मधेश और मधेशवासी का दुर्भाग्य मधेशवादी दल के नेतागण

गंगा प्रसाद अकेला:मधेश आन्दोलन में पूरे उत्साह और उमंग से मधेश की जनता ने जिस प्रकार अपनी सहभागिता दिखाई एवं बलिदानी दी, वह नेपाल के ही नहीं अपितु विश्व इतिहास में एक उल्लेखनीय एवं अविस्मरणीय कर्ीर्तिमान के रुप में अंकित हो चुका है । कितने किसान परिवार के माता-पिता, विद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थी, किसान, मजदूर, बालक से वृद्ध तक शहीद हुए । कितने माता-पिता निःसन्तान बने, कितनी नवविवाहिताओं की लाल साडÞी और लाल चूडिÞयो के रंग धूमिल होने से पहले ही विधवा हो गई । कितने गरीब वृद्ध दम्पति वृद्धावस्था में अपने इकलौते सन्तान की दुःखद अनकस्मिक मृत्यु से बिलख-बिलख कर दाने-दाने के लिए तरसते हुए अकाल मौत के शिकार बन गए । अखिर क्यो – बस, सबो की केवल एक ही चाहत थी कि सदियों पर्ूव से शासकों द्वारा पहचानविहीन, शोषित, प्रताडिÞत, उपेक्षित, अवहेलित, अपने अधिकारों से वंचित रहने की अवस्था से मुक्ति मिलकर उनको वह हक मिले, जिनसे उन्हें सदियों पर्ूव से वंचित रखा गया था ।

मधेश और मधेशवासी का दुर्भाग्य  मधेशवादी दल के नेतागण

मधेश और मधेशवासी का दुर्भाग्य मधेशवादी दल के नेतागण

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मधेश आन्दोलन में भारत की भूमिका

इतना ही नहीं त्रेतायुगीन प्राचीन मिथिला राज्य की राजधानी, जनकपुरधाम तथा नेपाल के आदि नरेश राजषिर् एवं ब्रहृमषिर् जनक की सन्तान, तत्पश्चात् लुम्बिनी के राजा शुद्धोधन और रानी मायावती के पुत्र गौतम बुद्ध के बन्धु-वान्धव और नेपाल के प्रारम्भिक नागरिक आदिवासी, मधेशी समुदाय और मधेश, जो वर्तमान नेपाल के पहाड और हिमाली भेग को खुद उपजाए अन्न से बराबर खाद्यान्न उपलब्ध कराकर पेट भरता आ रहा था, उसे ही नये नेपाल के निर्माण के पश्चात् शासक और उनके दरबारियों ने अपनी ही भूमि में विदेशी बना दिया था, जो आज तक भी मधेशी ही नहीं भारतीय के रुप में सम्बोधित होते आ रहे हैं । उन सारी पीडÞाओं से मुक्त होने और अपनी सही पहचान स्थापित करने के लिए मधेश के वीर सपूतों ने अपनी कर्ुबानियाँ दी थी । मगर मधेश के उन वीर सपूतों की सारी कर्ुवानियों को मधेशवादी राजनीतिक दलों के सभी नेताओं ने भुला दिया । उनके बहे खून की बदलौत मधेश में पूरब से पश्चिम तक दर्जनों राजनीतिक दल तो बन गए, मगर उन वीर सपूतों के खून को सभी राजनीतिक दलों के नेताओं ने अपने मस्तक पर चन्दन जैसा लेप लगाया और सत्ताधारियों के साथ साँठ-गाँठ कर वे सभी अपनी स्वार्थ-सिद्धि करने में इस कदर जुट गए कि उनमें से आज कोई भी न मधेशी को पहचानता है न मधेश को । अरे र्सवसाधारण मधेश की जनता को पहचानने की बात तो दूर, मधेश के अन्तर्रर्ाा्रीय ख्यात्रि्राप्त विद्वानों को भी उन में से कोई पहचानना गंवारा नहीं करता ।
प्रशासनिक क्षेत्र, साहित्यिक, सांस्कृतिक, पर्यटकीय क्षेत्र तक के वरिष्ठ विद्वानों और नीति निर्माण के स्तम्भ जैसे रहे व्यक्तित्व तक कोई नहीं पहचानता । क्या कुछ चन्द राजनीतिकर्मी ही, जिनमें अधिकांश सिर्फसाक्षर है- वे ही लोग मधेश और मधेशियों के लिए उपयुक्त और समुचित प्रकार की व्यवस्था कर सकते हैं – दो दशक से सत्तासीन लोगों के साथ मन्त्री बने मधेशी नेताओं में से किसी ने भी अपने ही जिलों में कुछ भी विकास का काम किया है, ऐसा किसी भी जिले में अब तक दृष्टिगोचर नहीं होता । हाँ उन सबों ने काठमांडू में भव्य महलांे का निर्माण, विदेशी  कीमती गाडी का मालिक बनकर उस में सैर-सपाटा करने का सौभाग्य जरुर प्राप्त कर लिया है ।
विश्वका पहला ऐतिहासिक प्राचीन पोखरियों और तालावों, भव्य मन्दिरों, सांस्कृतिक विशिष्टताओं की दृष्टि से अद्वितीय, देश का एक मात्र रेल्वे का मुख्यस्थल आदि अद्वितीय सम्पदायों से परिपर्ूण्ा त्रेतायुगीन प्राचीन मिथिला राज्य की राजधानी रह चुका नगर- जनकपुरधाम, आज अपने पुराने अस्तित्व और स्वरुप से व्रि्रूप और विकृत बना दिया गया है । खुद अपने ही पुत्रों से- जिन में लोकतान्त्रिक गणतन्त्र नेपाल के प्रथम राष्ट्रपति और प्रमुख सभी राजनीतिक दलों के शर्ीष्ा कहे जानेवाले नेतागण भी हैं, तो फिर मधेश के अन्य जिलों की दुरावस्था के बारे में खुद ही अन्दाजा लगाया जा सकता है । दूसरी ओर प्रशंसनीय बात यह है कि पहाडÞ और हिमाल के प्रायः सभी जिलों के नेताओं ने अपने-अपने जिलों का विकास कर दिखाया है । वह प्रशंसनीय ही नहीं, अपितु वहाँ के राजनीतिकर्मी बधाई के पात्र जरूर हंै । और यह स्तम्भकार उन सबों का उनकी सुकर्ीर्ति के लिए नमन करता है ।
मधेश-तर्राई के सारे राजनीतिक नेताओं को उनसे प्रेरणा लेकर भी अपने-अपने जिलों में कुछ न कुछ तो विकास निर्माण का कार्य करना चाहिए था, मगर सारे के सारे अपने ही शहीदों के कफन चोर जैसे बन चुके हैं । हिमाल-पहाडÞ में जहाँ सडÞके नहीं थी, गाडिÞयां नहीं पहँुची थी- प्रायः अधिकांश जगहों में अच्छी और पक्की सडÞके बन चुकी है, गाडिÞयां दौडÞ रही हैं । दर्ुभाग्य देखिए मधेश और मधेशी का- उनकी समतल भूमि पर पहले जैसी कच्ची सडÞकें तक नहीं रह गई हैं । धान की बडÞी भखारियों से भरा रहनेवाले गाँवों में मिट्टी की छोटी धान रखनेवाली कोठियाँ तक नदारद हंै । सदा ही गीत-संगीत से अनुगुंजित रहनेवाला गाँव/नगर उजाडÞ बन गया है – पक्की और पीच सडÞकें तो शायद मधेश और मधेशवासियों के लिए स्वप्न का विषय बन चुकी हंै । फिर उनपर र्सार्वजनिक सवारी साधन और अन्य गाडिÞयो के चलने की बात तो परीकथा की विषयवस्तु बन चुकी है । फिर हम दोष औरों को दें तो कैसे और किस मुँह से – जब हमारी मिट्टी की रक्षा करनेवाले कुपात्र सारे खुद ही भक्षक बन चुके हैं । अन्त में मधेशियों को अब इस शायरी को दुहराने के सिवाय और कोई दूसरा विकल्प नहीं दिखता है-
लूटा हमें अपनों ने ही और में दम ही कहाँ था
जागो मधेश के सपूतों ! रौंद डालो गद्दारों को जिसने खुद ही हमें रौंदा !

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