मधेश के युवाओं में थपी नयी जान और आजादी की बेमिसाल उफान : कैलाश महतो

कैलाश महतो,पराशी, १५ अप्रिल |

एबीसी न्यूज च्यानल और हिलता हुआ नेपाल के मसालेदार स्वादों ने मधेश के युवाओं में थपी नयी जान और आजादी की बेमिसाल उफान –कैलाश महतो
“मधेश र थरुहट राज्य कल्यिै अस्तित्वमा थिएन । मधेश नामको राज्य कहिल्यै भएन,आज पनि छैन र भविष्यमा पनि हुने छैन । राष्ट्र छैन, र राज्य पनि छैन । न त विगतमा कहिल्यै थरुहट राज्य थियो, न मधेश राज्य नै । आज कुनै विदेशीको उक्साहटमा मधेश र थरुहटको नाममा राष्ट्र माग्दैमा त्यो अवास्तविक कुरा वास्तविक हुन सक्दैन ।”–वामदेव गौतम । –अखिल नेपाल किसान महासंघको राष्ट्रिय सम्मेलनमा ।

CK Raut

डा.सी.के. राउत

हम अपने बुजुर्गों को वैसे ही बुजुर्ग नहीं कहते, वैसे ही हम उन्हें सम्मान नहीं करते । बहुत हद तक औपनिवेशिक शासकों द्वारा लिखे गये मोटे मोटे इतिहास के ग्रन्थों से भी सच्चे वे इतिहास होते हैं । उनका मानना है कि चिटीयों की मौत तब निश्चित बन जाती है जब उनमें पंख लग जाते हैं, क्यूँकि वे अनावश्यक उडाने भरने लग जाते हैं । तकरीबन वही हालात गार्खाली नेपाली शासन की बन चुकी है कि वह अपने यथार्थ को अस्वीकार कर बहादुरी के बल पर सिर्फ मधेश को ही नहीं, अपितु भारतीय भूभागों को भी जितने की अहंकारपूर्ण पंख लगा चुकी है । वे मधेश को अपनी विजित भूमि मानकर मधेशियों को भारतीय या अन्य विदेशी करार देते हैं । उन्हें इतना भी होश नहीं कि सन् १८०४ में मधेश को जब वे कब्जा करने आये थे तो उन्हें मधेशी राजायें और उनके सेनों से लडने में काफी क्षति हुई थी । सन् १८६० में जब अंगे्रजों ने जंग बहादुर राणा को नयाँ मुल्क के नाम पर पश्चिमी मधेश दिया था तो वहाँ मधेशियों की घनी बस्ती थी । और जब मधेशी थे तो मधेश होना तय है ।
भारत पर औपनिवेशिक शासन कर रहे अंग्रेजी अहंकारों में मस्त जॉन स्ट्रैची ने भी कभी कहा था, “भारत न है और न कभी था । भारत नाम का ऐसा कोई देश ही नहीं रहा है जिसमें यूरोपिय विचारों के अनुसार किसी तरह की भौगोलिक, राजनीतिक, सामाजिक या धार्मिक एकता रही हो । ऐसे न किसी राष्ट्र या भारत की जनता की वजुद कभी था जिसकी इतनी चर्चा सुनी जाती है ।” स्टै«ची के ही लब्जों को दोहराते हुए लर्ड कजिन ने भी कहा था, “भारतीय राष्ट्रियता का कोई स्वाभाविक रुप ही नहीं है ।” और जब भारतीय लोगों ने अंगे्रजों को भारत से अवगत कराया तो सन् १८९९ मेें अंग्रेजी संसद द्वारा बनाये गये कानुन के बाद “भारत” का नाम सुनिश्चित किया गया । उसके बाद बडे चलाकीपूर्ण लहजे में विन्स्टन चर्चिल ने भारतीयों से कहा कि अंगे्रजों के भारत से चले जाने के बाद भारत देश के रुप में चल ही नहीं पायेगा । भारतीय लोग बर्बाद हो जायेंगे । मगर भारतीय लोग उनके झाँसे में जाना पसन्द नहीं किये ।
मधेशियों को बहकाकर, फुसलाकर, डराकर, लोभ लालच दिखा कर उन्हें अपने वश में रखने और शासन करने की झूठी कला नेपालियों ने अंगे्रजों से विरासत में ली है । वे जॉन स्टैची और लर्ड कजन की तरह ही कहते हैं कि मधेश न कभी देश था और न है । उसकी भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आदि कोई रुप ही नहीं है । वे सब भारत से आये हुए हैं । और जब मधेशी जनता उनके बातों में पडना छोडती जा रही है तो नेपाली शासक लोग अंगे्रजों द्वारा गाँधी को दिए हुए प्रस्ताव के अनुसार संघीयता लेकर मधेशी को नेपाल में ही गुलामी करने का न्यौता दिये जा रहे हैं ।
कुछ सामाजिक संजाल चलाने बाले विश्लेषकों का मानना है कि नेपाली शासक और उनके राजधानी बेइमानी, अत्याचार तथा विभेदों के कारण इतना कलंकित हो चुका है कि सि.के राउत के काठमाण्डौ जाते ही कभी प्राकृतिक महाभूकम्प चली जाती है तो कभी आँधी तूफान मच जाती है । कल्ह से तो डा.राउत केABC टेलिविजन द्वारा प्रसारित की गयी अन्तरवार्ता ने नेपाल में राजनीतिक भूचाल ही खडा कर दी है और अब सारा नेपाल हिलने  लगी है । चारों तरफ तबाही ही तबाही नजर आ रही है । सेना, पुलिस और प्रशासन सारे की निन्द उड सी गयी है ।ABC न्यूज च्यानल पर कार्रबाई करने की प्रेस काउन्सिल के जरिये सरकार की निर्णय हो चुकी है जबकि उस च्यानल ने सरकारी प्रवक्ता के तरह डा.राउत से सवाल दाग रहा था, उन्हें नेपाली होने के लिए नसीहत दे रहा था और अंगे्रजों की तरह मधेशी जनता को नेपाल में ही रहकर संघीयता में जीवन वसर करने का अनुरोध कर रहा था । आश्चर्य की बात है कि नेपाल के लोकतान्त्रिक संविधान और उसके मातहतों की लोकतान्त्रिक पद्धतियों को मानकर फिलहाल नेपाली नागरिकता को ही ढो रहे डा.राउत को बहलाने फुसलाने के उद्देश्य से उत च्यानल द्वारा लिए गये अन्तरवार्ता के कारण सरकारी कार्रबाई करना कितना लोकतान्त्रिक होगा ?
देशद्रोह के ही मुद्दों में करीब एक महीने तिहार जेल में बैठे दिल्ली के जे.एन. यू के छात्र नेता कन्हैया को भारतीय मिडिया ने इतना प्रचार प्रसार किया कि वो आज पूरे सरकार और सरकारी रबैयों को चनौती दे रहा है । भारत सरकार को तो कन्हैया को देश निकाला कर देना चाहिए था या आजीवन कारावाश में डाल देनी चाहिए थी या फाँसी चढा देनी चाहिए थी । सारे भमिडियाओं पर कानुनी कार्रबाई करनी चाहिए थी । क्यूँ नहीं करती है भारत सरकार ऐसा ? क्या भारत सरकार कन्हैया से कमजोर है ? नहीं । वो इस लिए नहीं करते, क्यूँकि वे लोकतन्त्र को मानते हैं, लोकतान्त्रिक अधिकारों की ग्यारेण्टी करते हैं ।
ABC मधेश अनुरोध करता है कि आप अपना च्यानल मधेश में स्थापित करें । लोकतान्त्रिक आप के हरेक पद्धति को मधेश स्वागत करेगा । आप के मिडियाओं पर कोई अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होगी । ये हमारा वादा है । मधेशी वैसे भी धिरे धिरे मरता ही जा रहा है । अब मधेशी या तो अपना देश पूनर्निर्माण करेगा या संसार के सामने लडते लडते मरना स्वीकार करेगा । पर गुलामी अब हरगिज बर्दास्त नहीं करेगा । डा.राउत के अन्तरवार्ता ने एक तरफ नेपाली शासन को हिलाने का काम किया है, वहीं दसरे तरफ मधेशी यूवाओं में अपने स्वराज के लिए नयी जान और बेमिशाल उफान भरने का भी काम किया है ।
डा.राउत के स्पष्ट, सत्य, तथ्यपरक और एतिहासीय तर्कों को सुनकर समता मूलक, अत्याचार तथा विभेद रहित समाज निर्माण, आत्म निर्णय सहित के प्रान्तीय व्यवस्था, समान व्यवहार और अवसरों के मुद्दों को उठाकर दशकों शसस्त्र युद्ध करने बाले तत्कालिन विद्रोही सेना प्रमुख रहे नेपाल के वर्तमान उपराष्ट्रपति पुत्र मधेशियों को गाली देते हुए डा.राउत को इन्काउण्टर करने का मनसाय रखता है । इसी को कहते हैं, “सौ चुहे खाकर बिल्ली चली हज को ।” आखिर उसने गोली चलाने और गालियाँ देने के अलावा दुसरा कोई सभ्य संस्कार तो सिखा नहीं ।
शान्तिपूर्ण रुप से अपने बातों को रखने बाले डा.राउत को गोली मारने बाला उस दिपेश पून को मधेश स्वागतपूर्ण चुनौती देता है कि वो अपना बन्दुकें फिरसे निकाले और मधेशियों को इन्काउण्टर करें । मधेश आजमाना चाहता है कि पहाडी बन्दुकें कितने सि.के को गोली मारता है ।
कुछ अन लाइन न्यूज खबरें उस इन्टरभ्यूको लेकर अपने नेपाली लोगों को खून खौलाने का आव्हान करता है । यह प्रमाणित करता है कि हिंसा से शुरु हुआ नेपाली साम्राज्य आज के इस उत्तर आधुनिक युग में भी हिंसा ही पसन्द करती है जो मधेश स्वीकार नहीं करता । मधेश प्रेम और अहिंसा से ही मधेश को वापस लेने को हिम्मत रखता है ।
उधर एमाले के युवा संगगठन ने डा.राउत को काठमाण्डौं में ही पकडकर कार्रबाई करने की धम्की दी है । उसके अनुसार उसने अपना युवा को परिचालित भी कर दिया है । मधेश उन युवाओं से अनुरोध करना चाहता है कि डा.राउत से तर्क और वार्ता करने से घबराने बाले उनके पार्टी तथा नेतृत्व पंति के युवा शति उनको किस हैसियत से कार्रबाई कर सकता है । यह पृथ्वीनारायण शाह, हिटलर, मुसोलिनी या स्टालिन की दुनियाँ नहीं है, जिसे मधेश या विश्व समदाय स्वीकार कर लेगी ।
उधर बामदेव बाबा पागल हो रहे हैं । उन्होंने न जाने कहाँ से कौन से इतिहास के पन्नों में पढ लिया है कि नेपाल के अलावा इस धरती पर उन्हें कोई देश ही नजर नहीं आता है । उनसे मधेश अनुरोध करना चाहता है कि अपने बाहियात और बेबुनियाद हठ और जिद्द को दर किनार कर पढने और अध्ययन करने के हैसियत को भी उपर उठाये । हम जानते हैं उनकी बुद्धि की हैसियत । क्यूँकि हम उन्हीं के स्कूलिङ्ग में रहे हैं कभी ।

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