मधेश आन्दोलन,उपलब्धिया“ भी तो हैं

श्रीमन नारायण :‘वाद’ के सिलसिले मे आधे भरे गिलास का एक उदाहारण बहुत उपयुक्त है । आधे भरे गिलास को देखकर एक आशावादी आदमी कहेगा कि गिलास आधा भरा हुआ है, लेकिन निराशावादी व्यक्ति कहेगा कि गिलास आधा खाली है । आशावादी व्यक्ति कहेगा कि फूल कितना सुन्दर है लेकिन निराशावादी आदमी कहेगा कि इसके का“टे कितने तीखे हैं । यह आशावाद और निराशावाद आगे बढ़कर आर्दशवाद तथा यर्थाथवाद का आधार बनता है । यह भी माना जाता है कि आशावाद से मानववाद, समाजवाद और माकर््सवाद जैसे क्रान्तिकारी ‘वादो’ को भी शान्ति मिली है । मनुष्य होने के नाते हम सब लोग हमेशा विचार करते हैं । यही विचार व्यवस्थित होकर विचार धारा का रूप लेते हैं । सभी प्रकार के ‘वाद’ इन्ही विचार धाराओ के ब्राण्ड नेम या आइकन है ।
बाइबल मे कहा गया हैं कि मनुष्य सिर्फ रोटी से ही जिन्दा नहीं रहता । उसे असली उर्जा विचारो से मिलती है । वंचित वर्गो में भी उसी समय क्रान्तिकारी भावना पैदा हुई, जब उन्हे ‘समाजवाद’ और माकर््सवाद जैसे वादाें का ज्ञान हुआ इन विचार धाराओ से वंचित वर्गो को लगा कि वे सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए नही बल्कि स्वतन्त्रता, समानता एवं मानवता के आदर्शो के लिए लड़ रहे हैं । मिल्स ने लिखा है कि अगर हजारों लोग अपने स्वार्थ के लिए लड़ रहे हों और एक व्यक्ति अपने सिद्धान्तो के लिए लड़ रहा हो, तो वह अकेला आदमी सब पर भारी पड़ जाता है । राजनीति के सभी वाद समाज के वर्गो के स्वार्थ को आदर्शवादी सिद्धान्त में बदल देते हैं, जिससे लोगो में जंग जीतने का जोश भर जाता है । नेपाल की राजनीति मे पिछले बासठ वर्षो में किसी न किसी रूप मे जारी मधेश आन्दोलन भी इसका एक उदाहारण है । तराई कांग्रेस ने जिस मशाल को जलाया उसे लेकर आगे बढ़ने का काम वर्षो से नेपाल सद्भावना पार्टी करती आई है । पिछले ५ वर्षो मे इस अभियान में अनेकों नेताओ ने विभिन्न राजनीतिक संगठनों के नाम पर खुद को समाहित किया है । अधिकार प्राप्ति के इस आन्दोलन में सैकड़ो लोगो ने अपनी कुर्बानिया दी हैं वही घायलो की फेहरिस्त भी काफी लम्बी है । इस अभियान मे लगकर खुद को मिटा देने वाले कुलानन्द झा, बाबा रामजनम तिवारी, रघुनाथ ठाकुर, रामजी राम, रामजी मिश्रा, गजेन्द्र नारायण सिंह, रामचन्द्र मिश्र सरीखे महापुरुषो के अथक संघर्ष त्याग एवं बलिदान के बलबूतें ही मधेशियो को सम्मानपूर्ण जिन्दगी जीने का अवसर प्राप्त हुआ है ।
२०६३÷२०६४ साल के मधेश विद्रोह ने इसे जन आन्दोलन बना दिया । पिछले ६ महिनों से जारी मधेश आन्दोलन के कारण पूरी दुनिया को यह जानने का अवसर प्राप्त हुआ है कि किस कदर नेपाल में मधेशी लोग भेदभावपूर्ण जिन्दगी जीने को बाध्य है । शान्तिपूर्ण एवं अहिंसक आन्दोलन होने के कारण सरकार चाह कर भी इसे कुचल नहीं पाई । आन्दोलन लम्बा होने का कारण आम जनता को काफी कष्ट झेलना पड़ा । पहाड़ के लोगों के वजाय मधेश के लोगो को ही अधिक पीड़ा झेलनी पड़ी देश की शासन सत्ता पर वर्षो से कुण्डली मारे बैठे तीन दलों (नेपाली कांग्रेस, नेकपा एमाले एवं माओवादी) के नेता मधेश आन्दोलन को असफल सावित करने का हर सम्भव प्रयास भी कर रहे हैं । राजधानी काठमाण्डु सहित पहाड़ के क्ष्ँेत्रो मे इसे नेपाल की राष्ट्रीय एकता, अखण्डता एवं सार्वभौमसत्ता के प्रतिकूल बताने का काम तथा मधेश मे आकर खुद को मधेशियो का एक मात्र सच्चा हिमायती सावित करने को प्रयास भी ये कर रहे है । मधेशवादी दलो के नेता तीन बडेÞ दलो के साजिशों का पर्दाफास करने में विफल रहे हैं । राजधानी की मीडिया भी तीन बड़े दलो के पैरोकार ही रही है ।
जाहिर है मधेश आन्दोलन का सही ढंग से मूल्यांकन नहीं हो पाया । राजधानी केन्द्रित समाचार माध्यमो से प्रसारित एवं प्रचारित समाचार एवं विचार ही लोगों तक पहुच पाई । जनता में मधेश आन्दोलन के प्रति सकारात्मकता से कही अधिक नकारात्मक धारणा विकसित करने का काम अधिक हुआ है । अपनी उपलब्धियों को जनता मे ले जाने मे भी मधेशी दलों के नेता विफल रहे हंै नतिजतन बडेÞ दलों के नेताओ के आरोपाें का खण्डन भी सही ढंग से नही हो पाया ।
मधेश में यह चर्चा आम है कि आन्दोदन से मधेशियो को क्या मिला ? इतने लोगाें की जानें गई ? इसका जिम्मेवार कौन है ? मधेशवादी दलो के नेता जिम्मेवार नहीं हैं ? अगर यही होना था तो फिर आन्दोलन मे जनता को क्यो झो“का गया ? ऐसे अनेकों सवाल जनता के हैं जिसका जवाब उन्हें चाहिए । यहा“ भी जवाब आशावाद और आधा खाली की तरह है ।
पिछडे पखवाड़े राजधानी काठमाण्डु से प्रकाशित एक नेपाली साप्ताहिक ने नागरिकता के बारे मे गृह मन्त्रालय के श्रोत का हवाला देते हुए लिखा कि देश में अब तक एक करोड़ सात लाख लोगों को नागरिकता मिली है इसमे २ करोड़ एक लाख से अधिक लोग बंशज के आधार पर नागरिकता प्राप्त किए हैं अर्थात वैसे लोग जिनके पिता एवं दादा नेपाल के ही नागरिक रहे हैं । नेपाल की वामपन्थी र्पािर्टयां एवं पूर्व राजा समर्थक कुछ विद्धान इस विषय को जोर–शोर से उठाते रहे हैं कि वि.सं.२०६३ साल में ४० लाख भारतियो को नागरिकता दी गई । सरकारी आंकड़ा एक सिरे से खारिज ही नही करता अपितु इसके आंकड़े बताते हंै कि २०६३ साल में २६ लाख १५ हजार ६ सौ १५ वयस्क लोगो को नागरिकता मिली । जिनमे २३ लाख ४४ हजार ६ सौ १५ लोगों को वंशज के आधार पर तथा १ लाख २ सय ८४ को वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता प्राप्त हुई । वैवाहिक अंगीकृत नागरिकता उन विदेशी महिलाओं को दी जाती है, जिनका विवाह नेपाली युवको से होता है ।
जन्म के आधार पर महज १ लाख ७० हजार लोगों को ही नागरिकता मिली नेपाल में अब तक सिर्फ २ लाख ३ हजार लोगो को ही जन्म के आधार पर नागरिकता मिलाी है । जाहिर है ४० लाख भारतीयो को नागरिकता मिलने वाली वात बकवास के अलावा कुछ नही है । मधेशवादी दलो खास करके नेपाल सदभावना पार्टी के कारण नागरिकता समस्या समाधान हो चुका है ।
मधेशियाें की भाषा, संस्कृत एवं पहचान को भी मान्यता मिली है । होली, छठ, इद, बकरीद, सरीखे व्यहारों पर अब सार्वजनिक अवकाश दी जाती हैं । हिन्दी सहित मैथिली, भोजपुरी, उर्दु, थारु, मण्डवारी अवधी, राजवंशी, आदि भाषाआें मे अब हमारे जन प्रतिनिधी अपनी बात संसद पटल पर रख पाते हैं । धोती कुर्ता एवं पायजामा सरीखे पहनावे को भी संसद मे मान्यता हासिल है । अब जबकि देश संघीय ढा“चे मे जा चुका है तो इन भाषाओं एवं संस्कृतियों को आगे बढ़ने मे पूरी आजादी मिल पाएगी ।
मधेश आन्दोलन की एक बड़ी बजह यह भी रही है कि अन्तरिम संविधान में मधेशियो के लिए आरक्ष्ँण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई थी जिसे संविधान सभा से जारी किए गए संविधान के मसौदे मे इसे नही काटा गया । आखिरकार चार दर्जन मधेशियो की शहादत के वाद ही तीन बडेÞ दलो के नेताओ को यह बात समझ मे आई की गलतिया तो हुई है । बहर हाल नये संविधान मे संशोधन के लिए देश के प्राय सभी दल एकमत हो गए है तथा अब यह पुनः संविधान का हिस्सा होने जा रहा है । जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रो का निर्धारण होना भी तय हो चुका है ।
सर्वाधिक चर्चा का विषय रहा सीमांकन मे फेर बदल । नेपाल मे संघीयता का मुद्दा मधेशवादी दलो का ही रहा है ।
मधेशवादी दलो की यह चाहत रही है कि भुगोल, आबादी, भाषिक एवं सांस्कृतिक एकरुपता के आधार पर मधेश को एक अलग प्रान्त बनाया जाय । बाद के दिनाें में मधेशवादी दलो नें खुद से यह कहना शुरु कर दिया कि अगर मधेश के क्षेत्रों में दो प्रदेश भी हो जाय तो उन्हें कोई दिक्कत नही होगी । मधेशवादी दलों की इस उदारता को तीन बड़े दल के नेताओ ने कमजोर समझ डाला नतीजतन कोशी नदी पूर्व तीन जिला झापा, मोरङ एवं सुनसरी तथा पश्चिम मे चितवन को पुर्वी मधेश प्रदेश से अलग कर दिया, पुर्वी नवलपरासी को एक अन्य प्रदेश में तथा कैलाली एवं कन्चनपुर सरीखे थारुओं की आबादी वाले जिले को प्रदेश नं. ६ मे जोड़ दिया गया । अबध थरुहट प्रदेश (सम्भावित नाम) मे पहाड के आधा दर्जन से अधिक जिलो को जोड़ दिया गया । इस तरह मधेश में प्रस्तावित प्रदेशो की संख्या किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होने के कारण मधेश आन्दोलन मे ऐतिहासिक जनसहभागिता देखी गई । तीनो बडेÞ दल के नेता सीमांकन के मसले पर पुनर्विचार के लिए तैयार नही झापा, मोरङ एवं सुनसरी को प्रधानमन्त्री के.पी.शर्मा ओली, पुर्व प्रधानमन्त्री झलनाथ खनाल, कांग्रेस के महामन्त्री कृष्ण प्रसाद सिटौला एवं विराटनगर के कोइराला परिवार अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ कर देख रहे हंै जाहिर है इन क्षेत्राें को पूर्वी मधेश प्रदेश मे मिलाना टेढ़ी खीर सावित होगी । अतिरिक्त मुसिबत यह है कि सरकार में शामिल फोरम (लोकतान्त्रिक) के नेता बिजय कुमार गच्छेदार सिरहा से लेकर झापा तक एक अलग प्रदेश चाहते हैं ताकि थारुओं के वोटो के वदौलत वे खुद को मुख्यमन्त्री बना सके । पश्चिम मधेश प्रदेश मे पूर्व प्रधानमन्त्री शेर बहादुर देउवा एवं एमाले के नेता भीम रावल तथा एमाओवादी के लेखराज भट्ट कैलाली एवं जनकपुर को अपने लिए प्रतिष्ठा का विषय मान रहे हैं तथा किसी भी सूरत मे इसे छोड़ना नहीं चाहते । फिर भी इन जिलों के दक्षिण क्षेत्रों जहा“ मधेशियो की घनी आबादी है उसे मधेश के प्रदेश मे जोड़कर समस्या का निदान निकाला जा सकता है । सरकार तीन महिने का वक्त चाहती है । मधेशवादी दल फेस सेभिंग एवं सेफ लैंडिङ के लिए अवसर की तलाश में है । तीनों बड़े दल इसे वेआवरु करना चाहते हंै । नेपाल का संघीयता मे आना ही मधेशीयो के लिए कामयाबी है । आज अगर मधेश प्रदेश छोटा भी है तो भी इसे आर्थिक विकास के जरिए देश का समस्त प्रदेश बना कर बाकी भू–भाग को भी इस प्रदेश मे जुड़ने के लिए विवश किया जा सकता है ।
परन्तु जातिवाद, भ्रष्टाचार, अहंकार एवं संकीर्णता के घेरे मे कैद मधेशवादी नेता क्या अपने प्रदेश के विकास के लिए महज पा“च साल तक भी त्याग करने का साहस दिखा पायेंगे ? मधेश के शहीदों का सपना साकार तभी हो पावेगा जब इस प्रदेश को जातिवाद, भ्रष्टाचार एवं संकीर्णता से दूर रखा जाएगा । यह मत भूलना चाहिए कि शहादत देने वालाें ने जाति के नाम पर शहादत नहीं दिया था । शहीदों की खून की लाज रख पाने मे मधेशी नेता कितना सक्ष्ँम हो पाते है यह वक्त बताएगा ? प्राप्त उपलब्धियों की रक्षा करें तो भी हमारे हाथ कम नही आया है । मधेश प्रदेश मे विकास के लिए अपार सम्भावनाए हैं । शिक्षा, जनचेतना, सामाजिक विकृतिया“, अनुशासनहीनता आदि के क्षेत्रों में बहुत अधिक काम करना होगा । अगर हम निष्पक्ष भाव से सोचें तो विगत ६२ वर्षो के मधेश आन्दोलन के कारण हमें बहुत कुछ प्राप्त हुआ है । हमें नेपाली कांगे्रस, नेकपा एमाले एवं एमाओवादी द्धारा अबतक जनता के हित मे किए गए कार्यो की भी समीक्षा करने की भी जरुरत है । अगर हम ऐसा कर पाएंगे तो शायद मधेशी दलो की भूमिका से अधिक नाराजंगी नही होगी ।

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