मधेश और मधेशी के अस्तित्व के बारे में सौदेबाजी अवैध मानी जाएगी : दीपेन्द्र चौबे

दीपेन्द्र चौबे

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दीपेन्द्र चौबे,अधिवक्ता, काठमांडू, १७-८ १५ | लोकतंत्र आज की दुनिया का आदर्श है। बहुमत से निर्णय लेने की व्यवस्था इसके मूल में है। लेकिन इस व्यवस्था की अपनी सीमाएं हैं। कई ऐसी बातें हैं, जिनका निर्धारण बहुमत से नहीं होता है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में ऐसे कई बुद्धिजीवी हैं जो बहुमत को ही लोकतंत्र का पर्यायवाची मान बैठे हैं। एमाले कांग्रेस माओबादी और पिछले दिनों मधेश का नेत्रित्व कर चुके फोरम लोकतान्त्रिक के साथ ही कुछ अन्य छोटी पार्टीयों के नेता भी इसी विचार से सहमत हैं। लोकतंत्र की अपनी समझ के अनुसार उन्हें लगता है कि नेपाल की जनता ने उन्हें मतों के द्वारा यह अधिकार दे दिया है कि वे इस देश की जनता के साथ जो भी चाहे वो कर सकते हैं। इसमें से एक है संविधान लाना, भले ही उसमें महिला का अधिकार न हो, मधेशी अधिकार न हो, जनजाति अधिकार ना हो और गैर हिन्दू अपने धर्म के प्रति संरक्षण महसूस नही कर पाये,पर ऐसा संविधान उन्हें बनाने का अधिकार हैं क्यूँ की उन के पास् बहुमत है अपना अधिकार मांगने वाली जनता अगर उनके सुर में सुर न मिलाये या उनके मुद्दे के साथ नहीं रहना चाहे तो उसे इस देश का नागरिक नहीं माना जायेगा या उसे यूपी या बिहार भेज दिया जायेगा क्योंकि इनके पास बहुमत है बहुमतधारी लोगों को यह लगता है की अधिकार विहीन मधेश के साथ जैसा खेल खेलना हो खेलो क्योंकि वहां की जनता की राय,मत माध्यम से उन्हें इस कदर प्राप्त है की वो बहुतमत के नाम से कुछ भी कर सकते हैं।
सरकार या सरकार को बहार से समर्थन दे रहे गुटों को यह बताने और समझाने की जरूरत है कि राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दे हमेशा बहुमत से नहीं तय किए जाते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में जब फ्रांस की संसद ने हिटलर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया, तो वहां से दूर ब्रिटेन में बैठे चार्ल्स डिगाल ने घोषणा की कि वह फ्रांसीसी संसद के निर्णय को नहीं मानता। उसने स्वतंत्रमना फ्रांसीसियों को इकट्ठा किया और अपने देश की सरकार के खिलाफ ही संघर्ष किया। क्या चार्ल्स डिगाल का निर्णय अलोकतांत्रिक थारुऐसा सवाल उठाना बचकाना कहा जाएगा, क्योंकि उस समय प्रत्येक फ्रांसीसी के सामने राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न खड़ा हो गया था। इसी तरह अमेरिका में दास प्रथा के मुद्दे पर गृहयुद्ध लड़कर अब्राहम लिंकन ने यह साफ कर दिया कि जब बात देश के अस्तित्व की हो तो लोकमत को सर्वोपरि नहीं माना जा सकता।
सरकार चलानेवाले व चलवाने वाले लोगजाने(माने नेताहैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि हमारे देश का लोकतंत्र यहां के संविधान के आधार पर चलता है और हमारा संविधान राष्ट्रीय एकता, अखंडता और प्रभुसत्ता पर सौदेबाजी की इजाजत किसी सरकार को नहीं देता है। यदि कोई सरकार मधेश और मधेशी के अस्तित्व के बारे में सौदेबाजी या समझौता करती है, तो वह स्वयं अवैध मानी जाएगी। पहचान सहित संघियता और संघियता सहित संविधान के मुद्दे पर यदि कभी सहमती को भूल कर बहुमत की नौबत आई तो उसमें केवल सदनके ६०१लोग ही नहीं बल्कि पूरे देश की जनता को शामिल करना होगा।
देश के भीतर जो बुद्धीजीवी और नेता लोकतांत्रिक मूल्यों के नाम पर जिस संविधान के नियम के अधार पर बहुमत से संविधान लाना चाहते हैं उन को कभी भूलना नहीं चाहिए की उसी संविधान में स्वायत मधेश प्रदेश भी लिखा है। बहुमत से संविधान लानेबाले को यह मालूम होना चाहिए कि साम्राज्यवादी और विस्तारवादी ताकतें अपने निहित स्वार्थों के लिए देशों को तोड़ने की जुगत में हमेशा लगी रहती हैं। बौद्धिक विमर्श के नाम पर ऐसे विषय बड़ी चालाकी से लोगों के मन मष्तिष्क में डाल दिए जाते हैं। इसलिए तमाम बुद्धिजीवियों और नेताओ से मेरा आग्रह है कि वे राष्ट्रीय एकता और अखंडता से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर शागुफेबाज़ी और अकादमिक बहसन चलाएं क्योंकि इस प्रकार की बहस से राष्ट्रीय मनोबल में गिरावट आती है और हमारे अंतरविरोध बढ़ जाते हैं।
constitutionमधेशके मुद्दे पर मधेश की जनता को जिस तरह से नीचा दिखानेवालेकार्य निरंतरतर हो रहें हैं, वह गैर(जिम्मेदाराना है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जिस तरह से सत्ता पक्ष के द्वारा छिंटाकसी हो रही है और शांतिपूर्ण अधिकार आन्दोलन को कुचलने का प्रयास यह सरकार कर रही है, वह अपने आप में अलोकतांत्रिक है। साथ ही इसने मधेश के करोड़ों लोगों की भावना को भी आहत किया है। संविधान एक ऐसा दस्ताबेज है जिसमें हर तबके, हर क्षेत्र, हर वर्ग के लोगों की भावनावों का ख्याल होना चाहिए और लोगों को इस दस्तावेज पर विश्वास होना चाहिए। जब तकदेश की जनता के भावनाओं का सम्मान संविधान में नहीं किया जायेगा और विश्वास नहीं जीता जायेगा तब तक हम चाहे जैसा भी संविधान बना ले, सफल नहीं हो सकते हैं। हमारा अतीत भी कुछ ऐसा ही रहा है।इसलिए फिर से अपने इतिहास की गलतियों को दोहराने की कोशिश से हमें दूर रहना होगा |
बावजूद विरोध करने के लिए नेपाल बंद में हिंसा और मारपीट का आश्रय लेना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता है । सतापक्ष के द्वारा लादे जाने वाले संविधान से सौ प्रतिशत असहमत होने के बावजूद बंद के दौरान किए गए व्यवहार की मैं घोर निंदा करता हूं।

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