मधेश आजादी मुमकिन है बस मधेशी दल गिरगिट की तरह रंग ना बदले ः मधेशी युवा

मनोज बनौता …विगत के मधेश आन्दोलन को गौर से देखा जाए तो लगता है कहीं ना कहीं मधेशी नेतागण चूके है । मधेशी दलों मे व्याप्त आन्तरिक वैमनस्यता के कारण ही सरकार द्वारा मधेश की माँग को दरकिनार किया जा रहा है । हमारे नेता लोग इस कारण से भलीभाँति परिचित हंै मगर क्या करे वे अपने इगो माइन्ड को बदलने में नाकाम रहे हैं । एक कहावत है रस्सी जल गयी मगर बल नहीं गया, ठीक उसी तरह मधेशी नेता के आपसी बेमेल के कारण उनलोगों को कई परेशानी झेलनी पड़ी मगर किसी में हठ त्यागने का आत्मबल नहीं आया । अपने अपने निजी स्वार्थ में लिप्त हमारे नेता लोग खसवादी का चापलूसी करने से भी पीछे नहीं हटे । हाल ही में चले ६ महीने के आन्दोलन पश्चात मधेश के युवाओं में भिन्न भिन्न मनोविज्ञान पाया गया ।
लाहान मटियर्वा वासी दिलिप पुर्वे का कहना है कि अगर मधेश को सचमुच में अधिकार दिलाना है तो हमें एक नए चेहरा का तलाश करना होगा जो मधेश के सवाल में एक पृथक सोच लेकर आए । उनके अनुसार वर्तमान मधेशी नेता लोग गिरगिट की तरह रंग बदलते है । वे लोग मधेश में सहानुभूति पाने के लिए खूब डींगे मार देते हैं मगर जब वो लोग काठमाडौं जाते है तो खसवादी द्वारा दिया कबाब और शराब में डूबकर अपनी पहचान भूल जाते हंै । पुर्वे के अनुसार मधेश गुलामी के जंजीरो से आजाद होना मुमकिन है मगर इसके लिए चाहिए एक ऐसा नेता जो व्यक्तिगत स्वार्थ में लिप्त ना हो । जिसके पास मधेश माँ के लिए हरकुछ करने का जज्बा हो ।
इसी तरह लाहान का दूसरा एक युवा मणिलाल साह कहते हैं कि पहाड़ी लोगों का राष्ट्रीयता तो केवल एक दिखावा है वे लोग असली मायनों में देश में लगी दीवार की तरह है जो दिन प्रति दिन सम्पूर्ण देश को खोखला करने में लगे है । साह जी का ये भी कहना है कि मधेश आन्दोलन से घबराए हुए खसवादी पहाड़ी लोग अब एक बड़ी चक्रव्युह निर्माण करने में लगे हैं । उस चक्रव्यूह का भेदन के लिए मधेश में अर्जुन आवश्यक है । अब ये देखना है कि अर्जुन बनकर कौन आता है । मधेश सचमुच में आन्तरिक उपनिवेशवाद के शिकार हैं और उससे उन्मुक्ति आवश्यक है वरना आने वाले वंश का भविष्य दर्दनाक होना तय है ।
सप्तरी मल्हनियाँ २ के रहनेवाले राजेश बरबरिया के अनुसार ६ महीने तक लगातार चला आन्दोलन में अगर मधेशी नेता ईमानदारी कायम रखता तो शायद हम उन्मुक्ति के मार्ग के बहुत नजदीक रहते मगर अफसोस हमारे कुछ लालची नेता नाकाबन्दी के नाम पर तेल तस्करी करने लगे और नतीजा ये हुआ कि आन्दोलन से जितनी उपलब्धि होनी थी उतनी हुई नहीं । लाहान और राजविराज में जो मधेशी नेता दिन में जितना क्रियाशील दिखाई दिए उतना ही रात मे भ्रष्ट पाए गए । सवाल ये है कि ५१ प्रतिशत मधेश की अवाम आखिर में उन भ्रष्ट लोगों को कार्यवाही के दायरे में लाते क्यों नहीं ?
इसी तरह सिरहा कल्यानपुर वासी सूर्यनारायण यादव का कहना है कि हमे विभिन्न बाधाओं का सामना करते हुए अपने मधेश मुक्ति के मंजिल तक जाना है । यादव कहते हैं कि अगर आप रास्ते पर भौंकने वाले हर कुत्ते को पत्थर मारने लगेंगे, तो आप अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुँच पाएँगे । तो उन्हें भौंकने दें, और हम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें और अपना लक्ष्य हासिल करके दिखाना ही उन्हें सबसे बडा जवाब होगा । ठीक उसी तरह खसवादी पहाड़ी और मधेश विरोधी लोगाें को भौकने दे । हमे निश्चिन्त रहना है कि वे काटनेवाले में से नहीं है । अभी के हालात में मधेशी नेता को सुधरना अनिवार्य है क्योंकि मधेश का भुगोल ही अभी दाव में है । अगर भुगोल ही ना रहे तो राजनीति का सवाल ही पैदा नहीं होता है । साल २०७२ मे लाया गया अधूरा और पुर्वाग्रही संविधान को अन्तराष्ट्रीय समुदाय ने भी असंतुष्टि जतायी है इसीलिए मधेशी वर्ग एकबार फिर एक मुट्ठी बनकर दीवार की तरह खड़ा उस खसवाद अहंकार को चकनाचूर करना नितान्त आवश्यक है वरना आने वाली पीढ़ी हमें कोसेगी ।

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