मधेश काे अधिकार नही, अस्तित्व चाहिए : अब्दुल खानं

अब्दुल खानं,बर्दिया । “””””””””””””””””””””””” चुरिया शिवालिक पर्वत के निचले भू-खण्ड मे रहे इस समतल मैदानी ईलाके मे गर्मिे के समय मे अत्यधिक गर्मि अाैर ठंडक के समय मे अत्यधिक ठंढ होता है | इस ईलाके मे धान, गेहुं, मकै, गन्ने अाैर दलहन तेलहन की फंसले उगाइ जाती है। साखु,सिसाै जैसे प्रजाति के घने जंगल पाए जाते हैं । हाथी, गैडा, बाघ, हरिण जैसे जानवरवाें की जातियां पाए जाते हैं। सारस,मैना,सुगा,निलकंठ जैसे पंक्षियाें की प्रजाति पाई जाती हैं।अनेक नदी नाले पाऐं जाते हैं। यहाँ के लाेग धार्मिक हाेते हैं। साम सुवा शहेराे अाैर गांवाे मे मन्दिराे मे भगवान कि अार्ती,मस्जिदाे मेे अाजान कि अावाज,गुरु द्वाराे मे गुरु गाेविन्द जि कि वाणी ऐक साथ निकलती है,यहि यहाँ कि विशेषताऐ हैं। यहाँ बसाेवास कर रहे मधेशी समुदाय के लाेग,जिन कि अपनि जीवन पद्धति है।विभिन्न जात,धर्म,भाषा,संस्कार अाैर परम्पराऐं हैं।यह लाेग सदियाें से अपने हक अधिकार अाैर समानता के लिए नेपालयाें से लडते अा रहे हैं।भारतीय लाेगाे से मिलते जुलते यह लाेग अपने अाप काे भारतीय नही मानते हैं।

नेपाल द्वारा हमेशा से इन्हे शंका के दृष्टि से देखा जाता है अाैर वार वार अाराेपित अाैर अपमानित हाेना पड रहा है। यात्रा के दाैरान हाे, सरकारी कार्यालय हाे या सार्वजनिक स्थानाे पर हाे इनहे अलग नजर से देखा जाता है। अधिकार कि लडाई लडते लडते कुच्छ मधेशी नेपाल के राज्य सत्ता मे जरुर पहुचें पर पूरा मधेश अाज मिटने कि कगार पर हैं। जिस अधिकार के लिए के लिए बलिदानी दिया गया, लडाइयां लडि गई वह सब प्राप्ति करने के वजाय अस्तित्व से जुडी जल,जंगल अाैर जमिन ही मधेशयाें के हाथाे से निकलती जा रहि है। अाज पूरा मधेश के अस्तित्व मिटने कि कगार पर है। अाज मधेश काे अधिकार नही अस्तित्व बचाने कि जरुरत है। अपने अस्तित्व बचाने के लिए,पृथ्वी पर माैजुद सारे सजिव दिनरात क्रियाशिल हाेते हैं। ऐक फूल भी अपने अस्तित्व के लिए कलर यूक्त खिलता है,भंवरे काे अाक्रसित कर बिज का चलायमान करते हैं। छाेटे ब्याक्टेरिया भी,बडे बडे जनावर भी अाैर ईन्सान भी वहि अस्तित्व के लिए,लाेग नाैकरी जागिर,बडे बडे विकास अाैर विनास के कार्य किए जाते हैं।अगर अस्तित्व मिट गया ताे जीवन का अर्थ ही नही रह जाता है। अब मधेशयाें काे चाहिए पहिले मधेश का अस्तित्व बचाऐं फिर अधिकार खुद बखुद हाेजाएगा।जिस अधिकार कि लडाई हाे रहि उस्से हमारी जमिन नहि बच शक्ति,सन १९५१ मे मधेश मे ६% रहे नेपाली अाज ३८% हाेगए हैं।यिस लिए मधेश काे अधिकार नहि अस्तित्व चाहिए। अब्दुल खानं बर्दिया ।

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