मधेश का धधकता खेत खलिहान : बाबुराम पौड्याल

असल में कौन सा दल सिंहदरवार में है और कौन से दल के आन्दोलन में कितना बड़ा जमावड़ा था, इसका लेखाजोखा करने की बजाय हमारी शासन प्रणाली और हमारे आचरण एक दूसरे के लिए कैसे स्वीकार्य हो, इसपर चिन्ता करना मधेश ही नहीं हिमाल और पहाड़ की भी आवश्यकता है । अन्यथा मधेश का खेतखलिहान ही नही पहाड़ और हिमाल भी धधकता नजर आयेगा ।madhesh-andolan-22feb016

बाबुराम पौड्याल
गणतन्त्र स्थापना के बाद, मधेश में पहले आन्दोलन के दस साल गुजर चुके हैं । इसके बाद वहां दो और आन्दोलन भी हो चुके हैं और दशक भर बाद आज भी आन्दोलन की ही बातें चल रही है । अपने अधिकारों के लिए मशाल लेकर निकले मधेश के लोगों ने जंग को कितना जीता और जीतना बाकी है, अभी भी साफ नहीं है । इसलिए कि, शायद, वहां अब भी विश्वास का भारी संकट टला नहीं है । काठमाण्डौ की सत्ता गलियारे में आबाद हर किसी सरकारी वर्ग भी स्वयं को मधेश के खेत खलिहान और झोपडी की पीड़ा में हमदर्द होने का दावा करता आ रहा है । वहां के लोगों को अभी भी लगता है कि इन दावों में कोई दम नहीं है ।

ऐसी बात नहीं है कि आज जो नेतागण सड़क में मधेश के नाम पर संघर्ष कर रहे है, विगत में सिंहदरवार की कुर्सियों पर नही बैठे हों । परन्तु वे इस आरोप से मुक्त नहीं हो सके कि उन्होंने भी तब मधेश के लिए कुछ नहीं किया । ताज्जुब है, सिंहदरबार और मधेश की दरमियान क्या कैफियत है कि वहां पहुंचने पर उसके अपने भी पराए हो जाते हैं ।
सिंहदरबार अपनी बाध्यता बताकर स्थानीय चुनाव तय कर चुका है तो मधेश के राजनीतिक दल उसके खिलाफ आन्दोलन की बात कर रहे हैं । वर्तमान प्रधानमंत्री प्रचण्ड की सरकार को सत्तासीन होने में मोरचा का महत्वपूर्ण समर्थन था । मधेशी मोरचे ने सड़क के बीच से आकर यह समर्थन दिया था । यह इसलिए भी संभव हो सका कि मधेश के प्रति अनुदार बताए जानेवाला पूर्ववर्ती केपी ओली सरकार को सत्ताच्यूत करना उसकी रणनीति थी । यह समर्थन के लिए मोरचा की माँगों को पूरा करने के लिए चुनावों के पहले संविधान संशोधन करने की शर्त थी । वैसे प्रमुख प्रतिपक्षी दल नेकपा एमाले के विरोध के बावजूद भी सरकार संसद में संशोधन प्रस्ताव पेश कर चुकी है । परन्तु अब आकर सरकार पहले स्थानीय चुनाव फिर संशोधन की बात करने लगी है और चुनाव की तारीख भी तय हो गई है ।

समुन्नत नेपाल के लुभावने सपने राजनीतिक दलों के जरिए गरीब नेपाली जनता ने गणतन्त्र आने तक खूब सपना देखा । आजकल सपने दिखाने के तरीके में जरूर फर्क आया है ।

मोरचा ऐसे चुनावों का सख्त खिलाफ कर रहा है । दोनों के बीच बातें बनती नजर नही आ रही है । कयास लगाया जा रहा है कि मोरचा, सरकार को दिये गये अपने समर्थन को वापस ले सकता है । परन्तु इस सत्ता समीकरण के बदल जाने से मोरचे के प्रति अनुदार समीकरण के सत्ता में आने की संभावना को देखते हुये वह ऐसा नही भी कर सकता है । जो भी हो इसतरह एक ओर सरकारी आश्वासन का अन्तहीन सिलसिला चले और दूसरी ओर आन्दोलन ही स्थाई होने लगे तो समझ लेना चाहिए, परदे के आगे पीछे जरूर कुछ फर्क चल रहा है । ऐसी संस्कृति से किसी भी नेपाली को फायदा नहीं, सिर्फ अस्थिरता और अराजकता को ही बल मिलेगा ।
समुन्नत नेपाल के लुभावने सपने राजनीतिक दलों के जरिए गरीब नेपाली जनता ने गणतन्त्र आने तक खूब सपना देखा । आजकल सपने दिखाने के तरीके में जरूर फर्क आया है । अब सपने नेपाल के नाम से कहीं अधिक मधेश, पहाड, हिमाल और जाति, भाषा, लिंग, समूह, राष्ट्रवाद और घात के नाम पर किस्तों में दिखाये जाने लगे है । इन सपनों के लिए आन्दोलन करने के अलावा जनता के पास विकल्प शेष ही नहीं रहा । क्योंकि नेपाल में आन्दोलन के अलावा दूसरे रास्ते को अपनाने की संस्कृति का विकास राजनीतिक दलों में अबतक नहीं हुआ । एक समय ऐसा तक आया कि सरकार, आन्दोलन के दबाव के कारण मागों की औचित्यता को समझे बगैर ही कई दबाव समूह के साथ एक दूसरे के प्रतिकूल सम्झौते किये । जिस पर अमल होना असम्भव था । तत्कालीन सरकारों की अदूरदर्शिता और अराजकता से भयभीत मानसिकता का पता, इसी बात से चलता है ।
बीते दस सालों में मधेश में आन्दोलन के नाम पर एक पीढ़ी का महत्वपूर्ण समय बर्बाद हो गया, कईयों ने जाने गँवाई । इतनी जानें तो निरंकुश कहे जानेवाले पंचायत और उससे पहले की राणाशासन में भी शायद ही गई । निरंकुशता और लोकतन्त्र की भिन्नता को कैसे परिभाषित किया जाये, बड़ी समस्या है । किसी भी इन्सान की जान की कीमत को इतना सस्ता नही माना जा सकता है । आन्दोलन और राजनीति की भाषा में लोगों की इसतरह की मौत को भले ही शहादत और महान त्याग कहा जाता है परन्तु जब इसका असर व्यक्ति और उसके परिवार में अनुवाद होता है, उसका दर्द और दुष्प्रभाव भयानक होता है । अब लोगों को आन्दोलन के नाम पर मृत्यु नहीं सम्मानित जीवन चाहिए । असंतोष के कोहरे में क्या अब भी मधेश में शहीदों की खेती चलती रहेगी या फिर अब लोगों को अपने हक को पाने के लिए लड़ना और उसके लिए जीने की सीख भी मिलेगी, अभी भी कहना मुश्किल है । इस दुविधा के लिए काठमाण्डौ के सत्तासीन वर्ग की जितनी भी आलोचना की जाय कम है । वहीं मधेश में सपने बाँटने और सत्तावृत्त पर अपना स्थान सुरक्षित रखने के लिए लोगो को उत्तेजित करनेवाला राजनीतिक कुलीन नेतृत्व भी हिस्सेदार है । जो समाधान के बदले इकतरफा आन्दोलन की बात करते हुये अपनी रोटी सेकने में माहिर है ।

मधेश का रणनीतिक महत्व

समतल उर्बर भूमि, दक्षिण में भारत जैसे विशाल पड़ोसी देश की सीमा से लगनेवाला नेपाली भूखण्ड और भारत के साथ नेपाल की पारम्परिक रूप से चली आ रही भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक सम्बन्धों के कारण तराई मधेश का महत्व नेपाल के लिए कम नहीं है । नेपाल की कुल आबादी का आधा हिस्सा इसी तराइ मधेश में आबाद है जो नेपाल के कुल में से सत्रह फीसद भूखण्ड है ।
नेपाल में गणतन्त्र की स्थापना के बाद मधेश नेपाली राजनीति के केन्द्र में लगातार बना रहा है । गौर हत्याकांण्ड से लेकर टीकापुर हत्याकाण्ड और मधेश आन्दोलन के दौरान हुई कत्लेआम की घटनाएं दिल दहला देनेवाली है । इसके अलावा मधेश के अधिकारों के नाम खुले छोटेमोटे सशस्त्र गुटों ने भी फिरौती और हत्या की कई वारदातें की ।ं सीमा में तस्करी और अपराध करनेवाले तत्वों का भी मधेश क्रीडास्थल के रूप में प्रयोग हो रहा है । इसका यही मतलब है कि परिवर्तन के बाद तराई मधेश का रणनीतिक महत्व और अधिक बढ़ गया है । मधेश में इन दिनों अलगाववाद की चिन्गारियां भी उठ रही है और इसे दिखाकर अपनी वारगेनिङ की ताकत को प्रभावी बनाने का खेल भी मधेश में साथ–साथ चल रहा है । इस तरह मधेश में सकारात्मक और नकारात्मक स्वार्थ मधेश में सक्रिय हैं । इससे वहां विकास, शान्ति सुरक्षा और समाजिक सद्भाव दाव पर लगे हैं । स्वार्थ के इस महाद्वन्द का बुरा असर वहां के आम लोगों को झेलना पड़ रहा है ।
वैसे मधेश के अधिकारों के लिए आन्दोलनरत मूलधार के क्षेत्रीय दलों का गठबन्धन संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोरचा खुद को तराई मधेश का इकलौता प्रतिनिधि होने का दावा करता है । आश्चर्य की बात यह है कि दूसरे संविधानसभा चुनाव में मधेश की जनता ने मोरचे के घटक दलों को अपेक्षाकृत वोट नहीं दिया । इस चुनाव में मधेश में नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले की स्थिति मजबूत हो गई । उसके बाद की लगभग सभी महत्वपूर्ण प्रकृयाओं में मोरचा असहमत होती आई है । संविधानसभा में उसकी गणितीय कमजोरी और उसके सहयात्री अन्य ताकतों की कमजोर उपस्थिति के कारण असन्तोष रहना उसके लिए एक बाध्यता बन गई है । संविधानसभा में कमजोर होने के बावजूद मधेश के आन्दोलनों में मोरचे के पीछे लोगों की उल्लेखनीय सहभागिता देखने को मिलती है । कई लोग मानते हैं कि संवैधानिक तथा लोकतान्त्रिक रास्ते से मिलनेवाली सुनिश्चित असफलता की अपेक्षा मधेश के आम लोगों में पनप रहे असन्तोष को आन्दोलन के जरिये उपयोग करते हुये अपनी साख को फिर से दुरुस्त करने की रणनीति मधेशी मोरचे की है । इसका मतलव यह भी कैसे माना जाये कि चुनाव में तराई मधेश में अधिक सीटों पर विजय पानेवाले नेपाली कांग्रेस, एमाले और एमाओवादी का वर्चस्व बिल्कुल खत्म हो चुका है ।
वैसे नेपाल में अवतक जो कुछ भी परिवर्तन के नाम पर हो चुका है उसका प्रभाव समाज के निचले तबके तक कभी नहीं पहुंच पाया । इसकी उपलब्धियां केवल राजनीति वृत्त में ही सीमित रही । कहा जाता है कि राजनीति का विकास होना देश की तरक्की के लिए पहली शर्त है लेकिन नेपाल के सन्दर्भ में अभी तक ऐसा देखा नहीं जाता । बात पहाड़ और मधेश कहीं की भी हो आम लोगों की फिक्र काफी पीछे छूट जाती है । असल में कौन सा दल सिंहदरवार में है और कौन से दल के आन्दोलन में कितना बड़ा जमावड़ा था, इसका लेखाजोखा करने की बजाय हमारी शासन प्रणाली और हमारे आचरण एक दूसरे के लिए कैसे स्वीकार्य हो, इसपर चिन्ता करना मधेश ही नहीं हिमाल और पहाड़ की भी आवश्यकता है । अन्यथा मधेश का खेतखलिहान ही नही पहाड़ और हिमाल भी धधकता नजर आयेगा ।

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