मधेश को गुलाम कराने मे अपने भाइ-बंधु ही साथ दे रहें हैं : मुरली मनोहर तिवारी

मुरली मनोहर तिवारी

मुरली मनोहर तिवारी

मुरली मनोहर तिवारी(सिपु), वीरगंज ,संबिधान सभा -२ में मधेशी दलो को करारी हार का सामना करना पडा। हार के आत्ममंथन के गर्भ से कइ सवाल उपजे, मसलन कम मत के कारक-तत्व, बिना गठबंधन चुनाव लडने का खामियाजा, संस-१ में अलोकप्रिय कार्य, सत्ता समर्पण मुद्दा विसर्जन प्रवृति, अमृतालिंगम चरित्र, दल विभाजन। चुनाव के समय मृतप्राय सा हो चुका मधेशी मोर्चा फिर अस्तित्व में आने लगा। मधेश में दुख और निराशा ने धर कर लिया। मोर्चा अपने औचित्य को सार्थक सिद्ध करने के लिए, मधेशी दल एकीकरण का विचार लाया। सुनने में प्रस्ताव अच्छा भी लगता था। फिर दौर शुरु हुआ निरर्थक बैठको का, भाती-भाती के शर्तों का। कभी सुनाई देता होली के पहले होगा फिर सुनने में आया होली बाद होगा, नए साल पर होगा…..और टाय टाय फिस्स।

मधेशी दल के आधार बट चुके है। सब अपने संकीर्ण खेमें तैयार कर चुके है। इनके ब्यक्तिगत अहम् के टकराव में मधेश का हित और सहादत का संकल्प पीछे छूट गया है। मधेश का संघर्ष जातीय संघर्ष, भाषिक कटुता में परिणत होकर रह गया है। आज कही भी मधेश से जुडी कोई भी बात हो अब कार्यकर्ता में स्वतः जुडाव नहीं होता। दलगत हित मधेश हित पर भारी पड रहा है। मधेश के तारणहार, मधेशी दल के हालात तो चिन्ताजनक थे ही, समस्या ने तब और विकराल रुप धारण कर लिया जब सरकार दमन,शोषण की नीति पर उतारू हो गइ। जलेशर, गौर, बारा, नेपालगंज में दमन और प्रतिकार का दौर शुरू हो गया। जब दमन हुआ तो प्रदर्शन हुए, विरोध के आवाज़ मजबूत हुए जिसके कारण अलगाववाद, विखंडन के पक्ष मजबूत होने लगे है।

जिस लोकतांत्रिक देश के पृष्ठभूमि में सामंती और पूंजीवाद प्रेरित, चाहे एक वयक्ति, एक समुह, एक कौम ही सत्ता पर हावी हो, वहाँ ये समुह, एकता अखंडता के नाम पर दमन, शोषण, साजिश करते ही है। अगर सरकार संवेदनशील होे, अपने नागरिक के सुख-दुख के ख्याल करने वाला हो तो समस्या की गुंजाइश न्यून हो जाती है। इंग्लैण्ड से स्काटलैण्ड के अलग होनेे कीे मांग होती रही जब जनमतसंग्रह हुए १५१२६८८ अलग होनेे के पक्ष में और १८७७२५२ अलग नही होने के पक्ष में मत जाहिर किए। जिसमें अलग नही होने केे लिए ना के पक्ष में कम से कम १८५२८२८ मत मिलना अनिवार्य था। अव सवाल ये उठता है की स्काटलैण्ड के लोग अलग नहीं होने का निणर्य क्यों लिए। जबकि इंग्लैण्ड के प्रयोग का ७५% तेल की पूर्त्ति स्काटलैण्ड से होता है। २०१२ इ. तक ४० अर्ब डालर का योगदान अकेले स्काटलैण्ड से होता था। हर साल करीब १०० अर्ब पौन्ड का निर्यात सिर्फ स्काटलैण्ड से होता है।

        मधेश के हालात पर गौर करे तो नेपाल के कृषि उत्पादन के ७०% भाग मधेश में है। सकल घरेलू उत्पाद के ६८% योगदान मधेश से होता है। इसी तरह कुल कृषि उत्पाद के ६८% भाग मधेश से होता है। नेपाल के कुल औद्योगिक उत्पाद के ७२% योगदान मधेश से होता है। उसी तरह कृषि, उधोग, व्यापार और भन्सार के ७६% राजस्व मधेश से प्राप्त होता है।  आश्चर्य है की मधेश के प्रति व्यक्ति आय ७३२२रू. है और पहाड़ में प्रति व्यक्ति आय ८४३३ रू. है। इससे साबित होता है की मधेश कितना पिछडा है। मधेश में बेरोजगारी दर ६.५% है जबकि पहाड़ में ३.७% और हिमाल में २.१% है। मधेश के जिला से नेपाल का ७०% राजस्व जाता है और विकास के लिए १३% मिलता है।

ये तथ्य साबित करते है की आमदनी के लिए मधेश, नेपाल का स्काटलैण्ड है, लेकिन मधेश का पिछड़ापन देखा जाए तो सरकार का भेदभाव उजागर होता है। जबकि स्काटलैण्ड के पास अपना संसद, अपना शिक्षा, अपना स्वास्थ्य का अधिकार है। मधेश के पास तो कुछ भी नहीं है। यही जनमत मधेश में हो तो क्या नेपाल में रहने का मत मिलेगा ? और जबरदस्ती कब तक अपने पास रोक पाएंगे यह सोचने का विषय है। मधेश में स्थायी सत्ता दमन करता है। मधेश की धरती के अक्रान्ता स्थायी सत्ता हैं। ये राष्ट्र, ये धरती मधेशी की है। मधेश की भूमी निर्दोषो के लहू से लाल हो रही है। यहां कोई नही, सच में कोई नहीं है, जो जुल्म के रास्ता रोक सके। दुर्भाग्य है मधेश का, यहां गुलाम कराने मे आक्रांता के साथ अपने भाइ-बंधु ही दे रहे है।

गुलाम मधेश, गुलाम मन, कोे शाषक कीे संस्कृति अपनाने कोे बाध्य होना पडेगा उसके बाद मधेशीयत का नामो निशान नही रहेगा।  इस देश में गोली चलाना, बम बनाना, बम चलाना, हत्या, भ्रष्ट्राचार, बलात्कार इत्यादि से भी बड़ा अपराध है – जनता को जागृत करना। जब-जब कोई ऐसा करने की कोशिश करे उसे षडयंत्र का शिकार बनाया जाता है। क्या हम संविधान और सरकार के सीमा से बंधे है या इससे आगे जा के भी सोच सकते है ? सच्चाई ये है कि सरकार और संविधान का अस्तित्व राष्ट्र और समाज के लिए होता है। संविधान के प्रावधान सिर्फ सरकार को परिभाषित करते है, राष्ट्र और समाज को  नही। स्पष्ट है कि संविधान हमारी सार्वजनिक चिंतन का अंतिम छोर नही हो सकता।

इस चक्र को तोड़ने के लिए मधेशी दल बने। संस-१ मे फोरम को ६७८३२७ मत मिलें तो संस-२ में २१२७३३। तमलोपा को संस-१ में ३३८९२० और संस-२ में १८०४३५ मत मिलें। सदभावना को संस-१ में १६७५१७ और संस-२ में १३३५२१ मत मिलें। तीनो मधेशी दल के मत मे भारी गिरावट आइ अगर फोरम से अलग हुए दलों को जोड़ा जाए तो फोरम( लो)
२६६२७६, रामसपा ७८६८०, फोरम(ग) ३२०३१, त म फोरम ११२९६ यानी संयुक्त फोरम को ६०२०१६ मिले जो संस-१ के बराबर ही है। तमलोपा से अलग हुए तमसपा ६५४६७ को जोडे तो २४५९०२ हुआ। सदभावना में संघीय सदभावना को जोडे तो १६०३५० मत होता है। इससे स्पष्ट है की दल टुटने से ये कमजोर हुए है और अपने अस्तित्व बचाने के लिए नए गठजोड़ आवश्यक है।

अभी एकीकरण का फैशन चल रहा है, वह माओवादी का हो, राप्रपा का हो, चुरेभावर का हो अनुभव बताते है अस्वस्थ एकीकरण मजबूती के बजाए गुटबाजी और अन्तरकलह को जन्म देते है।
फोरम नेपाल को संयोगवश पहला मधेस विद्रोह मे नेतृत्व का श्रेय प्राप्त हुआ ।  संस-१ के निर्वाचन मे फोरम नेपाल संसद और संविधान सभा मे चौथा बडा शक्ति के रूप मे उभरा । परन्तु, कुछ ही समय के वाद यह पार्टी नेपाल सद्भावना पार्टी के तरह ही मधेशियों के प्रति विभेद, उत्पीडन और शोषण के खिलाफ संघर्ष करने के बजाय, अपने उद्देश्य से विमुख होकर जातिवादी राजनीति, उपेन्द्र यादव का सत्ता के प्रति अन्ध आशक्ति और उनके द्वारा ही गुटबन्दी का सिर्जना, मधेश के  मुद्दा का परित्याग, संगठन को निजी भोग-विलास के साधन जुटाने का माध्यम मे रूपान्तरित करना- इस प्रकार कूकृत्य को प्राथमिकता देने से यह पार्टी नीतिगत रूप से दिशाहीन और विचलित हो गयी । उपेन्द्र यादव ने फोरम के अनेकन् स्थापनाकालीन नेता जैसे आर.डी. आजाद, रामरिझन यादव, डा. महानन्दठाकुर, जय प्रकाश गुप्ता, महादेव साह, भीम राजवंशी, परमानन्द मेहता, डा. शिवशंकर यादव, राम प्रसाद साह, नेवालाल यादव, भाग्यनाथ गुप्ता, सुरेन्द्रसाह, डा. मनोज सिंह, कृष्ण बहादुर यादव लगायत इसी तरह बाद में जुडे सीतानन्दनराय, अमर यादव, किशोर विश्वास, जितेन्द्र सोनल, राम कुमार शर्मा, उपेन्द्र झा समेत को दुध की मक्खी के तरह फेकंते गए । अल्प समय मे बारम्बार विभाजित यह पार्टी अब एक बिजातीय सता समिकरण के तहत अपना नाम, इतिहास एवं साख को समाप्त किया हैं ।

विगत कइ महिनो से फोरम का तमलोपा से एकिकरण का प्रयास चल रहा था ।  उपेन्द्र यादव तथा महन्थठाकुर ने इस प्रगति को गर्व के साथ स्वीकार करते हुए संचार माध्यम मे दिखे थे । यह अन्जाम नही पा सका । उपेन्द्र को महन्थ ठाकुर का ब्रम्हण जातीय नेतृत्व स्वीकार करने में झिझक हुइ और महन्थ ठाकुर का सदैव का प्रजातन्त्रवादी–गैर कम्युनिष्ट दर्शन उपेन्द्र यादव को पसन्द न आया। एक दुसरे के साथ काम नही कर सके । जब कि एक मधेश प्रदेश की मान्यता को ही जड से अस्वीकार करने बाले सदैव कम्युनिष्ट पृष्ठभूमि के अशोक रार्इ को गले लगाया । इस से भी आगे सदैब खस राज्य सता को दोषी देखनेबाले उपेन्द्र यादव एक खसवादी पार्टी को भी नए दल मे सहभागी कराया । एकीकरण घोषणा सभा मे उपेन्द्र यादव ने गर्व से कहा कि अब उन का दल संसद का पांचवा शक्ति बन गया हैं । जाहिर है की, यह एकीकरण मधेस के लिए नही हुआ है, परन्तु सता ही इस कार्य का ध्येय है ।

        एकीकरण घोषणा के बाद से ही असहमति दिखने लगी है। एक कार्यक्रम मे उपेन्द्र यादव और अशोक राई अलग-अलग तरीके के सम्बोधन करते दिखें। मधेश विद्रोह और मधेश के मांग को अशोक राई नकारते दिखे है। संसदीय दल के नेता में अशोक राइ के नाम पर सहमति तो हो गइ, लेकिन उपेन्द्र यादव पुराने जख्म से सबक लेते हुए संस. दल का नेता अशोक राइ को नही देने वाले। फोरम नेपाल में उपेन्द्र यादव से विरोध करके बहुत नेता अशोक राइ के दल मे गए थे, उन्हें फिर नए दल तलाशने होगे। यह बेमेल एकीकरण एक और विभाजन की शुरुआत है। इस एकीकरण में दल तो मिले, लेकिन दिल मिलने की गुंजाइश दुर-दुर तक नहीं।

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