मधेश का दबदबा:-

पंकज दास

माओवादी के साथ सहकार करते हुए मधेशी मोर्चा के सरकार में शामिल होने और एक दर्जन से अधिक महत्वपर्ूण्ा मंत्रालय मिलने को भले ही कुछ लोग इसका विरोध करे, मधेशी दलों पर सत्तालोलुप्ता का आरोप लगाए, मंत्री बने बिना ना रह पाने जैसा कर्ुतर्क दे लेकिन सच्चाई से कोई भी विमुख नहीं हो सकता है। आखिर यह मधेशी मोर्चा की एकजुटता और राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रभाव भी है कि नेपाल के राजनीतिक इतिहास में पहली बार मधेशी मोर्चा को ही नहीं यदि आकलन किया जाए तो मधेशी समुदाय को सबसे अधिक सहभागिता दिया गया है। और यह सहभागिता माओवादी ने यूं ही खुश होकर नहीं दिया है बलि्क मधेशी मोर्चा सहित के मधेशवादी दलों ने उन्हें इतने सारे और इतने महत्वपर्ूण्ा मंत्रालय देने पर मजबूर किया है।
हमेशा सत्ता के लिए पार्टर्ीीें विभाजन लाने और मोर्चा में फूट लाने जैसी आरोपों को गलत साबित करते हुए मधेशवादी दलों ने इस बार यह साबित कर दिया कि तथाकथित लोकतांत्रिक मोर्चा के नाम पर वो किसी भी हालत में समझौता ना करने का भी फैसला कर सकते हैं। इस बार मधेशी मोर्चा ने आपसी एकता को बरकरार रखते हुए यह दिखा दिया कि उनकी फूट की वजह से बिना किसी नीति या सिद्धांत की पार्टर्ीीो सत्ता के नेतृत्व से दूर रखने की क्षमता भी है। मधेशवादी दलों के एक ही फैसले पर अडिग रहने की वजह से सत्ता के लिए लालायित दल सिर्फसत्ता के लिए अपना चाल चरित्र और चेहरा बदलने वाले तथाकथित वामपंथी दल को भी हैसियत में लाकर खडा कर दिया है।
मधेशी मोर्चा और मधेशवादी दलों ने माओवादी को र्समर्थन करते हुए बाबूराम भट्टर्राई को प्रधानमंत्री पद पर पहुंचाकर यह भी साबित कर दिया है कि कोई भी अदृष्य शक्ति,बाहरी ताकत या आकाशवाणी की परवाह किए बिना वो अपनी ही क्षमता पर बडा और साहसिक निर्ण्र्ााभी कर सकते हैं। क्योंकि अब तक मधेश विरोधी मानसिकता से ग्रसित दल,नेता कार्यकर्ता पत्रकार और उन्हीं से प्रभावित तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग एवं नागरिक समाज हमेशा से ही मधेशी ताकतों को दक्षिणमुखी,माओवादी विरोधी,कांग्रेस का पिछलग्गू जैसे शब्दों से अपमानित किया करते थे।
इस बार सिर्फसरकार में ही नहीं अब तो पूरे देश में ही मधेश का दबदबा दिख रहा है। जब कैबिनेट की बैठक होती है आधे से भी अधिक मधेशी चेहरों को मंत्रिपरिषद में देख कर शायद ही कोई ऐसा मधेशी होगा जिसे गर्व की अनुभूति ना होती होगी। लेकिन मधेश को ना चहने वाले देश में आए राजनीतिक परिवर्तन को स्वीकार ना करने वाले,मधेश विरोधी मीडिया, ये सभी इन बातों को पचा नहीं पा रहे हैं कि आखिर कैसे इतने सारे मधेशी चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह दे दी गई -आखिर किस तरह से इतने सारे महत्वपर्ूण्ा मंत्रालय मधेशी दलों को दे दिया गया – इन बातों से काठमाण्डू की गलियारों में हलचल मच गया है। मधेश और मधेशी को हमेशा ही दोयम दर्जे का नागरिक समझने वाले यहां के दलों उनके नेताओं सरकार के अधिकारियों, नागरिक समाज और विशेष कर यहां की राष्ट्रीय मीडिया। ये सभी मधेश विरोधी अभियान में जुट गए हैं। इन सभी के द्वारा मधेशी मोर्चा, मधेशवादी दल, मधेशी मंत्रियों के खिलाफ एक के बाद एक प्रहार किया जा रहा है।र्
वर्तमान सत्ता गठबन्धन के लिए मधेशी मोर्चा ने माओवादी के साथ चार सूत्रीय समझौता किया। इस समझौते में ऐसी कोई भी आपत्तिजनक बात नहीं है। और ना ही इस समझौते में कोई भी नई बात जोडी गई है। लेकिन फिर भी इस समझौते से मधेश विरोधी ताकतों के सर में दर्द होने लगा है और उनकी रातों की नींद हराम हो गई है। दरअसल इस समझौते के कारण नहीं बलि्क भट्टर्राई सरकार द्वारा इतने कम समय में किए गए अच्छे कामों से जनता में जो विश्वास का वातावरण जागा है और एक उम्मीद बढी है उससे घबराकर इस समझौते का विरोध किया जा रहा है। कल जिस दल और नेता ने सत्ता में पहुंचने के लिए और प्रधानमंत्री की कर्ुर्सर्ीीाने के लिए गुपचुप तरीके से राष्ट्रघाती समझौता किया था आज उसी दल के द्वारा खुलेआम रूप से किए गए समझौते का विरोध कर उसे राष्ट्रघाती बताने में जुटी है। माओवादी और मधेशी मोर्चा के बीच हुए चार सूत्रीय समझौते का विरोध करने वाले एमाले के अध्यक्ष झलनाथ खनाल को अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि इससे पहले उन्होंने क्या किया था।
आज कल इस समझौते के विरोध में माओवादी के भी कुछ नेता लगे हैं। अपना फायदा ना मिलने पर माओवादी के मोहन वैद्य पक्षधर नेता इसे सिक्कमीकरण का नया नाम दे रहे हैं। अब यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर यह समझौता जब हुआ तब क्यों नहीं उन्हें इस तरह की बातें सुझी। अब जाकर अपनी ही सरकार को असफल करने में माओवादी का एक गुट लग गया है। उधर कांग्रेस भी सत्ता में ना जा पाने का दर्द छुपा नहीं पा रही है और धीमे स्वर में ही सही पर इस समझौते का विरोध कर रही है। मधेशी मोर्चा को अपने पाँकेट का संगठन और मोर्चा मानने की गलतफहमी पाले कांग्रेस को इस बार लगे झटके से बहुत कुछ सीखना चाहिए और मधेशी के अस्तित्व को उस रूप में स्वीकार करना चाहिए जिस रूप में मधेशी दलों की ताकत उभर कर सामने आ रही है।
सरकार में इतने सारे मधेशी चेहरों को देख कर सबसे अधिक चोट यहां के ब्यूरोक्रैट्स को भी लगी है। मधेशी मंत्रियों का होना उन्हें इतना अटपटा लग रहा है कि उसके खिलाफ अपनी मर्यादा की सीमा लांघते हुए बयानबाजी पर उतर आए हैं। उदाहरण के तौर पर गृह मंत्रालय के सचिव का ही तबादला ले लिया जाए। तत्कालीन गृह सचिव लीलामणि पौडेल को यह गलतफहमी हो गई थी कि वो मंत्री से ऊपर हैं और जिस तरह से चाहेंगे उस तरह से मंत्रालय चलाएंगे। जिनके मातहत उन्हें रहना चाहिए वो अपने आप को उससे भी सुपर समझने लगे थे। उनका र्फज बनता है कि गृह सचिव होने की हैसियत से वो गृहमंत्री को रिपोर्ट करे। लेकिन अपने आप को सुपर मंत्री समझने वाले पौडेल गृह मंत्री रहे उपप्रधानमंत्री को नजरअंदाज कर सीधे प्रधानमंत्री से बात करते थे। अब अपनी मर्यादा नहीं समझने वाले और सीमा से बाहर जाने वाले अधिकारियों को तो ठिकाना लगाना ही था। इसलिए पौडेल को गृह सचिव पद से हटा दिया गया। इस बात से गुस्साए पौडेल ने मीडिया का सहारा लेते हुए गृह मंत्री विजय कुमार गच्छेदार के खिलाफ अनाप सनाप आरोपों सहित लेख और समाचार प्रकाशित कराने लगे। नेपाल की मधेश विरोधी मीडिया को भी बैठे बिठाए ऐसा मुद्दा मिल गया जिसका उन्हें इंतजार था। अब उस दिन से लेकर यहां की राष्ट्रीय मीडिया गच्छेदार के पीछे हाथ धोकर पड गयी।
दूसरा उदाहरण हैं सूचना तथा संचार मंत्री बने जयप्रकाश गुप्ता का। जिस मुद्दे पर विशेष अदालत ने  उन्हें बाँइज्जत बरी कर दिया है। उसी गडे मर्ुदे को उखाडने में मीडिया जुड गई है। यह बात उन्हें अच्छी तरह मालुम है कि हाथ उन्हें कुछ भी नहीं लगने वाला है। फिर भी एक सूर से यहां की स्वनामधन्य मीडिया वाले गुप्ता को बे वजह परेशान करने में लग गए हैं।  उधर सरकार के ही मातहत रहे अख्तियार दुरूपयोग अनुसंधान आयोग के सचिव भी इधर कुछ दिनों से अपने आपको सुपर बाँस समझने लगे हैं। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चलाने वाले एक संस्था के प्रतिनिधियों को यह कहा कि जेपी गुप्ता को संवैधानिक परिषद में सदस्य नहीं बनाना चाहिए। अब यह तो सीधे सीधे प्रधानमंत्री को चुनौती देना हुआ। क्योंकि संवैधानिक समिति के सदस्य में गुप्ता की नियुक्ति प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार है। यानि कि अख्तियार के सचिव भगवती काफ्ले खुद को डाँ बाबूराम भट्टर्राई से भी अधिक स्वच्छ मानते हैं। जब कोई व्यक्ति जो कि सीधे जनता से चुनकर आता है। एक पार्टर्ीीा राष्ट्रीय अध्यक्ष है, कैबिनेट के मंत्री है कई संवैधानिक और संसदीय स्मैति का सदस्य है वह आखिर संवैधानिक परिषद का सदस्य क्यों नहीं बन सकता है – और प्रधानमंत्री के इस फैसले पर उंगली उठाने वाला अख्तियार के सचिव की हैसियत ही क्या है। आपको यहां यह बताना जरूरी है कि यह वही भगवती काफ्ले है जिस पर  ५ करोड रूपये लेकर सुडान घोटाला के मुख्य आरोपी बनाए गए नेपाल पुलिस के तत्कालीन प्रमुख को केस से बाहर निकालने का आरोप लग चुका है।
यहां की मीडिया के कोपभाजन का शिकार कुछ और मधेशी मंत्री भी हुए हैं। राजेन्द्र महतो जो कि स्वास्थ्य मंत्री बने हैं उनके द्वारा किए गए कई अच्छे काम करने के बावजूद मीडिया उसमें कुछ ना कुछ नुस्ख निकाल रही है। इसी तरह भौतिक योजना निर्माण मंत्री हृदयेश त्रिपाठी द्वारा सरकारी गाडी प्रयोग ना करने की बात के पीछे भी मीडिया वालों ने कुछ अनर्गल बातें लिखी थी। माओवादी के तरफ से मंत्रिपरिषद में एक मात्र मधेशी चेहरा रहे प्रभु साह को भी मीडिया नहीं छोड रही। जब उनके बारे में कुछ भी गलतियां नहीं मिली तो कुछ राष्ट्रीय अखबार में उनके निजी सचिव का नाम उछालकर जोडा जाने लगा।
ऐसा नहीं है कि यहां के अखबार और टीवी चैनल अपने आप मधेश विरोधी बातें प्रचारित या प्रसारित नहीं कर रही है। बलि्क उनके पीछे एक बहुत बडी ताकत है जो कि वर्तमान सरकार को असफल कर मधेशी दलों को सत्ता से बाहर होते देखना चाहती है। सभी मंत्रालयों में रहे सरकार के उच्च अधिकारियों से लेकर सुरक्षा के उच्च अधिकारियों और सेना सहित सभी क्षेत्रों में एक ऐसा बडा तबका है जो कि सुनियोजित तरीके से इस काम को अंजाम दे रहा है। माओवादी और मधेशी मोर्चा के बीच हुए समझौते के दो मुद्दों पर मधेश विरोधियों को सबसे बडी आपत्ति है। पहला तो मधेशी समुदाय के १० हजार लोगों को नेपाल की राष्ट्रीय सेना में समावेश कर सेना को और अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाते हुए उसे वास्तव में राष्ट्रीय स्वरुप देना। और दूसरा मधेश आन्दोलन से लेकर अधिकार और पहचान के लिए हुए सभी आन्दोलनों के दौरान राजनीतिक कारणों से पकडे गए आन्दोलनकारियों के खिलाफ रहे मुद्दे को खारिज करते हुए उन्हें रिहा करना। मधेश और मधेशी जनता को अधिकार संपंन्न तथा आगे बढते देखने में जिन लोगों को कष्ट का अनुभव हो रहा है उन्हें यह समझौता राष्ट्रघाती लग रहा है। सेना को सिर्फपहाडी खस बाहुन और क्षेत्री की जागीर समझने वाले लोग मधेशी को कभी भी समान अधिकार नहीं देना चाहते हैं। ऐसा ही एक बडा वर्ग है जो कि इस समझौते का विरोध कर रहा है।
इसी तरह आन्दोलनकारियों पर लगाए गए झुठे मुद्दे को खारिज कर उन्हें रिहा किए जाने संबंधी समझौते का यहां की तथाकथित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से लेकर अन्य मानवाधिकारवादी संस्था और नागरिक समाज भी इसका कडा प्रतिवाद कर रही है। इन संगठनों को ऐसा लग रहा है कि आन्दोलन के दौरान जेल में बन्द किए गए सभी मधेशी जनजाति आदिवासी थारू अल्पसंख्यक सभी के सभी अपराधी प्रवृति के ही है। इसी बात से अंदाजा लगाया जा स्कता है कि इस देश में अब तक शासन कर रही और शासन की आड में अपना दबदबा रखने वाला एक बडा वर्ग मधेश और मधेशी के विरोधी मानसिकता से ग्रसित हैं। क्योंकि मधेशी का आगे आना, उन्हें समान अधिकार मिलना, इस देश की शासन व्यवस्था में उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी मिलना ऐसे किसी भी बात से उन्हें सुख नहीं मिल रहा है। लेकिन चाहे ये लाख विरोध करे सच्चाई को तो मानना ही पडेगा। और आज की सबसे बडी सच्चाई यह है कि अब इस देश की राष्ट

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