मधेश कागज के टुकड़े से मानने वाला नहीं, धोखा हुआ तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा : मुरलीमनोहर तिबारी

मुरलीमनोहर तिबारी (सिपु), बीरगंज , १६ जनवरी |

आंदोलन के समर्थन में अब भारत में भी कई कार्यक्रम हो रहे है। भारत-नेपाल मैत्री यात्रा के तहत राष्ट्रीय जनता दल के केंद्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने पच्चीसो सभा किए। इन सभाओं में भारत और मधेश के नेताओ ने संयुक्त सहभागिता किया। निःसंदेह इससे आंदोलन में ऊर्जा का संचार होगा। मधेश को हिम्मत और हौसला मिलेगा।

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श्री सिंह ने नेपाल सरकार को मधेश पर दमनात्मक कारवाही बंद कर, वार्ता द्वारा समाधान का सुझाव दिया। साथ ही कहा की जहां मधेशी ५१% है, उन्हें संसद में ६५ सिट दिया है, और पहाड़ी ४९% उन्हें १०० सिट दिया है। इसी प्रकार राज्य सभा में १० लाख वाले राज्य से ८ और ५० लाख वाले राज्य से ८ सांसद दिया है। यह गलत है, किसी से भी पंचायती कराया जाएं, नेपाल सरकार दोषी सिद्ध होगी। भारत में जनसँख्या पर प्रतिनधि भेजा जाता है, सिक्किम की आबादी कम है तो एक और बिहार की ज्यादा है तो ज्यादा भेजा जाता है। जहां अफ्रीकी मूल का ओबामा अमरीका का राष्ट्रपति बन सकता है, वहा नेपाल मूल के नाम पर भेद-भाव कर रहा है।

s-3पूर्व केंद्रीय मंत्री, भारत सरकार ने कहा ही मधेशी दलो में एकता नहीं होने के कारण आंदोलन सफल नहीं हो रहा है। उन्होंने मोदी सरकार पर बेखबरी और मधेश के सन्दर्भ में उदासीन रहने का आरोप लगाया। साथ ही कहा की कमल थापा, मोदी सरकार से इजाजत लेकर तस्करी करा रहे है। नेपाल सरकार और भारत सरकार मिले हुए है। भारतीय लोग मधेश के मदद में खुद तस्करी रोकने को आगे आने लगे है। इससे कानून- ब्यवस्था की समस्या उत्पन हो रही है।
उन्होंने मधेश से जुड़े भारत के पांच राज्यो के मुख्यमंत्री से भी तस्करी रोकथाम का आग्रह किया, साथ ही मधेश की आग से पांचो राज्य प्रभावित होने की चेतावनी भी दी।

उक्त सभा में ब्योबृद्ध स्वतंत्रता सेनानी पं हंकार मणी त्रिपाठी ने आंदोलन को समर्थन और आन्दोलंकारी को आशीर्वाद देते हुए कहा की दिन भर घंटी बजाकर पूजा करने वाले और पांच वक़्त के नमाजी दोनों मिलकर तस्करी रोके। उन्होंने सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, यदुवंशी सभी को मधेश की मदद को आगे आने का आह्वान किया। वहा मधेश समर्थन में जन-शैलाब उमड़ पड़ा था।s-1

नेपाल सरकार के हवाले से खबर आ रही है, की माघ ५ गते तक सब ठीक हो जाएगा। बंद कमरे में, परदे के पीछे सहमति हो गई है। इसका लक्षण इसी से जाहिर होता है की ओली- मोदी बिच फ़ोन होना, फिर ओली का राजेंद्र महतो को फ़ोन करना, ये सब कई सूत्र जोड़ते है। मधेश के नेता बिकल्प तलाशते हुए भारत के अन्य बिपक्षी नेता से मेलजोल करते हुए देखे जा रहे है। इनका मोदी सरकार से मोह-भंग स्पष्ट दिख रहा है।

फिर भारत ने रक्सौल में फंसे टैंकर को दूसरे नाका से जाने की इजाजत दे दी। इसका अर्थ हुआ या तो सब बाते मिल चुकी है, या भारत मधेश समर्थन से पीछे हट गया है। अगर सब कुछ दूसरे नाका से चला ही जाएगा, तो मितेरी पुल पर धूनी रमाने से क्या होगा। भारत मधेश को खा गया, मोर्चा का नाकाबंदी, आंदोलन को खा गया।

ये भी ध्यान देने की बात है की अभी आंदोलन ख़त्म नहीं हुआ है, फिर भी बिरगंज में पांच महीने से बंद सरकारी कार्यालय खुल गए और मोर्चा देखते रहा। यहाँ तक की गांव- गांव से सवारी गाड़ी तक चलने लगी और कोई बिरोध नहीं हुआ। इसका अर्थ हुआ की या तो मोर्चा थक गया है, या बात मिल गया है। अगर थक गया है तो आंदोलन का कमान बाकि आंदोलनकारी साथी को देकर सहयोग और शक्ति संचय करना चाहिए। अगर बात मिल गई है तो राजनैतिक ईमानदारीता दिखाते हुए, समझौता करने से पहले मधेश को बिश्वास में लेना चाहिए।

अगर ऐसा नहीं हुआ तो जब तक अधिकार की संवैधानिक सुनिश्चिता नहीं होगी, मधेश पूर्व की तरह किसी कागज के टुकड़े से मानने वाला नहीं है। अगर धोखा हुआ तो इसका खामियाजा सदियो तक भुगतना पड़ेगा। शहीदों की बलिदानी दबाव में झुकने के लिए नहीं अधिकार प्राप्ति के लिए अंतिम साँस तक लड़ने के लिए है। नेता सत्ता समर्पण, मुद्दा बिसर्जन और अमृतलिंगम चरित्र से बाहर निकले, वरना मधेश कभी क्षमा नहीं करेगा।
जय मधेश।।

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