मधेश एक मजबूत नेतृत्व की तलाश में है जिसके अन्दर सत्ता की लालसा नहीं हो : श्वेता दीप्ति

जिस घटना को राष्ट्रवाद से जोड़कर मीडिया सस्ती लोकप्रियता हासिल कर रही है और मधेशी के बहे खून का गुणगान कर रही है ये सब उस वक्त कहाँ थे जब अपनी ही सरकार सरेआम मधेश की जनता को मार रहे थे और मधेश की मिट्टी खून से लाल हो रही थी ?

श्वेता दीप्ति, काठमांडू , २ अगस्त |

प्रचण्ड के प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के साथ दिए गए पंजीयन से यह तय हो चुका है कि सत्ता की बागडोर माओवादी अध्यक्ष प्रचण्ड के हाथों में जाने वाली है । अटकलों का दौर अब थक चुका है । नजरें परिणाम को जानते हुए भी कल पर उत्सुकता से टिकी हुई हैं । इन सबके बीच सबसे अहम सवाल ये है कि देश को इस सत्ता परिवत्र्तन से क्या हासिल होने वाला है ? क्या कोई क्रांतिकारी परिवत्र्तन होगा |

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क्या कल तक जो देश के एक हिस्से के साथ हुआ उसकी भविष्य में पुनरावृत्ति नहीं होगी ? क्या मधेश अपनी पहचान, अधिकार और सम्मान को प्राप्त कर लेगा ? कल तक जिन मधेशियों को उनकी माँग के कारण बिहारी या भारतीय कह कर गाली दी गई क्या तिलाठी की घटना से वो नजरिया पहाड़ी समुदाय मधेशियों के लिए बदल जाएगा ? जिस घटना को राष्ट्रवाद से जोड़कर मीडिया सस्ती लोकप्रियता हासिल कर रही है और मधेशी के बहे खून का गुणगान कर रही है ये सब उस वक्त कहाँ थे जब अपनी ही सरकार सरेआम मधेश की जनता को मार रहे थे और मधेश की मिट्टी खून से लाल हो रही थी ? आज एक साधारण सी घटना जो तकरीबन हर साल घटती है उसके समर्थन में राजधानी की सड़कों पर भारतीय अतिक्रमण के नारे के साथ जुलूस निकाले जा रहे हैं । मधेशी राष्ट्रवादिता की जय जयकार किए जा रहे हैं, घायलों को टोपी पहनाई जा रही है उनकी मिसालें दी जा रही हैं, ये सभी उस वक्त क्यों मौन थे, जब मधेश की निरीह जनता को चुनचुन कर मारा जा रहा था ? तब राजधानी की सड़कों पर उनके लिए क्यों नहीं नारे लगे ? अधिकार ही तो माँग रहे थे, वो भी अपनों से । आज गैर के पत्थर की चोट की गूँज जिन्हें सुनाई पड़ रही है वो कान उस वक्त बहरे क्यों हो गए थे ? आज एक आदमी पत्थर खाकर हीरो बन गया कल उसी मधेश की मिट्टी के कई जवान निर्दयता के साथ मारे गए थे । जिनकी मौत के बाद आज भी उन्हें शहीद घोषित करने के लिए और घायलों के उपचार के लिए जद्दोजहद जारी है । इन सबके बीच यही चेहरे थे जो आज सत्तानसीन होने जा रहे हैं क्या अचानक इनका नजरिया बदल गया, या इनके अन्दर नैतिकता और मानवता ने जगह बना लिया है ? सच तो यह है कि ये सब अवसरवादिता है, ऐसे में अगर विश्लेषण किया जाय तो क्रांतिकारी परिवत्र्तन की कहीं कोई सम्भावना दूर–दूर तक नजर नहीं आ रही है, सिवा इसके कि राजनीतिक पटल पर कुछ नाम बदल गए हैं, कल ओली जी थे आज प्रचण्ड जी हैं । भूकम्प पश्चात् हुए सहमति ने जिन दो धार को एक बिन्दु पर ला खड़ा किया था वो आज फिर से दो सिरे पर हैं । किन्तु परिदृश्य वही है, आज भी जो मुख्य पार्टियाँ मिल कर सामने आ रही हैं, वो भी अलग विचार और धार से ही आते हैं । ऐसे में इनका मिलन क्या गुल खिलाएगा, वो तो आनेवाला कल ही बताएगा । फिलहाल ओली जी जाते–जाते राष्ट्रवाद की कमान पर चाइना का तीर छोड़कर जा रहे हैं, ताकि इसका असर बरकरार रहे । उनकी उपलब्धियों में मुहावरों, सपनों और कटाक्षों के अलावा कोई और उपलब्धि रही है, तो वो है चीन के साथ हुए समझौते । वस्तुस्थिति उन्हें भी पता होगी कि इन समझौतो का कार्यान्वयन होना पत्थर पर दूब उगाने के जैसा है, फिर भी उनके पास चीन समझौते का एक तुक्का तो है ही, जिसे वो जब चाहे राष्ट्रवाद के नाम पर भजा सकते हैं और उसमें प्रचण्ड को लपेट सकते हैं । वैसे प्रचण्ड जी ने इस मामले में अपनी प्रतिबद्धता पहले ही जता दी है कि वो इन समझौतों का कार्यान्वयन कराएँगे ।

देश की सबसे बड़ी समस्या अगर है, तो वह है मधेश मसला । सबकी निगाहें यहीं टिकी हुई हैं और प्रचण्ड जी भी इसी समस्या के सहारे सत्तासीन होने जा रहे हैं । संविधान संशोधन, संघीयता ये सभी मसले ऐसे हैं जहाँ एमाले के साथ के बिना इसे सुलझाया नहीं जा सकता यहाँ बहुमत की आवश्यकता होगी जिसमें एमाले का सहयोग चाहिए । सवाल यह है कि जब सत्ता में रहकर एमाले मधेश की अवहेलना करती रही तो अब वो इस मुद्दे पर क्योंकर साथ देगी ? ऐसे में मधेशी गठबन्धन से हुए किसी भी सहमति का कोई अर्थ नहीं रह जाता है । मधेशी गठबन्धन प्रचण्ड के नाम का प्रस्तावक बन चुका है जिसका विरोध भी हो रहा है पर देखा जाय तो, यह महज औपचारिकता ही है क्योंकि दूसरा कोई उम्मीदवार सामने नहीं है और मोर्चा के पास इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं है । माओवादी, काँग्रेस गठबन्धन मधेशी गठबन्धन को मिलाने की पुरजोर कोशिश में लगी हुई है । आज तीन बुंदे सहमति हुई किन्तु सीमांकन के मामले पर बात अटकी हुई है । मधेशी गठबन्धन की माँग है कि मधेश दो प्रदेश की बात लिखित रूप में सहमति हो पर दूसरे पक्ष का कहना है कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है । उम्मीद है कि कल सुबह तक इस मसले पर कोई सहमति भी हो जाएगी । परन्तु सही मायनों में ये सारी सहमतियों के पीछे अगर कुछ है, तो वह है मधेशी मोर्चा का सत्ता में शामिल होने के लिए पूर्वाधार की तैयारी । ये सारी बातें सत्ता में सरीक होने की राह बना रही है ।

मधेशी जनता ने जो गँवाया है आन्दोलन के दौरान, उसकी कोई भरपाई होने की सम्भावना नजर नहीं आ रही है । मधेशी नेता अगर मधेशी जनता की भावनाओं के विपरीत कदम उठाती है, तो यह उनके लिए आत्मघाती सिद्ध होगा । क्योंकि किसी अपेक्षित परिणाम की उम्मीद नजर नहीं आ रही है । जवाब तो उन्हें देना होगा और मधेशियों के बहे खून का हिसाब भी । देखा जाय तो मधेश एक मजबूत नेतृत्व की तलाश में है, जिसके अन्दर सत्ता की लालसा नहीं मधेश के हित की चाहत सर्वोपरि होनी चाहिए । जबकि अभी जो भी हैं वो आज भी मधेश के हित से अधिक भविष्य के पद को सुरक्षित करने में लगे हुए हैं । आन्दोलन के क्रम में भी उनकी असक्षमता ही नजर आई । अगर इनमें ऐक्यबद्धता होती तो शायद आन्दोलन का परिणाम कुछ और होता । अपरोक्ष रूप से भारत द्वारा प्राप्त सहयोग का भी मधेशी नेता लाभ नहीं उठा पाए और आज तो भारत मधेश के लिए किसी सहयोग करने के मूड में नजर नहीं आ रहा । इसलिए मधेशी नेताओं को अगला हर कदम फूँक–फूँक कर उठाने की आवश्यकता है । मधेश की जनता के साथ–साथ मधेशी समस्या से जुड़े हर विज्ञ की ये धारणा है कि मधेशी नेताओं को सत्ता में सहभागी नहीं होना चाहिए बल्कि बाहर से दवाब बनाना चाहिए । खैर देखना यह है कि मधेशी वरिष्ठ नेता अपनी किस परिपक्वता या दूरदर्शिता का परिचय देते हैं ।


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