मधेश की आवाज भी सुनिए:

श्रीमन नारायण

शान्ति एवं संविधान देश में र्सवाधिक चर्चाका विषय बना हुआ है । संविधान तो समय पर बन नहीं सका एक वर्षका समय बढानेके वावजूद संविधान नहीं बना, फिर एक वर्षबढाए जाने की उमीद है । कहा जाता है कि शान्ति प्रक्रिया अन्तिम चरण में हैं परन्तु माअवादीके गुरिलोको सुरक्षा निकायों में स्थान दे देने से हीं शान्ति प्रक्रिया मुकाम तक पहुँच जाएगी – शायद नहीं । मधेश में संर्घष्रत सशस्त्र समूह के समस्या को भी सुनना होगा । समाधान करना होगा । पर्र्वी पहाड में हथियार लेकर संर्घष्ा में उतरे जातीय संगठनो की भी उपेक्षा नहीं कर सकते । एक खास राजनीतिक संगठन एवं उसके नेता एवं कार्यकर्ताको खुश कर देने से ही सभी समस्याका समाधान नहीं हो सकता है ।
पिछले पा“च साल से माओवादियों को खुश करने के लिए उसके तमाम हरकतों को नजर अन्दाज किया गया है । मधेशवादी एवं गैर मधेशवादी सभी का एक हीं दृष्टिकोण है कि अकेले माओवादी को खुश कर देने से व्रि्रोह एवं अशान्ति के तमाम स्वर स्वतः बन्द हो जाऐगे, जो पर्ूण्ातः गलत है ।
मधेश की समस्याको लेकर एक दर्जन से अधिक राजनीतिक संगठन संसदवादी राजनीति का मार्ग अपनाए हुए हैं वहीं सशस्त्र समूहोंका यकीन कर पाना मुश्किल है । सन् २००६ और सन् २००७ के फरवरी मार्च में प्रभावकारी मधेश आन्दोलन हुए परन्तु समस्या ज्यों के त्यों है कुछ लोगो के मन्त्री बन जाने से तथा उनके बच्चे एवं रिश्तेदारों के जीवनस्तर में बदलाव आ जाने भर से मधेश समस्या का समाधान नहीं हो जाता हैं । व्यक्ति मर जाते हैं, पथभ्रष्ट हो जाते है मार्ग से विचलित हो सकते हैं परन्तु विचार नहीं । मधेशवाद एक विचार है इसका अन्त नहीं हो सकता है । रामजनम तिवारी,गजेन्द्र नारायण सिंह एवं रामचन्द्र मिश्र के निधन के वाद भी एक दर्जन संगठन सक्रिय है ।
मधेश का मुद्दा पहले से कहीं अधिक प्रखर हुआ है बामपन्थी पृष्ठभूमि के जयकृष्ण गोईत ने माओवादी से व्रि्रोह करके जनतान्त्रिक तर्राई मुक्ति मोर्चाका गठन किया । पहाड में कार्यरत मधेशी शिक्षक एवं कर्मचारियो को यातना देने, प्रताडित करने एवं जबरन चन्दा असूली करने के कारण माओवादी पार्टर्ीीे अलविदा कह नया संगठन बनाया । जब भी कोई मधेशी किसी गैर मधेशीवादी संगठन में अपना अधिकार जताना चाहते हैं उन्हें भारत र्समर्थक भारतमुखी या भारतका एजेण्ट कहके किनारा कर दिया जाता है । दरअसल गैर मधेशवादी दलके नेता के पास यह एक ऐसा अचूक हथियार है जिसका निशाना कभी खाली नहीं जाता । वषोर्ं वफादारी दिखाने एवं भारत को गाली देने के वावजूद आजतक न किसी मधेशी को राष्ट्रवादी होनेका प्रमाणपत्र मिला है न मिलने वाला है ।
नेपालके पर्ूव आला खुफिया अधिकारी और हाल में तमलोपा के नेता हरिबाबु चौधरी, जो स्वयं थारु ज्ााति के हैं और अन्य मधेशियों की तुलना में भारत में भारत से उनलोगोंका लगाव कम ही होता है फिर भी उन पर शक किया गया । एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होने कहा कि जव वे शर्ीष्ा आला अधिकारी थे और दिल्ली जाने की बात आई तो कभी भी वे अकेले में किसी से नहीं मिले । वावजूद वे जब तक पद पर रहे उन पर शक होता ही रहा । ये अलग वात है फिर भी वे .निष्कलंक निकले ।
गोइत के साथ भी शक किया गया और उन्होंने पार्टर्ीीोडा । मघेश में खुला पहला एवं प्रभावकारी सशस्त्र संगठन उनका ही है परन्तु अपने संगठनको वे एकजूट नहीं रख सके फिर उसी नाम से वा नये नये संगठन खुलने की बाढ सी आगई । सिर्फकोष्ठ में अलग अलग नाम हौते है । पुराने एवं अनुभवी होने के नाते अभिवावकवाली छविका निर्ीवाह वो न कर सके । मधेश में जातिवाद का जहर भी फैला हुवा है और जातिवाद के कारण भी मधेशवादी संगठन विखरते जारहे हैं । जिन्हे किसी पार्टर्ीीा जिल्ला अध्यक्ष के रुप में काम करनेका अनुभव नहीं है वे भी रातोंरात अध्यक्ष बनना चाहते हैं । अध्यक्षका पद मिलते ही दौलत, शोहरत एवं ऐश-ओ-आराम मिलना सहज हो जाता है यह अवसरवादी सोच हर किसीको बरवाद कर रहा है । बमुश्किल मोरङ से लेकर बा“के वर्दिया तक मधेशियों की आवादी है । इस में भी बहुत सारे राजनीतिक संगठन है फिर सशस्त्र संर्घष्ा में सहभागी होना आसान काम भी नहीं है । मधेश में सक्रिय सशस्त्र समूहको भी अपने अब तक के कार्यो पर समीक्षा करना चाहिए । महान क्रान्तिकारी सुवास चन्द्र वोस के अनुसार एक सच्चे क्रान्तिकारीका लक्ष्य हमेशा ही सर्वोच्च उपलब्धि हासिल करनेका होना चहिए परन्तु आन्दोलन के पक्ष में अगर छोटी-छोटी उपलब्धियाँ हासिल हो रही है तो उसे भी ग्रहण कर लेना चाहिए । एक सच्चा क्रान्तिकारी न कभी हारता है और न कभी थकता है मधेश के नाम पर अब तक एक सौं से अधिक संगठन खुले हैं परन्तु अस्तित्व में कुछ ही रह गए है । जनता की सहानभूति ये खोते जा रहे है चन्दा जो कि स्वेच्छिक होता है जब जबरन असूली का रुप ले लेता है तब संगठन को जनता का र्समर्थन एवं सहानभूति प्राप्त नहीं होता, लोग उस दलके नाम के डर से डरने लगते हैं । ये परिस्थिति उस संगठनके असामयिक अन्त का संकेत होता है । मधेश कल्याण के नाम पर खुले सशस्त्र संगठन अपनी विश्वसनीयता एवं जनाधर खोते जा रहा है । उन्हें जनता के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध बनाना चाहिए । मधेश के सशस्त्र संगठन को शान्तिपर्ूण्ा राजनीतिक में आना चाहिए । अब तक सक्रिय संसदवादी मधेशी दल सत्ताके लोभ से बडे दलो के गुलाम बनकर रह गए है । इनकी सारी ताकत मलाइदार मन्त्रालय पाने में ही खर्च होती आई है । पिछले तीन वर्षमें नव मधेशवादी दल के जिन में शिक्ष्।ा,कृषि, युवा खेलकूद एवं सांस्कृतिक जैसे मन्त्रालय भी आए परन्तु मधेश केलिए कुछ भी नहीं हुवा । संसदवादी दल सत्ताके राजवादी बदनाम हो चुके हैं । पानी के बतासे के तरह बडी तेजी से चर्चा में आए फोरम इन दिनो भाग्यनाथ गुप्ता का मधेशी जनअधिकार फोरम मधेश, अमर यादव का तर्राई फोरम, विजय कुमार गछ्चेदार का फोरम मधेस लोकतान्त्रिक, संजय साह का मधेस क्रान्ति एवं जयप्रकाश गुप्ता का नया संगठन करके आधा दर्जन संगठन बन्ा चुका है । तमलोपा भी विभाजित है । नेपाल सदभावना पार्टर्ीीे विवाद में निर्वाचन आयोग की संन्दिग्ध भूमिका भी एक कारण है । नेपाल सदभावना पार्टर्ीीे प्रथम अध्यक्ष रामचन्द्र मिश्र कहा करते थे कि जब किसी राजनीतिक संगठन में अनुशासन का अर्थ चापलूसी होता है तो वह संगठन एक व्यक्ति का निजी सम्पति बन जाता है और र्पैसा महत्वपर्ूण्ा हो जाने पर पार्टर्ीीध्यक्ष धन्ना सेठ बन जाते हैं । इनदिनों मधेशवादी संगठन में पार्टर्ीीध्यक्ष धन्ना सेठ और पार्टर्ीीनुशासन का अर्थ चापलूसी हो गया है । जाहिर है राजनीतिक संगठन पार्टर्ीी रहकर गिरोह बन गया है । एक कमजोरी यह भी है कि बडे दलों में वर्षों रहकर अनुशासित जीवन विताने वाले मधेसी एवं मधेशवादी दल में आते हैं तो रातोंरात अध्यक्ष बननेका ख्वाव देखने लगते हैं । मधेशवादी दल जो संसदवादी राजनीति कर रहे हैं । कभी भी संविधान सभा में मधेश में संर्घष्ारत सशस्त्र संगठनों के बारे में एक शब्द भी खर्च नहीं किया । काठमाडौं के नजरीए में मधेशके आन्दोलनको दो तरह से परिभाषीत किया जाता रहा है । शान्तिपर्ूवक राजनीति करने वाले संगठनों को विघटनवादी और सश्ास्त्र संगठनों को पृथकतावादी एवं आतंकवादीके रुप में । संविधान सभा में रहकर भी जव ये दल खुद नहीं बोलेगें तथा गैर मधेशवादी दल इसकी आवश्यकता ही महशूश नहीं करते । आत्मर्समर्पण के बाद भी हिरासत में लिए गए कौटिल्य शर्मा चाहकर भी हिन्दी भाषा में अपना बयान दर्ज नहीं कर पाए । संविधान निर्माण को लेकर मधेशवादी दल कभी गम्भीर नहीं हुए । कुछ संगठन एमाले और कांग्रेसको सफल होते देखना चाहते हैं तो कुछ माओवादी को । शान्तिपर्ूण्ा राजनीति करनेवाले मधेशवादी संगठनों की संख्या एक दर्जन से उपर है । उन में से तीनने मिलकर संयुक्त मधेशी मोर्चा बनाया है शेष नौ अलग-अलग है । मोर्चाका विस्तार हो भी नहीं सकता । विजय कुमार गच्छेदार अन्य फोरमको महत्व नहीं देगें । तमलोपा,तमलोपा नेपालको नहीं और सद्भावना पार्टर्ीीुरानी सद्भावनाको सरकारको चाहिए कि मधेश में संर्घष्ारत सशस्त्रको भी शान्तिपर्ूण्ा राजनीति में आने का अवसर प्रदान करती । संर्घष्ाविरामका ऐलान करके उनको माफी देकर अथवा अन्य जो भी मार्ग हो सकता है उसे अपनाया जाता । मधेशके सश्ास्त्र समूहों का विश्वास लिए बिना संविधान निर्माण मुमकिन नहीं लगता ना ही देश में दर्ीघकालीन शान्ति हीं बहाली हो सकेगी । माओंवादी की गुरिल्लो को सेना में लेने से पर्ूव पर्ूर्वी पहाड एवं मधेश में सक्रिय संगठनों की समस्या को भी सुनना चाहिए ।

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