मधेश की धरती अब एमाले और काँग्रेस को अंकुरित नहीं होने देगी : मुरलीमनोहर तिवारी

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मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), वीरगंज, २२ दिसिम्बर | स्थानीय चुनाव की बात जोर-शोर से हो रही है। इसके पक्ष में तर्क आ रहा है, की संविधान कार्यान्वयन के लिए स्थानीय चुनाव जरुरी है। पिछले अठारह वर्ष से स्थानीय नेतृत्व नही होने के कारण स्थानीय बिकास ठप्प पड़ा है। अगर सहमती नही हो पाए तो पुराने संरचना अनुसार ही चुनाव करा लिया जाएं। ऐसा नही करना राष्ट्रघाती होगा, देश पर बिखण्डन का खतरा है, इसका विरोध करने वाले देशद्रोही है और भारत के इशारा पर ये सब बिरोध कर रहे है, जबकि मोर्चा का तर्क है कि संविधान संशोधन हुए बग़ैर कोई भी चुनाव संभव नही है, अगर जबर्दस्ती चुनाव का प्रयास हुआ तो देश द्वन्द में चला जाएगा, परिस्थिति और भयावह होने की आशंका है। दोनों तर्क सुनने के बाद ये बिचार करना आवश्यक है कि नियमतः क्या होना चाहिए और मधेश के हक़-हित में क्या करना चाहिए।

नियमतः संविधान में संघीयता आने के बाद सबसे पहले प्रांतीय सीमांकन और विधायकी क्षेत्र का निर्धारण होना चाहिए, फिर बिधायक के चुनाव से प्रांतीय सरकार का गठन होना चाहिए, तब जाकर प्रांतीय सरकार द्वारा स्थानीय सीमांकन और स्थानीय निर्वाचन होना चाहिए। यही संविधान कार्यान्वयन की सही प्रक्रिया है, लेकिन भ्रम फैलाकर समाज में गलतफहमी और ज़हर घोल कर अपना उल्लू सीधा किया जा रहा है। जब पिछले अठारह साल से स्थानीय चुनाव नही हुआ तो कुछ दिन और नही होने से कौन सा भूचाल आ जाएगा ?

स्थानीय चुनाव के सम्बन्ध में गौर करे तो इसमें स्थानीय नेतृत्व स्थापित होते है, उस पर भी दलगत आधार के चुनाव में घर-घर में, दल अपनी पैठ बनाता है, एक दूसरे के बिरोधी भाई भी अलग-अलग दल चुनकर भाई से बदला लेते है, इस आपसी झगड़े का लाभ उठाकर दल अपनी पहुच, जनता के प्राथमिक तह तक में पहुँचाकर संगठन निर्माण कर लेते है। कोई सामान्य सा विवाद तुरन्त राजनैतिक रंग ले लेता है, दलगत सोच इस प्रकार हावी हो जाता है, की गुण और दोष का फ़र्क मिट जाता है। अपने दल के ब्यक्ति का हरेक कार्य ठीक और दूसरे का ग़लत लगता है।  गांव- गांव में झगड़ा तनाव फिर थाना- पुलिस- सी डी ओ- कोर्ट- कचहरी के चक्कर में बुनियादी और मूल समस्या के तरफ किसी का ध्यान ही नही जाता। पूर्व के स्थानीय चुनाव और उसके बाद से हरेक गांव कांग्रेस और एमाले के दो धुर्व में बटा था। घर-घर में खुनी जंग की याद आज भी रोंगटे खड़े कर देती है।

मधेश बिद्रोह और उसके बाद के दिनों में पहाड़ी दल की पकड़, मधेश के गांव में कमज़ोर पड़ती गई। इसी कारण ये सबसे पहले दलगत तरीक़े के स्थानीय चुनाव कराकर पकड़ मजबूत करना चाहते है। अगर नए संरचना अनुसार चुनाव हुए तो क्षेत्र नया, उम्मीदवार नए होने से मधेशी दल को कुछ सहूलियत मिल सकती है, परंतु पुराने संरचना में पुराने दल के जो अवशेष मधेश में बचे हुए है, उसका उन्हें लाभ मिलेगा, जो मधेश हित में नही होगा।

मधेश के मांग अनुसार संविधान संशोधन और स्थानीय चुनाव के शर्त के साथ प्रचण्ड की सरकार बनी, इसी के साथ मोर्चा अपनी सहमती और समर्थन देकर चक्रव्यूह में फ़स गया। संशोधन और स्थानीय चुनाव दोनों एक दूसरे के पूरक है। संशोधन से मधेश की मांग पूरी तो नही हो रही है, इतना जरूर है कि आंदोलन को एक संतावनापूर्ण निष्कर्ष मिलेगा। जबकि प्रांतीय सरकार के गठन बग़ैर स्थानीय चुनाव होने देना, प्रान्त को अधिकारविहीन करना होगा। गौरतलब है कि आज भी पचास लाख से अधिक मधेशी मतदाता नियमावली से बाहर है, चुनाव से पहले उनके मतदान के अधिकार की सुनिश्चिता पहली अनिवार्य शर्त होनी चाहिए।

संविधान बनाते समय एक हुए कांग्रेस-एमाले-माओवादी को मधेश के आंदोलन की कोई फ़िक्र नही हुई, बारी-बारी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री बदलकर गोलियां चलवाते रहे, मधेशी की लाशें गिराते रहे। क्या कारण है कि जो प्रस्ताव ओली ने किया वही आज संशोधन के रूप में आया है ? मधेश आंदोलन के बाद पहाड़ी दलों को लगा की मधेश उनके हाथ से निकल गया है, अगर मधेश बिरोधी ही रहा तो खसतंत्र टूट जाएगा, इसलिए पहाड़ को एमाले के जिम्मे  देकर कांग्रेस और माओवादी मधेश बटोरने के लिए आए है। ये संशोधन का नाटक डैमेज कंट्रोल के लिए हो रहा है। जिसमे अंत में कुछ सुधार और स्थानीय चुनाव की प्रतिबद्धता होने के बाद, एमाले भी बिरोध का चोला उतार साथ देगा, साथ ही सांत्वना बटोरेगा और बारी-बारी से मधेश को ग़ुलाम कर नोंचते रहेंगे, लेकिन एक बात तय है कि ये कोई भी छलावा कर लें, मधेश की धरती इन्हें अंकुरित होने नही देगी।

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1 Comment on "मधेश की धरती अब एमाले और काँग्रेस को अंकुरित नहीं होने देगी : मुरलीमनोहर तिवारी"

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Sam
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Mr. Tiwari, UML will still become 2nd or 3rd party in Tarai in the coming election. In hilly areas it will be 1st party so overall UML will be either 1st or 2nd party in the whole country. The real Tarain do not trust these so called new Madeshi leader. The real Tarain knows that their fate will be similar to Muslim who migrated from India to Pakisthan if Tarai will be controlled by these Madeshi new leaders – either Indian agent or money receiving from India.

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