मधेश आन्दोलन और काठमान्डू का तेवर

मुक्तिनाथ साह:मेरे एक मित्र हैं जो पश्चिम नेपाल के हैं, पर लगभग ३० बर्षों से काठमांडू में रहते हैं । एक दिन अनौपचारिक बातचीत के दौरान कहा कि काठमांडू मुर्दो का शहर है, तो मै समझा शायद मजाक में कह रहे हैं । पर कुछ ही दिन के बाद उनकी बात को स्मरण किया तो लगा कि उन्हाेंने सच कहा था । क्योंकि मधेश आन्दोलन के क्रम में सम्पूर्ण मधेश आग की लपटो में जल रहा था ,आन्दोलनकारियों को गोली से भूना जा रहा था, घायल चित्कार रहे थे, विधवाएँ बिलख रहीं थीं, तब भी काठमान्डू को न तो कुछ सुनाई दे रहा था न ही दिखाई दे रहा था । यह घटना सिर्फ एक दिन नहीं चली हफ्तों से ज्यादा चली, फिर भी काठमांडू को कुछ न सुनाई दिया न दिखाई दिया ! सभी अपने–अपने कार्यों में व्यस्त थे । लगता था इस देश में काठमांडू अलग है और मधेश अलग । क्योंकि किसी भी तरह का भाईचारा ,मानवता या एक ही देश के जनता हैं ऐसा भान नहीं हो रहा था । जितने भी राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकारवादी संस्थाएं हैं ,नागरिक अभियन्ता हैं सब काठमान्डू मे ही हैं लेकिन इस विकराल अवस्था में न कोई आवाज उठ रही थी न ही विरोध हो रहा था ।

यहाँ तक कि सरकारी और निजी संचार माध्यम के द्वारा भी आन्दोलन का, मधेश में लगी आग की और मारे गए जनता के बारे में समाचार सम्प्रेषण करने का धर्म सही तौर पर निभाते नही देखा गया । वास्तव में कहा जाय तो काठमान्डू के लोग पढ़े लिखे ,सम्भ्रान्त ,जागरुक और आधुनिक हैं । वो भलीं भाँति जानते हैं कि औपचारिकता क्या होती है, शालीनता क्या होती है और व्यवहारिकता क्या होती है । क्योंकि आज के दौर मे इन सब अवयवों का काफी महत्व है । काठमांडू इन सब चीजों में बहुत हद तक परिपक्व है । काठमांडू के माइती घर मण्डला तो किसी भी घटना के विरोध के लिए या कैन्डील जलाकर श्रद्धान्जली सभा के लिए प्रख्यात स्थल बन चुका है । कुछ महीनों पहले ही मधेश की ही एक बच्ची के साथ दुष्कर्म कर हत्या कर दी गई थी, तब भी काठमांडूवासी ने कैन्डील जलाकर अपनी मानवता का परिचय दिया था । पर आज मधेश आन्दोलन क्रम में ४५ से ज्यादा की संख्या में जनता के सिर और छाती में गोली दाग कर हत्या की गई जो अन्तर्राष्ट्रीय कानून के विपरीत भी है तब भी काठमान्डू मौन रहा । कोई विरोध नहीं, सरकार पर किसी प्रकार का कोई दवाव नही और तो और मृतक के लिए कैन्डल जलाकर श्रद्धान्जली देने की औपचारिकता तक भी नही निभाई गई पढ़े लिखे, सम्भ्रान्त काठमान्डूवासी की तरफ से ना ही मानव अधिकारवादी संस्था की तरफ से । हाँ कुछ मधेश के लोगों की तरफ से जरुर यह औपचारिकता पूरी की गई । क्या काठमान्डूवासी इतने स्वार्थी हो गए हैं जो उनको नेपाल के बाँकी के भू–भाग से कोई मतलब नहीं, कोई सरोकार नहीं ।
मधेश में मारे गए ४ बर्ष के बच्चे , महिलाओं से लेकर ६० बर्ष के वृद्ध का क्षत विक्षत लाश देख कर भी काठमान्डूवासी का दिल नही पसीजा ? आखिर क्यो ? वो भूल गए कि कुछ महीनों पहले जब महा विनाशकारी भूकम्प का कहर बर्पा था काठमान्डू और आसपास के क्षेत्र में तो मधेश के लोग व्यक्तिगत तौर पर और विभिन्न संघ संस्था के तरफ से भरपूर सहयोग लेकर रातों रात पहँुचे थे और पलपल की खबर रखते थे । सम्पूर्ण मधेश सदमे में था । उस समय आवश्यक खाद्यसामग्री, पाल, दवा, पानी ,कपड़ा जिससे जो बन पड़ा ट्रक का ट्रक सामान लेकर पहँुचा था काठमान्डू । सामान चाहे कोई मायने ना रखता हो पर उस समय जन जन की भावना काठमान्डू के लिए आहत थी । पर जब मधेश मुश्किल में है ४५ दिन से ज्यादा दिन से बन्द है ,लोग त्राहि त्राहि हैं, कर्फयू के बीच जीने को बाध्य थे, सेना का दमन हो रहा था, पूरा मधेश छावनी में तब्दील हो गया था ,इस अवस्था में भी काठमान्डू मौन था । एक शब्द भी नही बोला सम्बेदना के तौर पर भी । काठमान्डू का मौन टूटा संबिधान जारी के कुछ दिन पहले, तब सम्बेदना और श्रधांजली के शब्द के बदले आना शुरु हुआ घृणा, गाली और अपशब्द भरे पैगाम मधेश और मधेशियों के लिए । पहले से ही आहत मधेश और मधेशियो को इन हरकतों ने और ज्यादा आहत कर दिया । हद तो तब हो गई जब राज्य द्वारा आन्दोलनकारियों के मारे जाने को काठमान्डू ने जायज कहना शुरु कर दिया । इधर मधेश के लोग आन्दोलन में मारे गए शहीदो के लिए आँसू बहा रहे थे ,शव यात्रा निकाल रहे थे तो उधर काठमान्डू दीपावली मना रहा था ,आतिशवाजी कर रहा था । जब ४५ दिन से सम्पूर्ण मधेश पूर्णतः ठप्प था , खाने पीने के सामानों की किल्लत थी तब भी सरकार अजगर की तरह सोई हुई थी । ना कुछ बोल रही थी ना कुछ पहल कर रही थी और काठमान्डू भी मौन समर्थन कर रहा था कि जो हो रहा है ठीक हो रहा है ।
सरकार द्वारा सम्पूर्ण मधेश मे बैंक का कारोबार बन्द कर के एक तरह से आर्थिक नाकाबन्दी लगा दिया गया था । पर जब आन्दोलनकारियों ने भारतीय नाका पर धर्ना दिया और काठमान्डू में खाद्य सामग्री और तेल का अभाव महसूस हुआ तो वही अजगर सरकार २४ घण्टा के अन्दर हरकत में आई और खुद प्रधानमन्त्री ने मधेशवादी दल के पार्टी कार्यालय और घर घर मे आवाजाही शुरु कर दिया । साथ ही साथ शीर्षस्थ नेता और भावी प्रधान मन्त्री के. पी. ओली, प्रचण्ड जी लगायत के नेतागण बौखलाकर अनाप सनाप बोलना शुरु किए अचानक खोख्ला राष्ट्रवाद का नारा और धमकीपूर्ण भारत विरोधी भाषण देना शुरु किए जिसका तुरन्त असर काठमान्डू में पड़ा । काठमान्डू के लोगों ने अब मधेश और मधेसी को छोड़ भारत विरोधी नारा लगाना शुरु किया, जुलुस निकालना शुरु किया, रैली निकालना शुरु किया, भारतीय दूतावास के आगे काला झण्डा दिखाना और धर्ना देना शुरु किया । तब सरकार मौन थी जब यही सब मधेश में हो रहा था तो युद्ध मे प्रयोग होने वाली गोलियों से लाश बिछा दिए गए थे । क्या नेपाल सिर्फ काठमान्डू ही है ? काठमान्डू में २ दिन दिक्कत हुई तो हाय तौबा मच गई पर ४५ दिन से उपर मधेश दिक्कत झेल रहा है तो काठमान्डू को कुछ आभास नही हुआ ? सिर्फ दो दिन मे ही सरकार और काठमान्डूवासी मानवाधिकार और अन्तर्राष्ट्रीय कानून की बातें करने लगे जब मधेश में आन्दोलनकारियों के सिर में और छाती में गोली ठोकी जा रही थी, लाशें बिछाई जा रही थी, आर्थिक नाकाबन्दी की गयी थी तो कहाँ थी मानवाधिकारवादी सोच और अन्तर्राष्ट्रीय कानुन की बातें ? सच में कहा जाय तो नेपाल के संविधान जारी होने के क्रम में काठमान्डू का असली रूप और मनःस्थिति स्पष्ट हो गयी ।
मधेश आन्दोलन के समय मौन रहे काठमान्डू में अचानक से उर्जा कहाँ से आ गई धर्ना , जुलुस, रैली और विरोध करने की ? खोखला राष्ट्रवाद का नारा अचानक क्यों देने लगे ? सिर्फ तेल नमक और खाधान्न के कारण ? काठमान्डूवासी इतने नादान तो नहीं कि हमारे सत्तासीन या कोई भी दल के नेता के बारे में नहीं जानते कि वो अपनी व्यक्तिगत या दलीय स्वार्थ के लिए भारत से सदैब सांठ–गांठ करते आ रहे हैं । तभी नहीं दिखता राष्ट्र स्वाभिमान और राष्ट्रीयता ? अभी के विकट परिस्थिति में नेतागण को संयम हो कर धैर्यपूर्वक सूझ बूझ से समस्या का समाधान करना चाहिए न कि पड़ोसी देश को चिढ़ाना चाहिए यह कह कर कि हम साइकल चढ़ेंगे ,हम हवाई जहाज से ईन्धन आपूर्ति करेंगे ,भूखे मर जाएंगे पर झुकेंगे नही, हम चाईना से सामान लायेंगे ,पाकिस्तान देने को तैयार है तो, बंगलादेश से लायेंगे आदि ईत्यादि । क्या यही है राजनीतिक परिपक्वता ? पर काठमान्डू इसी प्रकार की निराधार बातों मे हाँ में हाँ मिलाते हुए सरकार और नेतागण को दवाब देने की बजाय भारत विरोधी नारा लगाना, भारत के प्रधानमन्त्री का पुतला दहन करना यहाँ तक की भारत के राष्ट्रीय झण्डा तक को जलाना जैसे कार्य से भी पीछे नहीं रहा काठमान्डूवासी । इस प्रकार के क्रियाकलाप से भारत का खीझना स्वाभाविक है । पर इस से पड़ने वाले असर को तो हम जनता को ही झेलना है । वास्रुतविकता केरु आगेरु खोरुखली रुऔरुररु निररुाधाररु ररुाष्टरुवाद का नाररुा कितना दिन टिकेरुगा ? काठमान्डू कोरु तोरु सत्तासीन सेरु प्रश्न कररुना चाहिए औरुररु दवाब देरुना चाहिए कि क्या यही हैरु तुम्हाररुा पूर्व तैरुयाररुी औरुररु व्यवस्रुरुथा कि सिर्फ दोरु दिन आपूर्ति बन्द होरुनेरु पररु सम्पूर्ण काठमान्डू अस्रुरुत व्यस्रुरुत होरु जाता हैरु ? साररुी व्यवस्रुरुथा चररुमररुा जाती हैरु ? त्राहि त्राहि मच जाती हैरु ? पररु नहीं वोरु तोरु खोरुखला ररुाष्टरुवाद का नाररुा देरु कररु उन्हीं का साथ देरुंगेरुरु। इन सब सेरु काठमान्डूवासी का मानसिक दिवालियापन .स्रुरुवार्थीपन ,भाररुत विररुोरुधी, मधेरुश औरुररु मधेरुसी विररुोरुधी मानसिकता झलकती हैरुरु। पररु आनेरुवालेरु दिन मेरुं काठमान्डूवासी कोरु इस भावना औरुररु मानसिकता सेरु उबररुनेरु की आवश्यकता हैरुरु। तविकता के आगे खोखली और निराधार राष्ट्रवाद का नारा कितना दिन टिकेगा ? काठमान्डू को तो सत्तासीन से प्रश्न करना चाहिए और दवाब देना चाहिए कि क्या यही है तुम्हारा पूर्व तैयारी और व्यवस्था कि सिर्फ दो दिन आपूर्ति बन्द होने पर सम्पूर्ण काठमान्डू अस्त व्यस्त हो जाता है ? सारी व्यवस्था चरमरा जाती है ? त्राहि त्राहि मच जाती है ? पर नहीं वो तो खोखला राष्ट्रवाद का नारा दे कर उन्हीं का साथ देंगे । इन सब से काठमान्डूवासी का मानसिक दिवालियापन .स्वार्थीपन ,भारत विरोधी, मधेश और मधेसी विरोधी मानसिकता झलकती है । पर आनेवाले दिन में काठमान्डूवासी को इस भावना और मानसिकता से उबरने की आवश्यकता है ।

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