मधेश की माँग को सम्बोधन किया जाय यही भारत की सोच है : श्वेता दीप्ति

भारत भ्रमण के दौरान ओली सतर्क थे और अपने तुक्कों और मुहावरों का पिटारा नेपाल में छोड़कर ही गए थे यह एक खास बात हो सकती है क्योंकि उन्हें भी इतने महीनों के कार्यकाल में यह पता चल ही गया होगा कि कहावते घातक भी सिद्ध होती हैं और इससे देश नहीं चल सकता हाँ मनोरंजन जरुर होता है

श्वेता दीप्ति, काठमाण्डू, 24 फरवरी ।

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ना जाने किस उपलब्धि पर इतरा रहे हैं प्रधानमंत्री ओली । नई दिल्ली स्थित नेपाली राजदूतावास में जिस तरह नारे लगे और भारत पर जीत हासिल करने दावे हुए, उससे अगर कुछ सिद्ध होता है तो यही कि अपने मुँह मियाँ मिट्ठु वाली कहावत यहाँ चरितार्थ हो रही है । यूँ भी जो हुआ उसमें कुछ नया था भी नहीं क्योंकि प्रधानमंत्री ओली ने तो पहले ही घोषणा कर दिया था कि वो बिना किसी एजेण्डे के भारत भ्रमण पर जा रहे हैं और जहाँ एजेण्डा नहीं वहाँ उपलब्धि कैसी । एक जम्बो टोली को लेकर गए प्रधानमंत्री ओली की यात्रा अगर विश्लेषित की जाय तो यही कहा जाएगा कि ओली का भारत भ्रमण उपलब्धिविहीन रहा । जो मिला वह पूर्व तय था, एक औपचारिकता बाकी थी जो पूरी हुई । हाँ मधेश आन्दोलन का पुरजोर असर भारत में भी दिखा, जब मधेशी, जनजाति छात्रों के संगठन ने भारत के हवाई अड्डे पर ही ओली का स्वागत काले झण्डे और हत्यारा ओली के नारों के साथ किया । गौरतलब यह है कि उस समय उन छात्रों को वहाँ गिरफ्तार नहीं किया गया । उन्हें नेपाली दूतावास के सामने गिरफ्तार किया गया । क्या भारतीय सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि उनके सामने हवाई अड्डे पर छात्र आसानी से विरोध के कार्यक्रमों को अन्जाम दे देते । यह माना ही नहीं जा सकता क्योंकि हवाई परिसर में इतना आसान नहीं है सुरक्षा निकाय को चकमा दे देना । अर्थात् वहाँ छात्रों को आजादी दी गई ताकि ओली के सामने यह संदेश भारत आगमन के साथ ही मिले कि उनके लिए भारत की धरती पर भी विरोध का वातावरण है और उन्हें किस रूप में देखा जा रहा है । बाद में गिरफतारी का नाटक भी किया गया और रिहाई भी हुई बावजूद इसके देहरादून में भी पुनः छात्रों ने अपना विरोध जताया ।
ओली और मोदी की मुलाकात पर नजरें टिकी थीं । बन्द कमरे की मुलाकात के बाद ओली जितने खुश नजर आ रहे थे, वहीं मोदी ने प्रेस कान्फ्रेंस में एक बार पुनः संविधान के मसले पर भारत की नीति की स्पष्ट घोषणा की यह कहकर कि, नया संविधान नेपाल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है भारत इसका स्वागत करता है किन्तु इसका सहज कार्यान्वयन सहमति के आधार पर ही हो सकता है । मसला साफ था कि, बिना मधेश को संग लिए सहजता के साथ संविधान का कार्यान्वयन नहीं हो सकता । समझदारों के लिए इशारा ही काफी है । ऐसे में भारत हारा और नेपाल जीता इस उद्घोषण का क्या और कितना महत्व रह जाता है यह सुधीजन स्वयं तय कर सकते हैं । क्योंकि संविधान के मामले में भारत ने अपनी सकारात्मकता के साथ साथ संविधान की कमियों को भी दिखा ही दिया है । इतना ही नहीं इसी दौरान रघुवंश सिंह का जनता के साथ नेपाल के दूतावास के सामने प्रदर्शन करना भी इस स्थिति को दर्शाता है कि भारत क्या सोच रहा है ? मधेश की माँग को सम्बोधन किया जाय और सीमांकन का मामला जल्द से जल्द सुलझाया जाय यह सोच आज भी भारत की है और इसे ओली भी समझ चुके हैं और शायद इसलिए संविधान संशोधन के लिए सकारात्मक दिख रहे हैं । इधर नेपाल अब भी नाकबन्दी के मुहाने पर खड़ा है । मधेश आज भी शान्त नहीं हुआ है । ओली के लौटने का इंतजार और उसके बाद उनकी आगामी कदम की ओर निगाहें हैं, जो अगर मधेश के लिए सकारात्मक नहीं हुई तो शिथिल आन्दोलन पुनः रंग लेगा क्योंकि आन्दोलन जारी है ।
भारत भ्रमण के दौरान ओली सतर्क थे और अपने तुक्कों और मुहावरों का पिटारा नेपाल में छोड़कर ही गए थे यह एक खास बात हो सकती है क्योंकि उन्हें भी इतने महीनों के कार्यकाल में यह पता चल ही गया होगा कि कहावते घातक भी सिद्ध होती हैं और इससे देश नहीं चल सकता हाँ मनोरंजन जरुर होता है । उनके भाषण में उन्होंने बार बार नाकाबन्दी के दौरान नेपाल भारत के रिश्तों में आए तिक्तता की चर्चा की और कहा कि वो रिश्तों को सुधारने आए हैं । जबकि उनकी ही छत्रछाया और प्रोत्साहन में भारत के झण्डे जले और जी भरकर गालियाँ दी गईं । चीन का कार्ड खेला गया, यह अलग बात है कि यह खेल सफल नहीं हो पाया । प्रश्न यह है कि क्या इन बातों को सचमुच भारत ने दिल से नहीं लगाया है ? क्योंकि प्रधानमंत्री ओली के भ्रमण को भारत ने विशेष बना दिया है । उनकी खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है । राष्ट्रपति भवन में उन्हें ठहराना एक विशेष दर्जा प्रदान करता है और ये सारी बातें ओली जी की खुशी का कारण भी बन सकता है । किन्तु अगर तीक्ष्णता के साथ देखा जाय तो भारतीय प्रधानमंत्री के अभिभाषण से साफ पता चलता है कि पिछले दिनों जो हुआ उसे इस भ्रमण में जगह देने से भारत खुद को बचा गया ।
मोदी के पूरे भाषण में अगर किसी बिषय पर बल दिया गया तो वह था विकास का मुद्दा, दोनों देशों के सहकार्य का मुद्दा । यह मुद्दा नेपाल के प्रधानमंत्री का भी होना चाहिए था । क्योंकि अभी नेपाल को अगर किसी चीज की आवश्यकता है तो विकास की क्योंकि पिछले वर्षों में नेपाल ने राजनीतिक और प्राकृतिक रूप से जो आपदा की मार झेली है उसे दूर करना और स्थिति को सुधारना नेपाल की पहली प्राथमिकता है । किन्तु हमारे प्रधानमंत्री फिलहाल धरहरा की सीढ़ियों पर चढ़ने को आतुर है और इसका बिगुल वो वहाँ भी फूकते नजर आए । पहले से अधिक ऊँचा धरहरा बनने की घोषण वो कर चुके हैं । कोई विज्ञ उन्हें यह सलाह क्यों नहीं देता कि सुन्धारा के उस व्यस्ततम जगह पर धरहरा का पुनर्निमाण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सही नहीं है । धरती के गर्भ में जो हलचल हुआ वो आजतक जारी है और काठमान्डू हमेशा भूकम्प के खतरनाक जोन में है । ऐसे में सरकार का यथार्थ को नकारते हुए यह निर्णय लेना क्या सही है ? होना तो यह चाहिए कि धरहरा का निर्माण ऐसी खुली जगह पर हो जहाँ घनी आबादी ना हो । खैर यह भी देश का आंतरिक मामला है इसपर देश खुद निर्णय करेगा । किन्तु प्रधानमंत्री ओली जिसतरह देश की सभी समस्याओं को दरकिनार कर धरहरा निर्माण पर जोर दे रहे हैं इससे तो यही लगता है कि वो एकबार फिर देश की प्रवासी और आप्रवासी जनता को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर रहे हैं और अपनी नाकामियों को छुपाने की पुरजोर कोशिश भी । पर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ?

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