मधेश आन्दोलन पर दिल्ली दरबार या सिंहदरबार किसी का जोर नहीं चलने वाला : श्वेता दीप्ति

वार्ता का ढोंग एक बार फिर धराशायी हो चुका है ।
अभी के समय में में उपेन्द्र यादव से भी मधेशी जनता यही उम्मीद कर रही है कि उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए और एक मंच से मधेश आन्दोलन को संचालित करना चाहिए क्योंकि मधेश को कर्मठ और सजग नेतृत्व की आवश्यकता है ।
दमन के बल पर उनकी आवाज को दबाया जा सकता है, किन्तु हमेशा के लिए उनकी जुबान बन्द नहीं की जा सकती ।
श्वेता दीप्ति, काठमांडू,२० जनवरी |
क्या सत्ता खुद चाहती है कि देश विखण्डित हो जाय ? क्यों हर बार वार्ता सफल होने की प्रचारबाजी की जाती है और परिणाम पूर्णतः शून्य होता है ? आन्दोलन के शुरुआत से ही मधेश को कम आँका जा रहा है और आज इतने महीनों के बाद भी सत्ता अपनी पूर्व नीति पर ही कायम है । मधेशी नेताओं के पिछले इतिहास को देखकर वो आज भी इसी फेरे में हैं कि मधेशी नेताओं को बहलाकर अपना स्वार्थ सिद्ध किया जाय । क्या सत्ता इस बात की गम्भीरता को नहीं समझ रही कि अगर आन्दोलन का रुख बदला तो जो होगा वह निश्चय ही अखण्ड नेपाल के हित में नहीं होगा ।
sahid divas lahan
मधेश शक्ति संचित कर रहा है और इस बार वह और भी आक्रामक रूप में सामने आएगा । दिल्ली की दिलचस्पी मधेश मुद्दा में भले ही कम नजर आ रही हो और अभी सामान भी आसानी से अन्य नाका से नेपाल आ रहा हो किन्तु बिहार अभी खुलकर मधेश आन्दोलन को समर्थन कर रहा है । जाहिर सी बात है कि अगर बिहार में नेशनल हाइवे को जाम कर दिया गया तो नेपाल के लिए स्थिति कठिन हो सकती है ।
अब तक तो उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि  मधेश आन्दोलन नेता के हाथों में नहीं बल्कि जनता के हाथों में है । सद्भावना के अध्यक्ष का प्रधानमंत्री ओली के आग्रह पर काडमान्डौ आना एक तबके में यह  संदेश प्रसारित कर गया था कि महतो निराशा की स्थिति में और भारत के दवाब पर काठमान्डौ आए हैं इसलिए अब मधेश आन्दोलन अपने अंतिम कगार पर है । महतो ने भी यह संदेश दिया कि मोर्चा इच्छुक है कि समस्या का समाधान शीघ्र हो । सभी विशिष्ट नेताओं से उन्होंने मुलाकात भी की । किन्तु जो हुआ वह सामने है । वार्ता का ढोंग एक बार फिर धराशायी हो चुका है । एक उम्मीद जगी थी जनता के अन्दर कि अब सब ठीक होने वाला है और यह दावा भी किया जा रहा था कि आन्दोलन बहुत जल्द समाप्त होने वाला है । परन्तु सद्भावना अध्यक्ष वापस जा चुके हैं, तमलोपा ने भी कह दिया कि अब वार्ता की कोई सम्भावना या औचित्य नहीं है । मोर्चा ने स्पष्ट आरोप लगाया है कि वार्ता सिर्फ समय खींचने के लिए बुलाया जा रहा है और यह दिखाने का प्रयास मात्र हो रहा है कि सरकार आन्दोलन खत्म करने की कोशिश में लगी है जबकि ऐसा कुछ नहीं है । सरकार सिर्फ मनोबल तोड़ने की कोशिश कर रही है । इन सारी परिस्थितियों में मधेश अपने नेताओं में एक्यबद्धता का इच्छुक है । अभी के समय में में उपेन्द्र यादव से भी मधेशी जनता यही उम्मीद कर रही है कि उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए और एक मंच से मधेश आन्दोलन को संचालित करना चाहिए क्योंकि मधेश को कर्मठ और सजग नेतृत्व की आवश्यकता है । rajendra-mahato-55
सरकार की उदासीनता विखण्डन के धार को तेज कर रही है । अब तक यह प्रचारित किया जाता रहा है कि भारत के इशारे पर मधेश आन्दोलन जारी है और कल तक यही कयास लगाए जा रहे थे कि भारत के दवाब में सहमति के आसार बने हैं । परन्तु मधेशी नेताओं ने जो दृढता दिखाई है कि बिना सीमांकन के मधेश किसी भी तरह के कोई समझौते को मान नहीं सकता उससे तो यही लग रहा है कि मधेश आन्दोलन पर दिल्ली दरबार या सिंह दरबार किसी का जोर नहीं चलने वाला । कुछ समय के लिए लगा था कि मधेश आन्दोलन कमजोर पड़ रहा है किन्तु आज बलिदान दिवस के अवसर पर जो जनसमुदाय उमड़ा है वह मधेश के मूड को बताने के लिए काफी है । सरकार भले ही यह सोचकर निश्चिंत हो कि उसने पर्याप्त मात्रा में इंधन और पेट्रोलियम जमा कर लिया है जिससे वो देश चला लेंगे । परन्तु यह उनकी खुशफहमी ही साबित होगी क्योंकि मधेश शक्ति संचित कर रहा है और इस बार वह और भी आक्रामक रूप में सामने आएगा । दिल्ली की दिलचस्पी मधेश मुद्दा में भले ही कम नजर आ रही हो और अभी सामान भी आसानी से अन्य नाका से नेपाल आ रहा हो किन्तु बिहार अभी खुलकर मधेश आन्दोलन को समर्थन कर रहा है । जाहिर सी बात है कि अगर बिहार में नेशनल हाइवे को जाम कर दिया गया तो नेपाल के लिए स्थिति कठिन हो सकती है । इस भयावहता को अगर आमंत्रित किया गया तो जिन्दगी कितनी दुरुह हो सकती है इसका अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है । इतना ही नहीं हम सभी जानते हैं कि भारत के साथ हुआ पारवहन संधि मार्च में समाप्त होने जा रहा है । इसको रिन्यू करने के लिए मधेश आन्दोलन का समाप्त होना आवश्यक है क्योंकि आन्दोलन समाप्त हुए बगैर यह सम्भव ही नहीं है । अगर यह संधि रिन्यू नहीं हुआ तो मार्च के बाद भारत अपने हाथ समेट लेगा और तब नेपाल की क्या स्थिति हो सकती है यह अन्दाजा बखूबी लगाया जा सकता है ।
opendra yadav
क्या हमारी सरकार इन सारी परिस्थितियों से अनभिज्ञ है या देश को सुलगा कर उसमें हाथ सेंकने की आदत हो गई है ? खसवादी संस्कृति देश पर पूरी तरह हावी हमेशा से रही है, यह एक कड़वी सच्चाई है, किन्तु इन्हें अब यह समझना होगा कि समय परिवर्तनशील होता है । कल जो था वो आज नहीं है और आज जो है वो कल नहीं रहेगा इसलिए अपनी संकुचित मानसिकता से ऊपर उठें । कल तक जो अपने अधिकारों से परिचित नहीं थे वो आज खुद को जान चुके हैं । उन्हें अधिक समय तक अधिकार विहीन और शोषित कर के नहीं रखा जा सकता । दमन के बल पर उनकी आवाज को दबाया जा सकता है, किन्तु हमेशा के लिए उनकी जुबान बन्द नहीं की जा सकती ।
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