मधेश की पुकार ! माताएं छाती पिट-पिट कर चिलाएंगी…हाय रे हाय ! हमने किन नामर्दो को जन्म दे दिया …

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), बीरगंज, १२ फरवरी |

नाका खुला, आंदोलन समाप्त। सांकेतिक ही सही मितेरी पुल पर आंदोलन के अश्वमेघ का घोड़ा खड़ा तो था। अब वह मर गया, साथ ही मर गया मधेश का अभिमान, मधेश का गुरुर। कोई मधेशी इस आंदोलन में ज्यादा लगा हो या कम, पर सब का भवनात्मक जुड़ाव तो था ही। आंदोलन समाप्त होने का ग़म सबमें व्याप्त है। हरेक मधेशी का सिर झुका हुआ है।s-1

अमेरिका नेपाल के लिए मदद को चौगुना बढ़ा दिया है। पूर्व के इतिहास को देखें तो जहां भी अमेरिका ने मदद बढ़ाई है, वहाँ गृहयुद्ध और हिंसा ही हुआ है, अब नेपाल की बारी है। चीन की हालत बेगाने शादी में अब्दुलाह दीवाना की तरह होकर रह गया।

भारत से मधेश दुखी है, भारत ने मधेश का साथ छोड़ दिया, धोखा हुआ, इसकी चर्चा पुरे मधेशी जन मानस में है। दूसरे तर्फ पहाड़ में चर्चा है की ओली सरकार मधेश से नहीं, भारत से झुक गया। भारत और नेपाल सरकार के बिच भारतीय हित के कई गोप्य समझौते हो चुके है, फिर भी भारत ने ही कोलकाता बंदरगाह ने बंद- हड़ताल कारकर माल-सामान रोक दिया। इस पुरे प्रकरण में नेपाल हारा, मधेश हारा, लेकिन एक कुशल सौदागर की तरह जीत भारत की हुई।

अब किसी मधेशी दल में फिर से निर्णायक आंदोलन करने की ना शक्ति है ना ही साहस। कुछ दिन सांकेतिक विरोध रहेगा । मधेशी दल की कोशिश रहेगी की चुनाव तक या मंत्री बनने तक ये आंदोलन चलता रहें, फिर जैसे ही राजनितिक परिस्थिति बदलेगी, आंदोलन ओझल में पड़कर ठंढे बस्ते में डाल दिया जाएगा। हाँ कभी- कही थोड़ी बहुत सुगबुगाहट होती रहेगी। पर गुलामी की जंजीर और मोटी और भारी हो जाएगी।

राजनीती करने वालोँ की दुकानों में नए- नए सामान, नए-नए ऑफर आते रहेगे, और दुकाने चलती रहेंगी। कुछ दिनों बाद स्थानीय चुनाव में भाई-भाई लड़ेंगे। हर घर के दो दरवाजे खुलेंगे। चुन-चुन कर आंदोलनकारी को ख़रीदा और मारा जाएगा। फिर राज्य का चुनाव होगा, मधेशी दल अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे और हारेंगे। पहाड़ी दल के समर्थन से हममे से कोई मुख्यमंत्री होगा, और अपनी कुर्सी टिकाने के लिए हम पर ही गोलियां चलवाएगा। फिर हम कहेंगे इनसे अच्छे पहाड़ी शासक और एक-एक करके सब उसके ही तलवे चाटने में लग जाएंगे।s-2

शहीदो के उपर विश्लेसन किया जाएगा, कोई अपरिपक्व तो कोई अतिउत्साही कहकर लाक्षणा लगाएगा। बुजदिल, अंधी-बहरी-गूंगी जनता सूखे आँखों से टकटकी लगाए देखती रह जायेगी। माताएं छाती पिट-पिट कर चिलाएंगी…हाय रे हाय ! हमने किन हिजड़े, नामर्दो को जन्म दे दिया, हमारे कोख़ को भी कालिख लग गया। बहनो और अबोध बच्चो की चीख सुनाई देती है, दिन-रात सुबह- शाम उनका रुदन कान फाड़े जा रहा है।

आओ खरीददारों आओ ! मधेश सारे बाजार नंगा हो गया, बोली लगनी शुरू हो गई। तुम भी बोली लगाओ, मधेश की इज्जत, आबरू सब बिकाऊ है, जो जितना लूट सकता है लूट लो। कुछ हम जैसे सिरफिरे भी होंगे, कुछ हम जैसे टूटे- गिरे भी होंगे। कही तो फिर से चिंगारी लगेगी, कही तो धुँवा उठेगा। कभी तो एहसास होगा की हमारा मददगार कोई नहीं है, और हमें मदद की दरकार भी नहीं है।s-3

नेपाल में सिर्फ दो क़ौम रहते है, एक शोषक दूसरा शोषित। क़ौम मतलब निशानिया, आइडेंटिटी जो पैदा होते ही नशों के अंदर दौड़ने लगती। बदकिस्मती से शोषक के क़ौम में सिर्फ ज़हर भरा हुआ है, जिसका हिसाब चुकाते-चुकाते ख़ाक़ हो जाएंगे। हज़ारो मारे जाएंगे मगर कोई अंतर नहीं आएगा। ये पूरी क़ायनात की बात है, इसलिये हमने जो अपना सर मिटटी में धसा रखा है, शुतुरमुर्ग की तरह उससे बाहर निकलना होगा। एक-एक दीमक को सबक सिखाना होगा।
अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्तियों के साथ विराम लेता हूँ।

“भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ “।।
                        जय मधेश।।

माताएं छाती पिट-पिट कर चिलाएंगी…हाय रे हाय ! हमने किन हिजड़े, नामर्दो को जन्म दे दिया, हमारे कोख़ को भी कालिख लग गया

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