मधेश की भावनाओं को दरकिनार करने की कोशिश ना करें : श्वेता दीप्ति

श्वेता दीप्ति , काठमांडू, ३१ मई | तेरी वफा खतरे में है बेवफाई की तो सोचना भी मत । जी हाँ फिलहाल राजपा नेपाल के लिए आम मधेशी की यही धारणा है । मधेशी नेताओं की वफा पर शक तो है पर कहीं यह उम्मीद भी कि शायद इस बार कोई सही पहल उनकी तरफ से होगी जो मधेश के हित में होगी । इस बार अगर मधेश की उम्मीदों से बनी पार्टी राजपा नेपाल ने मधेश की भावनाओं को दरकिनार करने की कोशिश की तो उनका राजनैतिक भविष्य दाँव पर लग सकता है ऐसा मधेश का मिजाज बता रहा है । वैसे काठमान्डौ में बैठे कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मधेश में कोई पार्टी नही है सिवा एमाले के क्योंकि वही एक पार्टी है जो नेपाल के स्वाभिमान और अस्तित्व की रक्षा कर सकती है इसलिए दूसरे चरण के चुनाव में मधेश में २ नम्बर क्षेत्र के अलावा बाकी जगहों पर एमाले का वर्चस्व होगा । खैर ये तो जनता जनार्दन जाने कि वो क्या कमाल करने वाली है वैसे व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना तो यही है कि अगर खुद को हारना ही है तो अपनों के ही हाथ हारो क्योंकि हाथ तो आपके खाली ही रहने वाले हैं ।

वर्तमान परिस्थिति में राजपा अध्यक्ष एक मजबूत नेतृत्व और निर्णय के साथ सामने आ रहे हैं जो मधेशी जनता के मनोबल को बढा रहा है जरुरत उनकी दृढता की है कि वो अपने निर्णय पर टिके रहें । फिलहाल चुनाव की तिथि बढा दी गई है । वजह रमजान बताया जा रहा है अर्थात् सरकार दो नीतियों पर काम कर रही है एक तो मुस्लिमों समुदाय को खुश करने की और दूसरी राजपा नेपाल को समय देने की । संविधान संशोधन की बात अब भी सामने नहीं है । कल तक जो फोरम यह कह रहा था कि बिना संशोधन वह चुनाव में हिस्सा नहीं लेगा आज चुनाव के बल पर संशोधन कराने का दावा कर रहा है । नेताओं ने शायद मधेश की जनता को भेड़ ही समझ लिया है । आप जब जो कहें बस जनता उसे शिरोधार्य कर ले क्योंकि उन्हें पता है कि जनता के पास कोई चारा नहीं है वो जाएगी कहाँ या तो आपकी झोली में उनका मत गिरेगा या फिर उनकी झोली में जिनके लिए वो सिर्फ जनमत हैं जनता नहीं । पर जनाब जनता असमर्थ हो सकती है अशक्त नहीं क्योंकि जनता ही खाक से फलक पर बैठाती है और जनता ही जमीं की धूल भी चटाती है ।
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एक दूसरा परिदृश्य जो सामने आ रहा है वह यह कि राजपा नेपाल पर भारत का दवाब है कि वो चुनाव के लिए सकारात्मक हों । दबाव और अनुरोध दो अलग शब्द हैं और जिनके अलग मायने हैं । दवाब गलत है और अनुरोध मध्यस्थता का काम करता है । इसे स्वीकार करना या न करना पूर्णतया सामने वाले पक्ष पर निर्भर करता है । मधेशी जनता की इस सोच को अगर सही कहा जाय तो उनके नेताओं को वास्तव में किसी दबाव में नहीं आना चाहिए क्योंकि जब कुछ मिला नहीं है तो आपके पास कुछ खोने का भी डर नहीं है कल जो था आनेवाले कल में भी कमोवेश वही आपको मिलेगा  । आज आपके आत्मनिर्णय का वक्त है आप वो करें जो मधेश के हित में है क्योंकि मधेशी जनता का विश्वास आप हैं । परन्तु जहाँ तक भारत की नेपाल के सन्दर्भ में उसकी भूमिका का सवाल है तो यह तो जाहिर सी बात है कि किसी भी देश में कोई दूसरा देश अगर निवेश करता है या कोई योजना लाता है तो वह उस देश की सरकार के तहत ही ला सकता है । वह यह नहीं कह सकता कि हम आपके देश के फलाने क्षेत्र को आगे बढाना चाह रहे हैं । वह अपनी योजना बताता है जिसे कार्यान्वयन करने की जिम्मेदारी उस देश के सरकार की होती है । यह सरकार तय करती है कि उस दूसरे देश के अनुदान, निवेश या योजना को कहाँ लागू किया जाय । बहुत दिन नहीं हुए बस दो वर्ष पहले ही की बात है जब देश भूकम्प की पीड़ा से कराह रहा था और विश्व के कई देशों ने यह इच्छा जताई थी कि हमें भूकम्प प्रभावित एक एक गाँव दिया जाय हम उसका निर्माण करेंगे । परन्तु वर्तमान सरकार ने इसे नकारा और कहा कि अनुदान या सहयोग राशि सरकारी खाते में जमा की जाय सरकार खुद पुनर्निमाण करेगी । इसका क्या परिणाम हुआ यह सबके सामने है उसे दुहराने की आवश्यकता नहीं । इस वाकया को यहाँ इसलिए उद्धृत किया गया कि राज्य, सत्ता ये सभी नीति और नियम के तहत चलते हैं जो कभी किसी पक्ष के लिए हितकर होते हैं तो कभी किसी अन्य के लिए अहितकर । हाँ पूर्व में की गई संधियों के लिए जो विवाद है, उन्हें भी हमारी सरकार का पहल ही सुलझा सकती है । इसलिए दोषारोपण नहीं, पहल करने की आवश्यकता है । पर देश की जा अवस्था है उसमें तो यही कहा जा सकता है कि सभी अपनी अपनी स्वार्थ की रोटियाँ सेकने पर लगे हुए हैं ।
किन्तु इससे परे वर्तमान में मधेश की जनता की अपेक्षा अपने नेतृत्व से सिर्फ यह है कि वो मधेश के अधिकार की  लड़ाई  को कहीं भी गिरवी ना रखें । मधेश की शहादत को जाया न होने दें क्योंकि जो खून बहा था वो समझौता नहीं अधिकार चाहता था । 
 
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1 Comment on "मधेश की भावनाओं को दरकिनार करने की कोशिश ना करें : श्वेता दीप्ति"

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Bibek
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Ra Ja. could boycott the election but take the election but they could not dare.. it gives strength to Goita and CK.. Pahadi politicians and Think tank think they are winning.. but they will realize later that it was their big mistake…

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