मधेश एक खिलौना ! जब जी चाहा मौत बाँट दी,याद आया तो गले लगा लिया : श्वेता दीप्ति

बीस वर्षों से अगर मधेश स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों के बगैर चला है तो कुछ वर्ष और सही ।

वैसे भी ये प्रतिनिधि क्या कर रहे हैं उसका नमूना तो अब से दिखने लगा है । देश चंद पार्टियों के हाथों का खिलौना बना हुआ है जिससे वो खेल रहे हैं

सबसे सस्ता खिलौना इन्होंने मधेश को बना रखा है । जब जी चाहा मौत बाँट दी और जब मतलब याद आया तो गले लगा लिया । कड़वा सच तो यह है कि मधेशी जनता को भी खिलौना बनना ही भाता है ।

डॉ. श्वेता दीप्ति, काठमांडू , हिमालिनी अगस्त अंक | राजपा की केन्द्रीय बैठक जारी थी और साथ ही कयासों का दौर भी चल रहा था । संचार माध्यम कभी तो राजपा के मतभेद का समाचार सम्प्रेषित कर रहे थे कभी उनके आगामी चुनाव में शामिल होने की बात सामने आ रही थी । ये दोनों समाचार ऐसे थे जिसमें राजपा नेपाल की ऐसी छवि समाहित थी जिससे मधेश की जनता आक्रोशित हो रही थी । पर कयासों पर लगाम लगी और निर्णय सामने आया कि वर्तमान स्थिति में राजपा चुनाव में शामिल नहीं हो रही है । विषम परिस्थितियों में भी राजपा नेपाल ने जो दृढ निर्णय लिया है वह स्वागत योग्य है । यह सच है कि मधेश की जनता विकास चाहती है पर अपने अस्तित्व को गिरवी रख कर नहीं । क्योंकि सरकार और केन्द्रीय दलों की जो दोधारी नीति है वह तो स्पष्ट दिखाई दे रही है । ये मधेश की माँग को सम्बोधन करना ही नहीं चाहते क्योंकि इनकी नीयत नहीं है । कहते हैं जहाँ चाह वहाँ राह, पर जहाँ नीयत नहीं वहाँ कोई सम्भावना नहीं । स्थानीय निकाय का चुनाव ही नहीं मधेश को आने वाले सभी चुनावों का भी वहिष्कार करना चाहिए अगर उनकी माँगों को उचित सम्बोधन नहीं मिलता है तो ।
बहस जारी है कि अगर राजपा बहिष्कार करती है तो उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा । कहने वाले भले ही यह कह कर खुद को संतोष देते हों पर सच तो यह है कि अगर मधेश की माँगों को सम्बोधन के बगैर राजपा चुनाव में जाती है तो वह आत्मघाती कदम होगा । मधेश को विकास के सपने दिखाकर जो तानाबाना बुना जा रहा है, उसमें कहीं कोई दम नहीं है । बीस वर्षों से अगर मधेश स्थानीय निकाय के प्रतिनिधियों के बगैर चला है तो कुछ वर्ष और सही । वैसे भी ये प्रतिनिधि क्या कर रहे हैं उसका नमूना तो अब से दिखने लगा है । देश चंद पार्टियों के हाथों का खिलौना बना हुआ है जिससे वो खेल रहे हैं और अपना जी बहला रहे हैं जिसमें सबसे सस्ता खिलौना इन्होंने मधेश को बना रखा है । जब जी चाहा मौत बाँट दी और जब मतलब याद आया तो गले लगा लिया । कड़वा सच तो यह है कि मधेशी जनता को भी खिलौना बनना ही भाता है ।

आज की स्थिति में राजपा से जो उम्मीदें मधेश ने जोड़ रखी हैं उसके लिए राजपा को एक सुदृढ नीति और पारदर्शिता अपनाने की आवश्यकता है । परिवारवाद और व्यक्तिगत स्वार्थ या सोच से ऊपर इन्हें उठना होगा । वरना हश्र सबको पता है ।

राजपा अगर यथास्थिति में टिकी रही तो जिस मधेश के अस्तित्व से विश्व परिचित हुआ है, वह विश्व यह भी देखेगा कि नेपाल के लोकतंत्र का सच क्या है ? किस तरह नेपाल की आधी आबादी को उसके हक से वंचित करने की साजिश की जा रही है ? किस तरह उन्हें उनके मौलिक अधिकार के प्रयोग से रोका जा रहा है ? जब देश आपकी बात ना सुने तो अपनी बात अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाना स्वाभाविक हो जाता है । मधेश आन्दोलन ने विश्वपटल पर मधेश की उपस्थिति दर्ज करा दी है । इसलिये भी आवश्यक है कि विभेद की इस नीति को अन्तर्राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बनाया जाय । आखिर क्यों यह जिद है कि चुनाव के बाद मधेश के मुद्दों को सम्बोधित किया जाएगा ? अगर आपकी नीयत सही है तो यह आज ही सम्भव है । चीन यात्रा से पहले एमाले अध्यक्ष के दिल में अनायास ही मधेश प्रेम उत्पन्न हो गया था पर वापसी के बाद फिर से इनके सुर बदल गए हैं । कुछ तो है जो भले ही दिख नहीं रहा पर, जो है उसका अंजाम नेपाल की धरती पर सही परिणाम नहीं लाएगा यह तो तय है ।
आज की स्थिति में राजपा से जो उम्मीदें मधेश ने जोड़ रखी हैं उसके लिए राजपा को एक सुदृढ नीति और पारदर्शिता अपनाने की आवश्यकता है । परिवारवाद और व्यक्तिगत स्वार्थ या सोच से ऊपर इन्हें उठना होगा । वरना हश्र सबको पता है । क्योंकि यह तो तय है कि तीन बड़ी पार्टियाँ राजपा के बिखरने का इंतजार कर रही हैं और इसके लिए प्रलोभन के पाशे भी फेके जा रहे हैं या फेके जाएँगे, जिससे इन्हें बचना होगा । क्या फर्क पड़ता है कि इन्हें तत्काल शक्ति नहीं मिलती या सत्ता नहीं मिलती पर आनेवाला कल इनका ही होगा । इतिहास गवाह है कि अधिकार और अस्तित्व प्राप्ति की लड़ाई लम्बी चली है । इन्हें जनता के बीच जाना चाहिए । आज इनका धैर्य, कल मधेश के हित में परिणाम लाएगा । पर अगर ये मुद्दों को गिरवी रखकर समझौता करते हैं तो यह लड़ाई फिर से वहीं पहुँच जाएगी जहाँ से शुरु हुई थी और फिर मधेश को सम्भालना मुश्किल हो जाएगा ।
इसी बीच भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी का बिमस्टेक की बैठक के लिए नेपाल आना हुआ । इस यात्रा में उनकी यहाँ के सभी नेताओं से मुलाकात हुई जिनमें राजपा के सभी वरिष्ठ नेता भी थे । औपचारिक तौर पर तो नहीं पर अनौपचारिक तौर से यह चर्चा जरुर होती रही कि सुषमा जी ने चुनाव को लेकर मधेशवादी दलों से उनकी राय जाननी चाही । परन्तु एक बार फिर राजपा के वरिष्ठ नेताओं ने अपनी अडिगता जाहिर की आत्मघाती कदम को स्वीकार करने से इनकार कर दिया । यह अडिगता ही इन्हें मधेश की राजनीति में मजबूती दिलाएगी । सलाह या सुझाव तब तक ही मान्य है जबतक हमारा हित उसमें है । यह सही है कि देश हित सर्वोपरि है, देश के विकास में स्थायीत्व का महत्व होता है इसलिए समझौता करना गलत नहीं है । पर यह समझौता एकतरफा नहीं हो सकता । कोई एक पक्ष ही निरन्तर बलि का बकरा नहीं बन सकता यह घर वाले को भी समझना होगा और बाहर वाले को भी । सरकार पासा फेक रही है कि संविधान संशोधन संसद में जाएगा और उसके परिणाम को राजपा को स्वीकार करना होगा । कुर्सी बचाने के लिए अगर तालमेल की जा सकती है तो इस विधेयक को पास कराने के लिए बहुमत जुटाने की नीति क्यों नहीं बनाई जा सकती है ?
यों तो तीन बड़ी पार्टियों ने मधेश में अपनी पैठ बनानी शुरु कर दी है जो चुनाव तक जारी रहने वाला है । पर प्रकृति के कहर ने इसमें कुछ विराम लगा दिया है वहीं शायद आगामी दिनों में होने वाले परिवर्तन के लिए मधेश की जनता को सोचने और सही फैसला लेने के लिए समय भी दे दिया है । हालात सम्भलने में काफी वक्त लगेगा । फसलें तबाह हो गई हैं, घर बरबाद हो चुके हैं, अपनों ने बेवक्त साथ छोड दिया है, ऐसे में एक महीने के बाद होने वाले चुनाव पर इन हादसों का असर जरुर पड़ने वाला है । अभी इन्हें अपनों की तलाश है, जाहिर सी बात है कि इस अवसर का फायदा सभी लेना चाहेंगे क्योंकि दर्द की बिसात पर संवेदना का मरहम लगाकर राजनीति करना नेताओं की फितरत होती है । पर जनता को इस हकीकत से वाकिफ होना होगा कि सही मायनों में उनके अपने कौन हैं, क्योंकि नेता और जनता इन दोनों का सही निर्णय ही विकास की राह खोलता है ।

 

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