मधेश की बौद्धिक वेश्यावृति से मधेश को बचाना भी एक आन्दोलन है : कैलाश महतो






कैलाश महतो, परासी | भारत के किसी उच्च अदालत के न्यायमूर्ति ने एक फैसले का अन्तिम निर्णय सुनाते हुए कहा था कि भारतीय समाज को भारत के कुछ बौद्धिक वेश्याओं से बचाना अब जरुरत हो गयी है । बौद्धिक व्यतित्व और समाज को समाज का दर्पण माना जाता है । वे किसी भी समाज का अगुवा होते है, दिशा निर्देशक होते है । फिर एक न्यायाधिश जैसे उच्च श्रेणी के न्यायमूर्ति ने ऐसा क्यों कहा ?

सी. के.राऊत का हुआ मधेश में जोरदार स्वागत।

क्या कारण रहा कि प्लेटो से लेकर अरस्तुतक, अरस्तु से लेकर लेनिनतक, स्टालिन से लेकर गाँधीतक और माओ से लेकर प्रचण्डतक ने बुद्धिविजियों पर पूर्ण विश्वास करने को धोखा माना है ? निश्चित ही कोई न कोई गंभीर बात तो है जिसके कारण संसार के उपरोक्त महान् हस्तियाँ भी बुद्धिजिवियों से सन्तुष्ट नहीं रहे हैं भले ही बुद्धिजिवी उनके बातों से असहमत रहे हों ।

दुनियाँ का हर निर्माण, आन्दोलन, बदलाव या फिर क्रान्ति बुद्धिजिवियों के तीन परत से घिरे होते हैं । मान लें कि कोई एक सडक बनानी है, आविष्कार करना है, निर्माण करना है, आन्दोलन करना है, बदलाव लाना है या फिर क्रान्ति करना है तो उसके आकारों के लिए बुद्धि लगाना पडता है । बुद्धिजिवीयों की आवश्यकता होती है । लेकिन आकार दे देना ही सारा काम नहीं होता । उन आकारों को पूर्णता देने के लिए मेहनतकश श्रमिक, मजदुर, किसान, यूवा आदि की आवश्यकता होती है । फिर जब वो निर्माण, आन्दोलन, बदलाव आदि पूर्ण हो जाता है तो दूसरे तह के बुद्धिजिवी, पैसे बाले और व्यापारी लोग सतह में आ जाते हैं । श्रमिक और मजदूरों द्वारा प्राप्त फलों को वे कब्जा कर लेते हैं । समय के क्रम में उन उपलब्धियों के साथ फिर कोई न कोई दुर्घटना घटती है । उन दुर्घटनाओं से उबारने या उसके पश्चात् के सेवा के लिए भी वही श्रमिक वर्ग की जरुरत होती है । जब श्रमिक की सेवा समाप्त हो जाती है तो फिर तीसरे तह के बुद्धिजिवीयों का वहाँ पर जमघट हो जाता है । यूँ कहें तो बुद्धिजिवी सिर्फ व सिर्फ अवसरों के फायदे उठाते हैं, श्रमिकों का दोहन करते हैं और उनके आँखों में धुल झोंककर अपना पेट पालते हैं । वे पेटजिवी होते हैं, बुद्धिजिवी नहीं ।

वे सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक हर आन्दोलन से पहले अपने को सुरक्षित रखने का हिसाब निकालते हैं । आन्दोलनों में भाग लेने बालों को त्रास दिखाते हैं । असफल होने का सन्त्रास फैलाते हैं । और यह वे इसलिए करते हैं कि सबसे पहले जनता द्वारा किए जाने बाले आन्दोलन सफल होने देने में वे अपनी असफलता मानते हैं । दूसरा, वे यह इसलिए भी करते हैं ता कि शासकों से उनका सम्बन्ध बना रहे । शासक लोग ये समझे कि मधेश के बुद्धिजिवी मधेश आन्दोलन के पक्ष में नहीं है और जब बुद्धिजिवी आन्दोलन के पक्ष में न हों तो आन्दोलन करना दूर की बात है । और उसके बदले उन्हें राज्य से कुछ न कुछ माल मटेरियल मिलता रहे । मगर आन्दोलन और बदलाव तो किसान, मजदूर, यूवा तथा विद्यार्थियों को चाहिए जो उन बुद्धिजिवियों के न चाहते हुए भी होता रहा है । जब आन्दोलन सफल हुआ तो वही बुद्धिजिवी, जिसकी बुद्धि कायरों से भी बदतर होती है, जनता के भीड में आ जाते हैं और बुद्धि का व्यापार शुरु कर देते हैं ।

pamaria Pamariya naach – Intangible Cultural… by himalinim
२०७४ श्रावण ७ गते शनिवार के दिन माओवादी केन्द्र के मधेशी राष्ट्रिय मुक्ति मोर्चा नेपाल द्वारा काठमाण्डौ में आयोजित एक अन्तरक्रिया कार्यक्रम में बुद्धिजिवी तथा राजनीतिक विश्लेषक कहे जाने बाले मधेशी कुछ लाल बुझक्कडों को भी न्यौता दिया गया था । उस कार्य क्रम में कार्यक्रम के आयोजक ने मधेश एक राष्ट्र होने की बात बताते हुए मधेश अलग देश होने की जब बात कही तो उस अन्तरक्रिया कार्यक्रम में सामेल एक मधेशी बुद्धिजिवी का तर्क यह रहा कि मधेश अलग देश होने का अवस्था तत्काल नहीं होने का दावा पेश कर डाला ।

अब सवाल यह उठता है कि जिस मातृका यादव ने २०५२ साल में माओवादी जनयुद्ध की शुरुवात की थी, क्या उस समय में उस मधेशी बुद्धिजिवी से मातृका जी पूछने चले गये होते तो क्या वो उस जनयुद्ध को सफल होने की बात बताते ? मातृका जी अगर उस लडाई को मूर्त रुप न दिए होते तो उनके नेतृत्व में हुए उस अन्तरक्रिया कार्यक्रम में वे अपना बुद्धि छाँट पाते ? क्या वे बुद्धिजिवी कभी राजा हटने, लोकतान्त्रिक गणतन्त्र आने, संघीयता लागू होने, प्रचण्ड का जनयुद्ध, रामराजा सिंह, गजेन्द्र नारायण सिंह, रामजनम तिवारी, रघुनाथ ठाकुर, उपेन्द्र यादव, जयकृष्ण गोइत, ज्वाला सिंह आदियों के शुरु के आन्दोलनों को विश्वास किये थे ? वे सबको वाहियात ही तो समझे थे । और आज उन्हीं के हर कार्यक्रम में जाने को तरसते रहते हैं बुद्धि छाँटकर पैसे कमाने के लिए ।

वे वही बुद्धि लेकर नेपाल सरकार की ३० वर्षोंतक गुलामी की । चम्चागिरी की और वहाँ से पेन्सन पट्टा लेकर अब मधेशी बुद्धिजिवी बन बैठे हैं । बहुतेरे बुद्धिजिवी किसी के द्वारा निर्माण किये गये अवस्था और हालातों का विश्लेषण ही करने में अपनी काविलियत मानते हैं जो कि एक दासता है । वे कोई हालात या बदलाव पैदा नहीं करते । बस्, दूसरों के मेहनत पर अपने बुद्धि को सवार कर देते हैं । और जबतक बुद्धिजिवियों में क्रान्तिकारिता नहीं होगी, विद्रोह करने की औकात नहीं होती, परिवर्तन करने की ताकत नहीं होता, तबतक बुद्धिजिवी दलाली करके ही अपना जीवन वसर करता रहेगा ।

स्यामुएल च्यापलेन, गाँधी, मण्डेला, कन्फ्यूसियस, सन् यात्सेन, माओ, माक्र्स, एंगल्स्, लुला डा सिल्भा, मोहम्मद महाथिर, प्रचण्ड, उपेन्द्र, सिके राउत आदि ने अपने बुद्धियों के साथ मौजुदा हालात से विद्रोह न किया होता तो संसार का आज वह हालात न होता जिसके लहक चहक में आजकी दुनियाँ है ।

मधेश अलग देश तत्काल के लिए संभव नहीं कहने का तात्पर्य क्या है ? क्या कोई बुद्धिजिवी मधेश गुलामी का ठेकका ले लें तो मधेश की आजादी टल जायेगी ? वैसे बुद्धिजिवियों के लिए मधेश तबतक आजाद नहीं हो सकता जबतक वे काठमाण्डौं में दो चार बंगले और न खरीद लें, मधेश समस्या के नामपर यूरोप, अमेरिका तथा अन्य सम्पन्न राष्ट्रों से अरबों का सौदाबाजी न कर लें । आल्तु फाल्तु एनजीओ और आइएनजीओ न खोल लें और नेपाल सरकार का चम्चागिरी करके धनाढ्य न हो जाये । और जब मधेश आजाद होने लगेगी, तो सबसे पहले वेही लोग बुद्धि बाँटने मधेश चले आयेंगे । अभी वे मधेश में नहीं, नेपाल के काठमाण्डौ में रहेंगे । क्यूँकि वे तो नाजुक चीज है न ! मधेश में प्रचण्ड घाम है, गर्मी है, धुल है, किचर है, सर्दी है । बेचारे विमार हो जायेंगे । शरीरों पर फोके पड जायेंगे । छाले काले हो जायेंगे

एक और बेमिशाल के मधेशी नेता मधेश के धरती पर अवतार ले चुके हैं जिनका जिक्र है कि वे डा. सीके राउत को इसलिए छोडा क्योंकि उन्हें अन्तर्राष्ट्रिय संरक्षण प्राप्त है । सिके राउत के पास कोई बुद्धिजिवी नहीं है । उनका आरोप है कि वे ‐सीके स्वयं में सर्वेसर्वा हैं । उनके जितने भी सहयोगी हैं, वे सब विदेश में हैं । विदेश से ही डा. राउत को सारा सहयोग प्राप्त है । वे च्यालेञ्ज करने लगे हैं कि मधेश की राजनीति करनी है तो नेपाल आयें । उनका यह भी कहना है कि जब वो सीके के साथ में लगे तो उन्हें यह पता ही नहीं था कि वे स्वतन्त्र मधेश चाहते हैं ।

लगता है नेता जी पत्रकारों को खोज खोजकर अन्तरवार्ता देकर अपना गिदरपना को बघैला करने की कोशिश में है । मैं लोमडी और दूर पेडपर रहे पके अंगूरों का उदाहरण देने में समय बर्बाद नहीं करना चाहता । लेकिन इतना जरुर है कि वैसे खिसियाए बिल्ली का आजाद मधेश के मुहिमों में कोई काम नहीं है । जहाँतक सीके राउत को अन्तर्राष्ट्रिय समर्थन की बात है तो वे तो खुल्लम खुल्ला कहते हैं कि अन्तर्राष्ट्रिय सहयोग और समर्थन ही तो मधेश देश को स्थापित कर पायेगा ! और उसी सहयोग और समर्थन के लिए तो सारा नेपाल और उसके नेता चाप्लुसी करते हैं । बिना अन्तर्राष्ट्रिय सहयोग और समर्थन के संसार में कितने देश है ?

सीके राउत के पास कोई अनुभवी नेता व बुद्धिजिवी न होने की जहाँतक उनकी दलिल है, दुनियाँ के कौन से आन्दोलन में बहुत बडे अनुभवी नेता या बुद्धिजिवी सामेल रहे हैं ? अनुभवी नेता और बुद्धिजिवी तो लुटने खाने में ही व्यस्त होते हैं । बदलाव नयाँ पीढी चाहती है जो कल्ह के अनुभवी नेता बनेंगे ।

कल्हतक सीके राउत के साथ में रहकर उनके कारण कुछ चर्चा पाने बाले अवसरों के वैसे सौदागर नेता जो खुद काठमाण्डौ में रहकर कोई व्यापार करता हो, वो मधेश के यूवा के विकास के बारे में सोंच बनाता है । वो मधेशी यूथ फोर्स का वकालत करता है जो खुद विदेशी भूभाग में रहता है ।

सीके राउत का पहला उद्घोष ही स्वतन्त्र मधेश के मुद्दों पर हुआ है तो फिर उनके साथ शुरु से ही लगने बाले व्यापारी नेता कैसे कह सकते हैं कि उनके उद्देश्य के बारे में उनको पता ही नहीं था ? यही बात हो सकता है कि या तो नेपाल सरकार के वो एजेण्ट, दलाल, चम्चा बनकर वो अपना व्यापार में इजाफा चाहते हैं या राजनीतिक लाभ से प्रेरित हैं या उनमें विद्रोही बनने की साहस ही नहीं है ।

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