मधेश का काला दिन

यह देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि एमाले पार्टी जो देशभक्त, राष्ट्रीयता और अखण्डता की बात करती है और उन्हीं के नेता शंकर पोखरेल नेपाली जनता का मन विभाजन करने में कोई कसर नही रखते ।


मधेशी जनता ने मुल्क में सत्ता परिवर्तन हुआ है यह अनुभूति अवश्य किया है, किन्तु शासन नही । शाही शासन, विकास अवरुद्ध, अधिकार से वन्चित एवं विभेद की दृष्टि पहले भी था और आज भी है । केवल अधिकार मिला है तो सड़क आन्दोलन करने के लिए, लड़ने के लिए ।

madhesh-andolan
कैलाश दास
२०७२ असोज ३ गते नेपाल में नया संविधान जारी किया गया । यह क्षण राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा उत्सव का क्षण होता है । किन्तु नेपाल के लिए बड़ा दुर्भाग्य सावित हुआ । नेपाल दो भू—भाग में विभाजित हो गया—‘पहाड़ और मधेश’ । इतना ही नही राजनीतिक दलों ने भू—भाग के साथ–साथ नेपाली जनता का मन मस्तिष्क भी विभाजित कर दिया—‘गोरा और काला’ ।
यह देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि एमाले पार्टी जो देशभक्त, राष्ट्रीयता और अखण्डता की बात करती है और उन्हीं के नेता शंकर पोखरेल नेपाली जनता का मन विभाजन करने में कोई कसर नही रखते । खैर एमाले के लिए यह कोई नई बात नही है, क्योंकि उन्ही की तत्कालीन सरकार ने जब मधेशी जनता अधिकार के लिए सड़क आन्दोलन पर थे तब गोलिया चलाई थी जिनमे ५९ नेपाली जनता की मौत हो गयी थी ।
संविधान जनता के लिए होता है । किन्तु नेपाल में संविधान जारी किया गया तब और आज भी आधी जनसंख्या इस दिन उत्सव मनाते हंै और आधी जनसंख्या काला दिन । आखिर क्यों ? इसलिए कि संविधान में आधी जनसंख्या का अधिकार मात्र सुनिश्चित हो पाया है, और आधी जनसंख्या जो मधेश में है उन्हें अधिकार तो क्या राज्य द्वारा गोलिया दागी गई थी । यह तो जनसंख्या की बात हुई । राजस्व की बात भी की जाए तो मुल्क में सबसे ज्यादा राजस्व मधेश से जाता है, फिर भी मधेश की जनता संविधान में अधिकार से वन्चित है ।
यह नेपाली जनता का राष्ट्र है, शायद यही बात नेपाली काँग्रेस, एमाले, माओवादी, राप्रपा सहित नही समझ सके । यहाँ की संस्कृति, भेष, भाषा, रहन–सहन सभी नेपाली है फिर भी विभेद क्याें ? नेपाल सरकार ने एक वर्ष के उपलक्ष्य में संविधान दिवस मनाया है । सभी नेपाली जनता को इस दिन को दीपावली जैसे उत्सव के रुप में लेना चाहिए था । क्योंकि इस संविधान ने शाही शासन को भष्म किया है । सत्ता परिवर्तन लाया है । अब मुल्क में लोकतन्त्र है जहाँ सभी जनता का समान अधिकार होना चाहिए ।
लेकिन ऐसा हुआ नही, क्योंकि संविधान लिखने की तैयारी से लेकर जारी किए गए वक्त तक मधेशी जनता ने संविधान में अपना अधिकार रखवाने के लिए सड़क से सदन तक आन्दोलन किया । उस वक्त अधिकार की जगह बन्दूक की गोलियाँ मिली और दर्जनों नेपाली जनता की छाती छल्नी छल्नी हो गयी । फिर ऐसा संविधान का दिन कैसे उत्सव और दीपावली मनाबें जो संविधान रक्तम्य है । यह दिन तो मधेशी जनता के लिए काला दिन ही होगा ।
राज नेताओं की सबसे बड़ी भूमिका राष्ट्र को सशक्त और जनता को विकास में लगाना, आर्थिक, सामाजिक तथा सुरक्षा को अनुभूति दिलाना, शान्ति सुरक्षा के साथ ही मुल्क को एक सूत्र में बाँधकर आगे बढ़ना । परन्तु यहाँ पर सत्ता और शासन स्वार्थ के कारण नेपाल विखण्डन की दिशा में है । आर्थिक स्थिति दयनीय बनती जा रही है । अशान्ति और असुरक्षा फैलती जा रही है, फिर भी यह बहस का विषय नही बन पाया है ।
मधेशी जनता ने मुल्क में सत्ता परिवर्तन हुआ है यह अनुभूति अवश्य किया है, किन्तु शासन नही । शाही शासन, विकास अवरुद्ध, अधिकार से वन्चित एवं विभेद की दृष्टि पहले भी था और आज भी है । केवल अधिकार मिला है तो सड़क आन्दोलन करने के लिए, लड़ने के लिए ।
मधेश नेतृत्वकर्ता दलों ने संविधान में, मधेश में दो प्रदेश, जनसंख्या के आधार में प्रतिनिधित्व तथा भारत से विवाह कर लायी गयी महिलाओं को वंशज का नागरिकता सहित संविधान में माँग रखा है । क्या यह अधिकार उठाना गैर कानूनी है । यह लोकतन्त्र उन्ही के लिए जो शाही शासन में भी पदासीन थे । नेपाल में लोकतान्त्रिक गणतन्त्र है तो फिर अधिकार देने से वन्चित क्यो किया जा रहा है । इस सवाल का जवाव नयी पीढ़ी को नही मिला तो वह दिन दूर नही होगा, मधेशी जनता प्रदेश नही देश का आवाज उठाने लगेंगे ।
मधेश प्रति राजनीतिक पक्षपात और विभेद के विरुद्ध में फिलहाल सिके राउत अभियान चला चूके हैं । उस अभियान में विशेष कर युवाओं की सबसे बड़ी सक्रियता देखी जा रही है । सिके राउत का मानना है कि नेपाल का शासक वर्ग कभी भी मधेशी जनता को राजनीतिक पहुँच, विकास का डोर, सेना, प्रशासन, न्यायालय में उच्चस्तर तक नही जाने देगा, इसलिए मधेश प्रदेश नही देश होना चाहिए और यह अभियान जोरो से आगे भी बढ़ रहा है ।
लोकतन्त्र की अनुभूति अगर सभी नेपाली को नही हुआ तो आज मधेश देश होना चाहिए अभियान में कुछ युवा सक्रिय हैं÷ हो रहे हैं, आने वाले दिन में हिमाल, पहाड़ में भी हो सकता है । इस देश को टुकड़े होने से बचाने के लिए शासन वर्ग और राजनीतिक दल को गम्भीर होना आवश्यक है । राणा शासन अन्त हुआ, शाही शासन अन्त हुआ अगर लोकतन्त्र में शासक वर्ग के चिन्तन में परिवर्तन नही हुआ तो आनेवाली पीढ़ी शासक वर्ग का राजनीतिक चरित्र अन्त नही करेगा यह कहना मुश्किल नही होगा ।
मधेशवादी दल में फिर से हलचल
इस बार फिर से मधेशवादी दलों के साथ राजनीतिक बेइमानी हुई यह कहने से नकारा नही जा सकता है । काँग्रेस—माओवादी की सरकार ने भी मधेशवादी दलों को भूलभूलैया में रखकर एकबार फिर से धोखा देने की सम्भावना बढ़ा दी है । मधेशवादी दल काँग्रेस—माओवादी की सरकार बनाने में सफल तो रहा किन्तु संविधान संशोधन कराकर मधेश का मुद्दा समाधान करने में असफल सावित होगा यह सम्भावना बढ रही है ।
मधेशवादी दलों के लिए सीमांकन समस्या यथावत है । संविधान में असन्तुष्ट धारा संशोधन हुआ नही और सरकार इसे कार्यान्वयन के लिए स्टेप÷स्टेप अपना कदम आगे बढ़ा रही है । फिर भी मधेशवादी दल मौन है । सरकार ने संविधान में सात प्रदेश अन्तर्गत उच्च अदालत स्थापना किया है । विराटनगर, जनकपुर, पाटन, पोखरा, तुलसीपुर (दाङ्ग) सुर्खेत, दिपायल । जबकि मधेश में दो प्रदेश होना चाहिए मांग को लेकर सीमांकन में विवाद है । अगर मधेशवादी दल जिस प्रकार से सीमांकन की बात कर रही है उससे स्पष्ट होता है कि जनकपुर और विराटनगर एक प्रदेश में होना चाहिए, फिर राज्य ने किस प्रकार विराटनगर और जनकपुर में उच्च अदालत स्थापना किया है—यह सवाल मधेशी जनता का मधेश नेतृत्वकर्ता से है ।
उपप्रधान एवं गृहमन्त्री विमलेन्द्र निधि जब गृह जिला आए थे तो उन्होने कहा– ‘समस्या समाधान तो विपक्षी दलों का किया जाता है । मधेशवादी दल तो हमारे समर्थक है, उन्होने हमारी सरकारी बनायी है, फिर उसके साथ वार्ता और संवाद कैसा । संविधान के कुछ धारा में असन्तुष्टि है जिन्हे संशोधन के लिए बात आगे बढ़ चुकी है ।’ इससे पहले काँग्रेस के रामचन्द्र पौडेल ने भी कहा था —‘मधेशवादी दलों की माँग ही स्पष्ट नही है । क्या माँग है और क्या संशोधन किया जाए ।’ यह तो हुई वर्तमान सरकार में शामिल साँसद और मन्त्री की बात । इससे पहले एमाले सरकार के प्रधानमन्त्री केपी शर्मा ओली ने भी यही बात दुहरायी थी ।
यह बात बहुत ही लज्जास्पद है मधेशी जनता के लिए । इसलिए कि वास्तव में मधेश नेतृत्वकर्ता दल की माँग स्पष्ट नही है । २०७२ असोज ३ गते काँग्रेस, एमाले, माओवादी सहित का संयुक्त सरकार ने नेपाल में संविधान जारी किया, जिन्हें मधेश में जलाया गया । क्योंकि वह संविधान अन्तर्गत मधेशी जनता राजनीतिक उच्चाई पर पहुँच पाना मुश्किल था । संविधान में क्षेत्रफल के आधार में राज्य का प्रतिनिधित्व चुना जाना था । इसलिए मधेशी दल ने जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व होना चाहिए माँग रखा । मधेश में दो प्रदेश होना चाहिए, जबकि मधेश और पहाड़ का भू—भाग मिलाकर ७ प्रदेश कर दिया गया । और तीसरा भारत से विवाह कर लायी गयी महिला को अंगीकृत नागरिकता नही, वंशज की नागरिकता होनी चाहिए यही प्रमुख तीन माँग रही और है भी ।
लोकतान्त्रिक गणतन्त्र में अपना अधिकार सुनिश्चित के लिए आवाज उठाना सबका मौलिक अधिकार है । फिर तो इस संविधान में सरासर शासकों ने विभेद की सीमा ही लाँघ चुकी है । इस बात को मधेशी जनता भलिभाँति समझ चुके हैं । इस लिए मधेशवादी दलाें ने यह संविधान अस्वीकार ही नही पुनर्लेखन के लिए सड़क आन्दोलन भी किया जिसमें ५९ नेपाली जनता की मौत हो गयी । उस वक्त एमाले की सरकार थी । जब सरकार गिराने की बात आई तो मधेशवादी दल ने कहा कि हमारी सरकार ही नही है, हम मानते ही नही है फिर गिराएँ क्यों ? किन्तु जब माओवादी केन्द्र तथा काँग्रेस का संयुक्त सरकार बनाने की बात हुई तो मधेशवादी दल का साँसद ने एमाले सरकार के विपक्षी में अविश्वास प्रस्ताव में वोट दिया । इससे पहले राष्ट्रपति का चुनाव हुआ था उसमे भी काँग्रेस लविङ्ग में वोट दिया था ।
माओवादी—काँग्रेस की सरकार में संविधान संशोधन की बात आयी । वर्तमान सरकार ने संविधान के एक वर्ष के उपलक्ष्य में दीपावली के साथ राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाने के लिए घोषणा किया । २०७३ असोज ३ गते मधेश में दिन में काला झण्डा फहराया गया तो रात में ब्लैक आउट किया गया । मोर्चा सहित गठबन्धन में आबद्ध दलाें का यह पूर्व निर्णय था । मोर्चा का इस निर्णय से स्पष्ट नहीं होता है कि नयाँ संविधान को किस रूप में लिया है । यह मधेशी जनता के लिए एक प्रश्न खड़ा कर रही है । क्योंकि यही दल कभी संविधान में ३४ बुँदा संशोधन होनी चाहिए प्रतिवेदन पेश किया करता है, तो कभी पुनर्लेखन की बात आगे बढ़ाता है । फिलहाल मधेशवादी दल से यह स्पष्ट नही हो रहा कि संविधान का बुँदा संशोधन वा पुनर्लेखन होना चाहिए की यह संविधान ही नही चाहिए ।
इससे भी बड़ी बात यह है कि यह संविधान नेपाली काँग्रेस, एमाले, माओवादी, राप्रपा लगायत छोटे छोटे दलो ने बनाया है । ऐसी अवस्था में इन्हीं दलो का किसी भी दल के आनन—फानन में आने का मतलव कभी कभार स्वार्थ में आ जाना । मधेशवादी दलों द्वारा कभी संविधान स्वीकार करना, कभी अस्वीकार जैसा क्रियाकलाप से मधेश में मात्र नही अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक पोलिसी में भी गलत संदेश जा रहा है ।

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