मधेश आन्दोलन

वीरेन्द्र के.एम.

हमारे मधेशी नेता जिस एक कारण से सबसे अधिक बदनाम है वह है उनके सत्ता से बाहर आते ही मधेश, मधेशी और मधेश आन्दोलन का रट लगाना । सत्ता में बने रहने तक ना तो उन्हें कभी मधेश मुद्दे की याद आती है और ना ही कभी मधेश में आन्दोलन की बात करते है । वैसे देखा जाए तो नेपाली राजनीति की ही यह विडम्बना है कि सभी दलों का कमोवेस यही रवैया है । देश की सबसे पुरानी पार्टर्ीीेपाली कांग्रेस सत्ता से बाहर आते ही लोकतंत्र पर खतरे की दुहाई देने लगते हैं वैसे ही देश की सबसे बडी पार्टर्ीीाओवादी सत्ता से बेदखल होने के बाद उनके नेताओं को राष्ट्रीयता, अखण्डता व र्सार्वभौमसत्ता पर खतरा नजर आने लगता है । हमारे मधेशी नेताओं की राजनीतिक संस्कार शायद यहीं से विरासत में मिला है । सत्ता में सहभागी होने का माहौल नहीं बना तो सरकार को मधेश विरोधी बताने लगे । जब तक खुद सत्ता में सवार थे तो मधेश आन्दोलन की सभी मांगे उन्हें पूरा होती नजर आती है । और जैसे ही सत्ता समीकरण बदलता है और सत्ता से बाहर का रास्ता देखना पडÞता है तो वो मधेश आन्दोलन करने की रट लगाने लगते हैं । मधेशी नेताओं की इन्ही बात व्यवहार से मधेशी जनता में उनकी विश्वसनीय व र्सवस्वीकार्यता घटती जा रही है । आखिर क्या वजह है कि हमारे मधेशी नेताओं को सत्ता से बाहर होने के बाद आन्दोलन की बात सुझती है । यह एक गंभीर प्रश्न है कि सत्ता से बाहर होने बाद मधेश, मधेशी, मधेश आन्दोलन की बात करना इनकी जरुरत है या मजबूरी । यदि मधेशी नेताओं से यह सवाल किया जाए तो उनके अपने-अपने तर्क होंगे । जो सत्ता में हैं, वये इस समय मधेशी मुद्दा व मधेश आन्दोलन का बातों से अपना पल्ला झाडÞते नजर आएँगे । लेकिन जो नेता सत्ता से बाहर हैं वो सिर्फमधेशी मुद्दों व मधेश आन्दोलन की बात करते जाएँगे । क्या वाकई में इस समय मधेश में आन्दोलन की जरुरत है – क्या मधेशी जनता आन्दोलन के मूड में दिखती है – क्या जनता नेता पर फिर से विश्वास करने को तैयार है और फिर से सडÞकों पर आन्दोलन को तैयार है, ऐसे कई सवाल हैं, जो परेशानी में डालने के लिए काफी है । मधेशी मोर्चा से आबद्ध मधेशी जनअधिकार फोरम लोकतांत्रिक, तर्राई मधेश लोकतांत्रिक पार्टर्ीी सद्भावना पार्टर्ीीे वर्तमान वामपंथी गठबंधन सरकार में शामिल होने से इंकार करते हुए सशक्त विपक्ष की भूमिका अदा करने का फैसला किया है । वहीं उपेन्द्र यादव के नेतृत्व वाली फोरम नेपाल ने सरकार में सहभागी होने का फैसला करते हुए एमाले व माओवादी के साथ समझौता भी किया है । लेकिन सम्मानजनक मंत्रालय ना मिलने का कारण बताते हुए फोरम नेपाल समझौते के कई दिनों बाद भी सरकार में शामिल नहीं हो पाई है । एक तरफ उपेन्द्र यादव जोर शोर के साथ सरकार में सहभागी होने की तैयार कर रहे है तो उधर तमलोपा अध्यक्ष महन्थ ठाकुर, सद्भावना अध्यक्ष राजेन्द्र महतो व फोरम लोकतांत्रिक के अध्यक्ष विजय गच्छेदार के दिल्ली भ्रमण ने काफी बवाल खडÞा हो गया । मधेशी नेताओं के दिल्ली भ्रमण पर बवाल इन तीनों शर्ीष्ा नेताओं के दिल्ली भ्रमण को नेपाली मीडिया ने खुब उछाला । मधेशी नेताओं के द्वारा किए गए भ्रमण को किसी ने वर्तमान खनाल सरकार के खिलाफ भारत की नीति बताया तो किसी ने इन नेताओं को सत्ता से बाहर होने के बाद भारत की शरण में जाने की प्रचारबाजी की । अन्य राजनीतिक दलों ने भी विजय, महन्थ, महतो के दिल्ली भ्रमण पर टीका टिप्पणी की । माओवादी ने इस भ्रमण को भारत का वर्तमान सरकार के खिलाफ डिजायन बताया तो एमाले के खनाल पक्षधर नेताओं ने इस भ्रमण को वर्तमान सत्ता गठबंधन से चिढÞकर किया गया भ्रमण बताया । मधेशी नेताओं के दिल्ली दौरे पर उपेन्द्र यादव ने भी चुटकी ली और कहा कि खुद निर्ण्र्ाालेने में असक्षम नेताओं को दिल्ली का आदेश लेने संज्ञा दी । इन नकारात्मक प्रचारबाजी और मीडिया में आई खबरों का सकारात्मक पक्ष यह है कि अब नेपाल की राष्ट्रीय मीडिया मधेशी नेताओं को भी स्थान देने लगी है । लेकिन मधेशी नेताओं के दिल्ली भ्रमण पर इतना शोर शराबा और टीका टिप्पणी क्यो – नेपाल का कौन नेता दिल्ली नहीं जाना चाहता है या फर मौका मिलते ही जाता नहीं है, चाहे वो किसी भी दल के नेता हो । भारत का सबसे अधिक विरोध करने वाले माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड पिछले साल से ही भारत जाने को लालायित हैं प्रधानमंत्री चुनाव के समय और उससे पहले फोरम अध्यक्ष उपेन्द्र यादव चुपके से तीन-चार बार दिल्ली भ्रमण कर वापस आ गए हैं । कुछ नेता तो ऐसे है कि किसी ना किसी बहाने हर ६ महीने में दिल्ली चले ही जाते हैं तो फिर महन्थ ठाकुर, राजेन्द्र महतो ओर विजय गच्छेदार के ही भ्रमण पर इतना बवाल क्यों – शायद समय परिस्थिति और इनका एक साथ जाना, दिल्ली के बडÞे नेताओं व मंत्रियों से भेंट करना और वहाँ से वापस आते ही आन्दोलन, निर्वाचन, संघीयता, समावेशी की बातें करना यहाँ के कुछ तत्वों को रास नहीं आई । दिल्ली से वापस होने के बाद इन नेताओं ने कहा कि समय पर ही संविधान जारी कर दलों को नए जनादेश के लिए तैयार होना चाहिए । आगे की रणनीति सत्ता से बाहर होने के बाद मधेशी मोर्चा से आबद्ध नेता आगे की रणनीति बनाने में जुटे हुए हैं । इसके तहत संयुक्त रुप से संविधान सभा से लेकर सडÞक तक प्रस्तुत होने की रणनीति बनाई जा रही है । जेठ १४ गते तक संविधान नहीं बन पाने की स्थिति में तमलोपा, सद्भावना व फोरम लोकतांत्रिक के सभासद संविधान सभा से सामूहिक इस्तीफे की मनस्थिति बना रहे हैं । इसके अलावा यदि माओवादी एमाले ने दो तिहाई बहुमत के आधार पर भी संविधान को जैसे तैसे बनाकर जारी करने की कोशिश की तो मधेशी मोर्चा उसका भी विरोध करेगी । मोर्चा से आबद्ध नेताओं ने साफ तौर पर कह दिया है कि यदि मधेश विरोधी संविधान जबरदस्ती हम पर थोपा गया तो इस संविधान को मानने से इंकार कर दिया जाएगा । एसे में मोर्चा के आगे सडÞक पर उतरकर जनता के सामने जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहेगा । मधेशी नेताओं का सत्ता में जाना भी एक मजबूरी होता है । और सत्ता से बाहर होने पर आन्दोलन की बात करना भी एक मजबुरी । लेकिन कडÞवी सच्चाई यह भी है कि नेता सत्ता में नहीं जाते तो उनके लिए पार्टर्ीीलाना, कार्यकर्ताओं को सहयोग देना, उनकी अपेक्षा पूरा करना, यह सब काम होते रहता है । जनता भी पैसा व पावर के पीछे ही भागती है । इसलिए भी सत्ता इन नेताओं के लिए एक मजबूरी भरा जरुरी है । लेकिन सत्ता में रहते हुए मधेशी मुद्दो को उस जोर-शोर ढंग से नहीं उठाया जा सकना इन्हे कमजोर बनाता है । जनता को पता है कि जब तक सत्ता में बैठे, तब तो मधेश मधेशी मुद्दा और मधेश आन्दोलन की याद नहीं आती । बेचारे करे भी कैसे – वो उस सरकार का हिस्सा होते है, जो मधेश विरोधी मानसिकता से ग्रसित होती है । ये बात उन्हें अच्छी तरह मालूम है इसलिए जब सत्ता से बाहर आते हैं तो खुल कर मधेशी मुद्दे की बात कहते है और आन्दोलन की धमकी देते है । यदि ऐसा नहीं किया तो फिर राजनीति किस मुद्दे पर करेंगे । जनता के बीच जाने, उनकी अपेक्षा, उनकी आकांक्षा, उनकी भावना को भुनाने के लिए भी मधेशी नेता आन्दोलन की बात करते हैं । यह भी उनके लिए एक मजबूरी भरा जरुरी है । mmm

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