मधेश की मिट्टी अपने बेटे की सहादत का हिसाब माँग रही है : रोशन झा

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रोशन झा, सप्तरी, २७ अप्रैल । परिवर्तन के महायोद्धा (स्टालिन) के अनुसार ”साझा भूभाग, भाषा, आर्थीक जीवन, मनोवैज्ञानिक संरचना” ‘राष्ट्र’ है । अंग्रेजी प्रसिद्ध विद्वान (अक्सफोर्ड) के अनुसार ”साझा भूभाग, साझा भाषा, साझा राजनैतिक चरित्र और आकांक्षा” ‘राष्ट्र’ है । मधेस भौगोलिक, आर्थीक, साँस्कृतिक, भाषीक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक रुपसे विभिन्न जाती, वर्ग, समुदाय, और सम्प्रदाय की साझा उदगम् स्थल तथा साझा पहचान एवं रीति रिवाज वाले साझा भूगोल होने के कारन मधेश एक राष्ट्र है ।

दो सौं वर्षों से मधेसी जनता अपनी राष्ट्रिय पहिचान के लिए नेपाल में विभिन्न चरण में संघर्ष करते आए हैं, नेपाल में बहुत सारी राजनैतिक परिवर्तन हुए । जहानीया राणा शासन, राजतन्त्र, प्रजातन्त्र, लोकतन्त्र एवं गणतन्त्र जैसा परिवर्तन भी हुए किन्तु मधेसी समुदाय सिर्फ एक वफादार शैनिक की तरह अपना फर्ज निभाते आए है । जब नेपाल में जन आन्दोलन हुआ तो मधेशी बिश्वस्थ थें की ईस महा परिवर्तन के बाद मधेशीयों सम्मान पूर्वक जीवन निर्वाह करने के लिए अधिकार सम्पन्न हो जाएँगे । किन्तु मधेश और नेपाल के बीच रहे अन्तर द्वन्द का कोई समाधान नही निकल पाया, मधेशीयों के साथ रहे नश्लभेदी बिभेदकारी सोच और भी साकार होते दिखाई देने लगा और राज्य की शासन सत्ता के बागडौर में मधेशीयों को उपेक्षित किया गया और मधेशीयों के दिल में नफरत की ज्वाला भडकती गई जो मधेस आन्दोलन की ज्वालामुखी के रुपमें विस्फोट हुआ । मधेशी महिलाएँ, यूवा, विद्यार्थी, राजनीतिकर्मी, वृद्ध सभी सम्पूर्ण मधेसी जनता अपनी हक अधिकार सुनिश्चितता के लिए सडकों पर उतर आएँ ।

मधेश के बहुतों सन्तान ने अपनी जान की कुर्बानी दी और नेपाल सरकार ने सम्झौता किया की मधेशीयों की माँग को पूरा करके उन्हे भी राज्य की हरेक क्षेत्र में समान प्रतिनिधित्व कराया जाएगा । अन्तरिम संविधान लिखा गया, दो दफा संविधान सभा का निर्वाचन भी हुआ संविधान जारी हुआ शंशोधन भी हुए किन्तु आश्वासन देते हुए मधेशीयों के साथ धोखा और छल कपट ही किया गया । बारम्बार मधेशीयों को आन्दोलन करने पडे नेपाल सरकार नें अपनी सारी शक्ति लगा कर आन्दोलन में दमन किया सैंकडौं निर्दोष और निहत्थे मधेशी मानव को पुलिस ने गोलीयों से सिना छलनी कर मौत के घाट उतार दिया फिर भी संघर्ष जारी रहा । मधेश में बहुत उथल पुथल हुआ लेकिन राजनैतिक परिवर्तन नही हो पाया, कूछ पार्टीयों और व्यक्तिओं को ईसका ऐसा लाभ मिला कि वें रातों-रात मधेश के महामहिम बन बैठें । जनभावना से अनभिज्ञय होकर ऐसे व्यक्तित्व सत्तावाद की राजनीति में मग्न होकर मधेस पुत्रों की बलिदानी को भूल गए ।

जब मधेश में ‘स्वतन्त्रता’ का नारा बुलन्द हुआ तो नेपाल की राजनीति में भू-कम्प आगया । मधेशी जनता कोई अधिकार प्राप्ति की सारे मार्ग को बन्द होते देख स्वतन्त्र मधेस देश निमार्ण में स्वेच्छिक रुप से अपनी सहभागिता जनाने लगे, लाखौं की तादात में स्वतन्त्रता के लिए आवाज लगाती मधेशी जनता को देखकर नेपाल सरकार का होस उडगया और मधेशीयों को विदेशी कहकर सत्ताधारी नेपाली राजनैतिक दल के कूछ नेता कटाक्ष करने लगे और डर के मारे उन्होने एकमत होकर मधेशीयों को हक अधिकार कुण्ठित कर के अपनी सुविधा अनुसार नियम, कानून और विधेयक पारीत करके मधेशीयों पर अघोषित रुप में राजनैतिक नाकाबन्दि लगाने लगे । मधेशी जनता जमकर नेपाल सरकार की ईस छल कपट का बिरोध कर रही है और स्वतन्त्रता के पक्ष में स्वतः स्फुर्त रुपसे अपनी आवाज बुलन्द कर रही है । नेपाली शासन मधेश और मधेशीयों के लिए क्रुर बन गया है । शासक आम मधेशी जनता को दबाकर शासन करना चाहती है । मधेशीयों को बोलने की स्वतन्त्रता नही है । मधेशीयों को संगठित होने, एक जगह जमा होने, हक अधिकार की बात करने की स्वतन्त्रता नही है । मधेशवासी भय और त्राश के बातावरण में सांस ले रही है क्यूँकी मधेशपर शासन का बागडोर पहाडी समुदाय के हाथों में है । पहाडीतन्त्र की रंगभेदी, नश्लभेदी शासन के दिन लद चुके हैं । मधेशी जनता ने संघर्ष का जो रुप पकडा है उससे लगता है की अब मधेश में सर्वसत्तावादी नेपाली शासन और पंगु लोकतन्त्र की आँखमिचौली ज्यादा दिनतक नही चल सकती है । मधेशी जनता नेपाली राज्य की बिभेद, दमन और शोषण के प्रति सचेत है । सदियों से अधिकार से बंचित मधेशी जनता अपनी लडाई को स्वतन्त्रता की मुकाम पर पहुँचा रही है । दो-ढाई शताब्दी पूर्व, अपनी खोई हुई अस्मिता पाने के लिए मधेश संघर्ष और विद्रोह की और आगे बढ चुका है, लगता है ईसे कोई नही रोक सकता । एक ही भौगोलिक संरचना के तहत मधेशी जनता द्वारा अधिकार प्राप्ति के लिए की गई संघर्ष में नेपाल सरकार द्वारा हुए चरम दमन और नरसंहार से मधेशीयों की खून से सिंचित मधेश की मिट्टी अपने बेटे की सहादत का हिसाब माँग रही है ।

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