठाया गया है ।
० अंत में, आप अपने इस डकुमेन्ट्री के माध्यम से मधेश को क्या संदेश देना चाहते हैं ? आप रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े हैं, आपने नेपाली लघु फल्मिें भी कीं और अभी कर भी रहे हैँ फिर भी आप ‘ब्लेक बुद्धा रेवुलूशन’ जैसी डकुमेन्ट्री बनाकर साम्प्रदायिक भावना को प्रभावित नहीं कर रहे हैं ?
– हा हा हा (हँसते हुए ) मैं शान्ति और भाईचारे का ही संदेश देना चाहूँगा, साम्प्रदायिक भावना को भड़काना हमारा काम नहीं है, हमारा काम लोगों को सच्चाई से रूबरू करना मात्र है । चूंकि मधेश क्षेत्र में पैदा हुआ, पला– बढ़ा, खेला अपनी मिट्टी का कर्जÞ है, मधेश अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहा है, अपहृत अधिकार को पाने की लालसा में हमारे बहुत से भाई शहीद हो गए । ऐसे में हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि हम भी अपनी धरती के लिए कुछ करें, जितना हम कर सकते हैं । ‘ब्लेक बुद्धा रेवुलूशन ‘के माध्यम से यथार्थ को दर्शाने की कोशिश की है ।
मेरी शुभेच्छा यही है, कि देश में समता की भावना का विकास हो, हर किसी को अपने अधिकारों से कुंठित न होना पड़े । भेदभावपूर्ण रवैया, जो मधेश और मधेश के निवासियों को भोगना पड़ा है, ऐसे व्यवहार को हतोत्साहित करना होगा । लोगों में एकता की भावना बलवती होनी चाहिए, जैसा कि मधेश आन्दोलन के दौरान देखने को मिला ।
अंत में,
‘हर कÞदम पर काँटे हैं, जिन्दगी के,
फूल खिलते नहीं, खिलाना पड़ता है,
हकÞ की लड़ाई में, कितने शहीद हुए,
कौन गिनता है, पर सरफÞरोशी की,
तमन्ना में, मुस्कुराना पड़ता है ।’

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