मधेश आन्दोलन–खोदा पहाड, निकला चूहा : कैलाश महतो

मधेश आन्दोलन को धरासायी और सत्तामुखी बनाकर मधेश का विश्वास बिगाडने का काम मधेश आन्दोलन के मुखिया ने ही किया है जिसका मुआब्जा अनाहक में मधेश को चुकाना पड रहा है ।

कैलाश महतो, परासी, २३ दिसिम्बर |
एक नर्सिङ्ग कर रही मधेशी लडकी कहती है, “म कुनै मधेशी केटीसँग डेरा लिएर सँगै बस्न सक्दिन । किनकी “ऐ अम्मा, हम जब घर आइब तब्बे ……होई ” भनेर भोजपुरीमा फोन कुरा गरेको सुन्दा मलाई लाज लाग्छ ।” मुझे याद है जब हम ६–७ कक्षाओं में पढते थे, तत्कालिन प्रतिबन्धित नेपाली का“गे्रस और माले के बडे नेता लोग हमें प्रजातन्त्र के बारे में पढाने हमारे क्लास में आते थे । वही कारण रहा कि हम कम्यूनिष्ट के तरफ मुडे और तकरीबन दो दशकों तक कम्यूनिष्ट पार्टिंयों के झण्डा उठाते रहें ।

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संसार के आन्दोलनों की समीक्षा की जाय तो इनकी नेतृत्व दो तप्कों के नेता करते नजर आते हैं ः पहला, जन–नेतृत्व और दूसरा, सत्ता नेतृत्व । जन नेतृत्व में जनता नेतृत्व करती है । जन–नेतृत्व से क्रान्ति होती है । क्रान्ति शान्ति के साथ बदलाव लाती है । परिवर्तन लाती है । सत्ता और शासन दोनों को बदल देती है । वहीं सत्ता नेतृत्व का अपना अंक गणित होता है । जोड घटाव तथा गुणा भाग होते हैं । इसका नेतृत्व सत्ता के करीब में रहे नेता करते हैं । इसके अपने व्यतिmगत, पार्टीगत, पारिवारिक, सामुदायिक तथा साम्प्रादायिक स्वार्थ होते हैं । वे बदलाव, परिवर्तन तथा राजनीति का विकास नहीं चाहते, क्य“ूकि उनका मानना यह होता है कि उन बदलावों से उनके राजनीति और कमाइनीति को हानी होनी है । वे नया“ नेतृत्व का विकास नहीं चाहते हैं । वे अपने को ही सर्वकालिन नेता और नेतृत्व के रुप में स्थापित करना चाहते हैं ।
हम जरा नेपाल के संविधान २०७२ के घोषणा पश्चात् के करीब एक साल के मधेश आन्दोलन को २०६३–६४ के मधेश आन्दोलन से तुलना करें । २०६३–६४ के मधेश आन्दोलन ने एक बहुत बडा क्रान्ति, परिवर्तन और बदलाव लाने का कोशिश किया था । नेपाली शासन और सत्ता दोनों तवाह हो गये थे । मधेशियों ने जो चाहा, वह कलमबद्ध करबाया, संविधान में दर्ज करबाया । मधेश में हजारों यूवा नेतृत्व निर्माण हुए । समाज को एक नया“ दर्शन मिला, एक नयी उर्जा मिली । मधेश नेपाल में राजनीतिक और शासकीय पकडों का सपना सजाने लगा जो हकिकत में तब्दिल होने से पहले ही उसकी सारी दीवारेेंं धरमराकर गिर गयीं ।
आन्दोलन के मुखिया द्वारा ही परिवर्तन के बाहक रहे मधेशी यूवा नेतृत्वों के गर्दन पर विभेदी छुरा चलाया गया । अपने बचाव तथा आर्थिक कमाई के उद्देश्य से अपने ही यूवा सहयात्रियों को कठोरतापूर्वक दरकिनार कर बाहर से ठेके में लाये गये भ्रष्ट नेताओं को सारा अवसर उपलब्ध कराया गया । आन्दोलन के नेताओं को खून के आ“सु रुलाते हुए न उन्हें राज्य के सामने डटकर लडने का रास्ता दिया गया, न राजनीतिक पगडण्डी पर उन्हें रहने दिया गया । और उसका बस् एक ही कारण था कि जंग–ए–मैदान से लडकर आये लडाकू यूवा नेतृत्व उन गद्दार मुखिया को भी सामना करने को तैयार दिखने लगे थे जिसे उसने अपना खतरा माना । इसिलिए विभिन्न बहानों से उन यूवाओं को रास्ते से हटाया गया जिसे हटने बाले भी तब समझे जब काफी देर हो चुकी थी ।
उस मुखिया ने अपनी एक चोर मण्डली बनाकर राज्य से सत्ते की सम्झौते की । मधेश में उठे जन आवाज तथा उसके मागों को दर किनार किया गया और सत्ता की बार्गेनिङ्ग की गयी । हा“ और हुजूर में पलने बाले कुछ लोग उनके कृपा से ही दलाल, चाप्लुस, तस्कर, मधेशखोर, हरामखोर आदि बनते गये । यहा“तक कि कुछ मधेशी यूवा नेता भी बुड्ढे गिदरों से भी ज्यादा बदचलन हो गयें जिन्हें देखकर मधेशी समाज में यूवाओं से भी घृणा होने लगी । लोग आन्दोलन के नाम से चिढने लगे ।
मधेश आन्दोलन को धरासायी और सत्तामुखी बनाकर मधेश का विश्वास बिगाडने का काम मधेश आन्दोलन के मुखिया ने ही किया है जिसका मुआब्जा अनाहक में मधेश को चुकाना पड रहा है ।
संविधान निर्माण और घोषणा के बाद हुए लम्बे मधेश आन्दोलन ने एक भी नेता निर्माण करने के बजाय आन्दोलन को आन्दोल नहीं, कमाने का एक सुनहरा अवसर मानकर आन्दोलन करने करबाने बाले मधेशी पार्टिया“ और उनके सारे नेता तस्कर बनकर करोडों की कमाई की । उसने किसी विद्यालय, कॉलेज या यूवा दस्ता के पास जाकर मधेश की आवश्यकताओं का चर्चा नहीं की । अपने भाषा, संस्कृति, परम्परा और रीतिरिवाजों के बारे में कोई जानकारी मूलक कार्यक्रम नहीं की जिसका परिणाम यह हुआ कि आन्दोलन पर आन्दोलन हो रहे मधेश के बच्चों में नेपालियों ने यह मानसिकता तैयार कर दी कि नेपाली बोलने बाले, नेपाल की बात ही करने बाले, नेपाली संस्कृतियों को ही मानने बाले सभ्य नागरिक हो सकता है । हमारे बच्चे अपना भाषा बालने में शर्म महशुश करते हैं । हमारी बेटिया“ और बहने अपनी पोशाक पहनने में असुरक्षा महशुश करती हैं । हमारे यूवा मधेशी संस्कृतियों को पालन करने में ओछा मानने लगे हैं ।
आश्चर्य की बात तो यह है कि संघीयता के काल्पनिक अधिकारों के लिए सैकडों जाने मरबाने बाले मधेशी पार्टिया“ स्वतन्त्रता के लिए खडा क्य“ू नहीं होते हैं ? इनके लिए चाकरी करना, गुलामी करना, सत्ता का बार्गेनिङ्ग करना, मधेशियों को गुमराह करना, नेपाली दलदल में ही मधेश को बारम्बार धकेलना और सम्मानहीन शहीद बनाना संभव है, मगर सारे दस्तावेजों को अन्तरराष्ट्रिय समुदाय के सामने रखकर आजाद मधेश का बात करना असंभव है ।
आजाद होना प्राकृतिक नियम ही नहीं, प्राकृतिक अधिकार भी है । एक बच्चा भी समय पहु“चने पर अपने मा“ के गर्भ से आजाद होता है । वह बच्चा बडा होकर भाइ ही नहीं, अपने माता पिता से भी अलग का दुनिया“ निर्माण करता है । तो उसके परिवार बाले उसे अपराधी क्य“ू नहीं मानता ? अपराध इसलिए नहीं मानता कि वह उसका प्राकृतिक और जन्मजातीय नैसर्गिक अधिकार है ।
कोई शौख से नया“ परिवार या नया“ देश का निर्माण नहीं करता । वह उसकी आवश्यकता और बाध्यता होता है । अगर मधेशी दल यह दलिल दे कि मधेश को अलग करने का अभी सही समय नहीं है तो क्या मधेश में दूसरा कोई नवलपुर, इटहरी, बेथरी, बेलहिया, फूलजोर, भैरहवा, टिकापुर आदि बन जायेंगे तब सही समय होगा जहा“ मधेशियों को एक मंचतक लगाने नहीं दिया जाता है ?
मधेश ने वि.सं.२००८ साल से आजतक वही नागरिकता, वही अधिकार, वही प्रान्त, वही सीमांकन, वही समानुपातिकता और समावेशिता के बडे बडे आन्दोलन किये, बडे बडे पहाड खोदे, मगर निकला क्या ? – चूहा । मधेशी दल अपना सारा अहंकार तथा सत्ता खेलों को छोडकर स्वतन्त्र मधेश के लिए आवाज दें, बिना कोई गंभीर क्षति मधेश को आजाद करायें और अपना राष्ट्र, अपना देश और अपना संविधान तथा अपने कानुन के साथ शासन और सत्ता दोनों के मालिक बनें ।

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1 Comment on "मधेश आन्दोलन–खोदा पहाड, निकला चूहा : कैलाश महतो"

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acharya sharma
Guest

This is extremely lie lying. Pura Pura Jhut hai hai kahani ek ladika. Aagar oh ladki keha hai tw, pura ladki toh nai kaha tha? appne to oh ladki ko karbahi ka baat nahi kaha, lekin ek ladki ka wasta sara sansar ko dhuk dereho? Jhut, Jhuti ho tum Pramand dekhao.

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