मधेश को पहाड़ समझ में आना चाहिए और पहाड़ के मधेश- युवराज चौलागाई

युवराज चौलागाई

युवराज चौलागाई

युवराज चौलागाई नेकपा माओवादी केन्द्र के युवा नेता हैं । पार्टी के भीतर उनकी जिम्मेदारी पोलिटव्युरो सदस्य तथा विदेश विभाग सचिव के रूप में है । अन्तर्राष्ट्रीय मामले के जानकार चौलागाई नेपाल–भारत–चीन सम्बन्ध में भी विशेष रुचि रखते हैं । इसीलिए समसामयिक राजनीतिक विषय और नेपाल–भारत–चीन सम्बन्ध में केन्द्रित रह कर हिमालिनी सम्वाददाता लिलानाथ गौतम ने युवराज चौलागाई के साथ बातचीत की है । प्रस्तुत है, बातचीत का सम्पादित अंश–
० प्रमुख राजनीतिक दल दावा कर रहे हैं कि अगामी चैत्र महीने में स्थानीय निकायों का निर्वाचन हो जाएगा, लेकिन उसके लिए महत्वपूर्ण शर्त बन रहा है– संविधान का संशोधन और वह हो नहीं पा रहा है, क्यों ? राजनीतिक दलों के बीच क्या हो रहा है ?
– जनता द्वारा किए गए वर्षों का संघर्ष और उससे निर्मित संविधानसभा द्वारा घोषित पहला संविधान है, आज का संविधान । इसलिए इस में कुछ कमी और त्रुटियाँ हो सकती हैं । इस को अधिक सर्वस्वीकृत और जनमुखी बनाने के लिए हम लोगों को कुछ ज्यादा ही मेहनत करना पड़ सकता है । इसीलिए वर्तमान सरकार ने संविधान संशोधन और निर्वाचन को प्राथमिक राजनीतिक कार्यभार के रूप में सूचिकृत किया है । इसके लिए प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड कोशिश कर रहे हैं । विशेषतः पहचान में आधारित राजनीति करनेवाले मधेशवादी और जनजाति की मांग को सम्बोधन करना है, इसी मान्यता अनुसार हम लोग आगे बढ़ रहे है । औपचारिक÷अनौपचारिक विचार विमर्श और अन्तरक्रिया भी जारी है । निश्चित रहिए, अब कुछ ही दिन में संविधान संशोधन का प्रस्ताव संसद् में पंजीकृत होनेवाला है ।
० लेकिन चैत्र में तो निर्वाचन सम्भव नहीं है ! है न ?
– निर्वाचन एक प्राविधिक विषय है । निर्वाचन आयोग भी इस में काम कर रहा है । आयोग कह रहा है कि चैत्र में निर्वाचन सम्भव है । निर्वाचन के लिए निर्वाचन क्षेत्र, गाँवपालिका तथा नगरपालिका की सीमांकन तथा स्थानीय निकायों की संरचना नहीं बन पाई है । साथ में निर्वाचन के लिए आवश्यक कानून भी नहीं बना है । जब इस तरह का प्रविधिक कार्य पूरी हो जाएगा, तब निर्वाचन की तिथि तय हो पाएगी । चैत्र में निर्वाचन नहीं होगा, यह तो अभी स्पष्ट नहीं हो रहा है । मेरे विचार में चैत्र में निर्वाचन सम्भव है ।
० प्रविधिक काम पूरा करने के लिए भी संविधान–संशोधन होना जरूरी है । बिना संशोधन क्या चुनाव हो पाएगा ?
– संविधान–संशोधन बिना तो चुनाव सम्भव नहीं है । हमारे पास अभी भी ५–६ महीने का समय बाकी है । अगर तीव्र गति में काम करते हैं तो निर्वाचन सम्भव है । उसके लिए महीने का हिसाब नहीं, घण्टे के हिसाब से काम करना पड़ेगा । साथ में संविधान के प्रति असन्तुष्ट मधेशी मोर्चा तथा सत्ता से बाहर रहे प्रतिपक्ष दल, सभी को जिम्मेदार होना आवश्यक है । सरकार चाहती है, लेकिन अन्य राजनीतिक दल उसको सहयोग करने में इन्कार करते हैं तो काम नहीं भी हो सकता है । विशेषतः मधेशी मोर्चा को भी वार्ता में रहते वक्त अधिक जिम्मेदार और लचीला होकर प्रस्तुत होना चाहिए ।
० मधेशी मोर्चा के साथ क्या बात हो रही है, बात कहा“ नहीं बन रही है ?
– मुख्य विवाद तो संघीयराज्य का सीमांकन ही है । इसीतरह निर्वाचन पद्धति, नागरिकता सम्बन्धी प्रावधान भाषा सम्बन्धी विषय आदि में भी बात नहीं बन रही है । लेकिन सीमांकन के अलवा अन्य मुद्दा उतना जटिल नहीं है, अगर सीमांकन में बात बन जाए तो अन्य विषय में यूं ही सहमति हो सकती है । राष्ट्रीयसभा में हर प्रदेश से कितने लोगों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए ? इसमें कुछ विवाद दिखाई दे रहा था । विशेषतः मधेशवादी दल जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व मांग कर रहे थे । अगर ऐसा करते हैं तो कम जनसंख्या वाले हिमाली प्रदेश प्रतिनिधि विहीन होने की सम्भावना है । इसीलिए निश्चित संख्या, सभी प्रदेश को समान रूप में प्राप्त होगी । बाँकी जनसंख्या के आधार में बटवारा किया जाएगा, यह बात तय हो चुकी हैं । भाषा और नागरिकता के सम्बन्ध में भी सहमति बन चुकी है । औपचारिक रूप में सार्वजनिक नहीं होना अलग बात है । क्योंकि सभी चाहते है कि समग्र विषयों में सहमति बने और उस को सार्वजनिक करें ।
० सीमांकन सम्बन्धी मुद्दा को कैसे समाधान किया जा सकता है ? विकल्प क्या–क्या हो सकता है
– बहुत विकल्प में बहस हो रही है । जिला को खण्डित करने से लेकर सात प्रदेश से आठवें प्रदेश तक बनाने की बहस भी होती है । साथ में कुछ जिला को विवादित मान कर आयोग बनाने की बात भी हो रही है । लेकिन अन्तिम निर्णय नहीं हुआ है । मेरे विचार में पश्चिम में थारु बहुल कलस्टर को मिलाना पड़ेगा । थारु–बहुल जो ५ नम्बर प्रदेश है, वह भूभाग पहाड़ी से जुड़ा हुआ है, उस में परिवर्तन करना चाहिए । उसी तरह मगर–बहुल क्षेत्र को ४ और ५ नम्बर प्रदेश में विभाजित किया गया है, मगर–बहुल भूमि भी एक ही प्रदेश में होना चाहिए ।
लेकिन इसमें कुछ जटिलताएं दिखाई दे रही हैं । सभी राजनीतिक पार्टी के भीतर क्षेत्रीय तथा स्थानीय राजनीति करनेवालों की सक्रियता बढ़ गई है । राष्ट्रीय चिन्तन से ज्यादा क्षेत्रीय तथा स्थानीय चिन्तन हावी हो रही है । वे लोग चाहते हैं कि स्थानीय राजनीति में अपनी पकड़ बनी रहे । इसी कारण कुछ समस्या दिखाई दे रही है । अभी सुदूर–पश्चिम और सुदूर–पूर्व के सम्बन्ध में जो समस्या दिखाई देती है, यह नेताओं की व्यक्तिगत अह्म के कारण ही सृजित हो रही है । इस में नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले के बड़े–बड़े नेताओं का नाम भी जुड़ा हुआ है ।
० इस सम्बन्ध में माओवादी केन्द्र के नेता भी कहा“ कम है ? वो लोग भी तो जुड़े हुए हैं ?
– कह चुका हूँ कि ऐसे व्यक्ति हर राजनीतिक पार्टी में बढ़ रहे है । वे लोग क्षेत्रीय तथा स्थानीय स्वार्थ के अनुसार काम करना चाहते हैं । मुलभूत रूप में माओवादी के अन्दर अन्य पार्टी की तरह ज्यादा जटिलता नहीं है । अगर पार्टी निर्णय करता है तो वहाँ व्यक्ति हावी नहीं हो सकता । अन्य पार्टी में ऐसा नहीं है । यहाँ हम सभी को स्पष्ट होना चाहिए कि स्थानीय एवं जातीय पहचान सम्बन्धी मुद्दा सिर्फ मधेशी और जनजाति का नहीं है । मधेशी और जनजाति का हक–अधिकार और पहचान के लिए लड़नेवाले सबसे पुरानी पार्टी है– माओवादी । दूसरे संविधानसभा निर्वाचन में माओवादी का नारा और मुद्दा ही था– पहचान में आधारित संघीयता होना चाहिए । प्राविधिक गड़बड़ी के कारण हमारी पार्टी संसद् में तीसरी शक्ति बन गयी, जिसके चलते उक्त मुद्दा स्थापित नहीं हो सका । लेकिन मुद्दा समाप्त नहीं हुआ है । व्यवहारिक राजनीति में आज ही सभी मांग और मुद्दा सम्बोधन होनेवाला भी नहीं है, इस सत्य को स्वीकारना होगा । इतना होते हुए भी संविधान संशोधन के जरिए पहचान सहित के संघीय राज्य स्थापना करने लिए प्रयत्नशील होना ही पड़ेगा । इसीलिए पहचान में आधारित राजनीति करनेवाले मधेशवादी हो अथवा जनजाति, सभी पार्टी वर्तमान सरकार से निकटता की अनुभूति कर रहे हैं ।
० लेकिन संशोधन प्रस्ताव दर्ता करने की तारीख तो बार–बार परिवर्तन होता जा रहा है ?
– इस को इतना निराशाजनक हो कर व्याख्या करना नहीं चाहिए । सिर्फ तीन महीनों से प्रचण्ड प्रधानमन्त्री हैं । इस तीन महीने की अवधि में बहुत काम हुआ है । प्रधानमन्त्री का भारत भ्रमण से लेकर विभिन्न राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र सम्बन्धी काम हो रहा है । विभिन्न समूह में विभाजित मधेशवादी दलों के साथ विचार–विमर्श भी जारी है और सहमति करीबी हैं । इस को सामान्य रूप में नहीं लेना चाहिए ।
० पिछली बार लोकमानसिंह कार्की (महाअभियोग) प्रकरण सामने आया । इस प्रकरण को संविधान–संशोधन से जोड़ कर भी बहस किया गया । महाअभियोग प्रकरण के कारण ही संविधान संशोधन में व्यवधान तो नहीं हो रहा है ?
– यह तो अनावश्यक बहस है । लोकमानसिंह कार्की को महाअभियोग सहित कारवाही करना और संविधान संशोधन होना विल्कुल अलग विषय है । इन दो विषयों के बीच कोई भी सम्बन्ध नहीं है । कार्की को महाअभियोग लगा कर कारवाही करना संविधान–प्रयोग की बात है और राज्य की नियमित कामकारवाही भी है । और संविधान का संशोधन, राजनीतिक काम है । इसीलिए इसको जोड़कर व्याख्या करना राजनीतिक ईमानदारिता नहीं हो सकती ।
० सीमांकन सम्बन्धी मुद्दा में सिर्फ नेपाल के राजनीतिक दलों का ही नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति केन्द्र का स्वार्थ भी जुड़ा हुआ है, ऐसे कहनेवाले भी हैं । माओवादी केन्द्र के विदेश–विभाग सचिव के नाते क्या खयाल है आप को ?
– नेपाल के राजनीतिक दलों ने संघीयता को जिस तरह बहस में लाया, वह समाधानमुखी बहस नहीं था । यहाँ तो शुरु से ही एक नेपाल को कितने नेपाल में बटवारा करना है ? इस तरह बहस की सिर्जना की गयी । एक जाति के विरुद्ध दूसरे जाति, एक भौगोलिक क्षेत्र के विरुद्ध दूसरे भौगोलिक क्षेत्र को खड़ा कर बहस किया गया । यह गलत था । केन्द्रिकृत राज्यसत्ता में निहित अधिकार को कैसे जनता की बीच में पहुँचाया जाए और जनता को अधिकार सम्पन्न बनाया जाय ? इस विषय में केन्द्रित रह कर बहस होना चाहिए था । लेकिन हमारी बहस देखने से लगता था कि हम लोग देश विभाजन करने जा रहे हैं । यह रचनात्मक नहीं, ध्वंसात्मक बहस था ।
० अभी हाल का जो २ नम्बर प्रदेश है, उस में भारत और ५ नम्बर प्रदेश में भारत और चीन का स्वार्थ जुड़ा हुआ है, ऐसा कहने वाले भी हैं । इस में क्या कहते है ?
– नेपाल का संघीय राज्य कैसा हो सकता है ? इस सम्बन्ध में भारत और चीन दोनों देशों के मित्र मुझसे जिज्ञासा रखते थे । लेकिन उन लोगों ने कभी भी कोई दबाव नहीं दिया है । आफिसियली रूप में अभी तक किसी ने भी नहीं कहा है कि नेपाल में ‘ऐसा ही संघीय राज्य होना चाहिए । ’ न जाने क्यों यहाँ इस तरह की बात होती रहती है । नेपाल एक स्वतन्त्र और सार्वभौम संघीय राज्य है । एसिया महादेश के सबसे पुरानी देश में से एक है– नेपाल । जिस समय भारत नाम की देश अस्तित्व में नहीं था, उस समय में भी नेपाल नामक देश का अस्तित्व था, यह प्रमाणित सत्य है । अभी तक नेपाल कोई भी देश का उपनिवेश भी नहीं बना है । यह बात हमारे दोनों पड़ोसी मित्र जानते हैं । इसीलिए यहाँ कितना और किस तरह का संघीय राज्य बनाना है, उसका निर्णय हम खुद करेंगे ।
हाँ, दोनों पड़ोसी के साथ हमारी सम्वेदनशीलता जुड़ी हुई है । उस में ध्यान देना ही चाहिए । लगभग १८ सौ किलोमिटर नेपाली भू–भाग भारत से जुड़ा हुआ है और वहाँ खुली सीमाएं हैं । जिसके चलते हमारी थोड़ी लापरवाही के कारण भारतीय सुरक्षा और सीमा क्षेत्र में रहनेवाले भारतीय नागरिक को तकलीफ पहुँच सकती है । इस बात में हमारी सतर्कता होना चाहिए । उसी तरह चीन के तिब्बत के साथ हमारा हिमाली क्षेत्र जुड़ा हुआ है । उस सीमा का गलत प्रयोग करते हुए चीन के विरुद्ध कोई गतिविधि न हो, इसके लिए नेपाल को सतर्क रहना चाहिए । इसके अलावा अन्य कोई भी मुद्दा में पड़ोसी का दखलअन्दाजी हमारे लिए स्वीकार नहीं हो सकता ।
० ऐसा है तो सीमांकन सम्बन्धी मुद्दा में पड़ोसी को जोड़ कर हमारे राजनीतिक दल क्यों आपस में लड़ते है ?
– पहली बात तो यह है कि हम लोग संघीयता सम्बन्धी बहस को सही दिशा नहीं दे पाए हैं । राज्य शक्ति को बाटा नहीं जा रहा, एक नेपाल को बाटा जा रहा है, कुछ ऐसे ही ढंग से बहस किया गया । संघीयता को समझने वालो और समझाने वाले दोनों की क्षमता कमजोर दिखाई पड़े, जिसके चलते आन्तरिक विवाद बढ़ गया । हमारी यही कमजोरी को देखकर कुछ बाह्य शक्ति भी सक्रिय होने लगे । जहाँ अच्छा–बुरा दोनों था । लेकिन हम लोगों का ध्यान सिर्फ बुराइयों में अटक गया । संक्षेप में बात इतनी ही है कि सीमांकन हम खुद करेंगे, दूसरा कोई नहीं । उदाहरण के लिए मधेश आन्दोलन को ले सकते हैं । मधेश आन्दोलन और मधेश प्रदेश का सीमांकन, उस क्षेत्र में रहनेवाले जनता की मांग है, विदेशी की नहीं ।
० ऐसा है तो मधेश क्षेत्र को ही क्यों भारत के साथ जोड़कर देखा जाता है । इस तरह पड़ोसी को आरोप लगाना और विवाद में घसीट कर लाना ठीक है ?
– इस मुद्दा को भारत के साथ जोड़कर बहस करना ठीक नहीं है । अगर भारत जुड़ना चाहता है तो वह भी ठीक नहीं है । क्योंकि यह नेपाल का आन्तरिक मामला है । दूसरी बात, भारत एक विशाल और शक्तिशाली राष्ट्र है । जिसके साथ हमारा सदियों से मित्रवत सम्बन्ध है । इसीलिए नेपाल के एक खास क्षेत्र और समुदाय के साथ ही भारत अपना सरोकार रखता है, इसका विश्वास मुझे नहीं है । अगर ऐसा है तो वह नेपाल के हित में नहीं हो सकता और भारत के हित में भी नहीं । मधेश, नेपाल का भू–भाग है । इसलिए मधेश के साथ नहीं, नेपाल के साथ सम्बन्ध रखना चाहिए, यह बात भारत समझता है ।
हाँ, हमारी कुछ राजनीतिक पार्टी और उनके नेता मान सकते हैं कि भारत के आशीर्वाद से ही मैं नेपाल में राजनीति कर पाऊँगा । लेकिन यह सोच गलत हैं । मधेश में जो आन्दोलन हुआ है, ‘उस में भारतीय चाहना अन्तरनिहित है’ कह कर समझने वाले भी हैं । यह भी गलत सोच हैं । वहाँ का आन्दोलन सिर्फ भारतीय चाहना नहीं थी । आन्दोलन के क्रम में लाखों मधेशी जनता सड़क पर आए हैं, दर्जनों ने अपनी जान गवांयी है । अधिकार के लिए किए गए इस आन्दोलन को सिर्फ भारत के साथ जोड़ कर देखना राजनीतिक बेइमानी है । इस तरह पड़ोसी को विवाद में घसीटना ठीक नहीं है । इतना होते हुए भी एक बात तो सच है कि भारत का एक छोटा सा अंश एवं पक्ष नेपाल को प्रभावित करने के लिए अघोषित रूप में सदैव लगे रहते हैं । ऐसी हरकत भारत सरकार की तरफ से औपचारिक रूप में नहीं होता है । ऐसी अवस्था अन्त करने के लिए भारत सरकार को ही पहल करनी होगी ।
एक और बात, अब मधेशी नेता सिर्फ मधेश को ही समझ लें, यह नहीं हो सकता । उन लोगों को पहाड़ को भी समझना चाहिए । पहाड़ मधेशियों का भी है । पहाड़ को मधेश समझ में आना चाहिए, मधेश को पहाड़ समझ में आना चाहिए । तब हम समस्या का सही समाधान ढूढ पाएंगे । सच में ही राजनीति करना है तो अब मधेशी नेताओं को पहाड़ जाना ही होता है । जिस तरह प्रमुख और राष्ट्रीय कहलाने वाले राजनीतिक दलों का संगठन हिमाल, पहाड और मधेश में समान है, उसी तरह मधेश में राजनीति करनेवाले पार्टियों का संगठन भी पहाड़ और हिमाल में होना चाहिए ।
० पिछले महीने प्रधानमन्त्री पुष्पकल दाहाल प्रचण्ड भारत भ्रमण में थे, उस वक्त भारत के साथ जो २५ सूत्रीय सम्झौता हुआ है, उसके चलते ‘नेपाल का परराष्ट्र नीति भारत–परस्त हो गया है’ कह कर आरोप लगाने वाले भी है ! क्या कहते है ?
– नेपाल–भारत सम्बन्ध को लेकर समय–समय, इस तरह की बहस होती रहती है । इसीलिए नेपाल–भारत के बीच ऐसी क्या समस्या है, इस के बारे में दोनों देशों के बीच वृहत रूप में औपचारिक बहस होनी आवश्यक है । आफिसियल रूप में औपचारिक बहस करके समस्या समाधान न करने के कारण ही इस तरह का विवाद आता रहता है । इसके लिए दोनों देशों को जिम्मेवार होना आवश्यक है । विशेषतः सीमा विवाद और इतिहास में हुए सम्झौता को मध्यनजर करते हुए दोनों देशों के बीच प्रबुद्ध समूह भी गठन हुआ है । उक्त समूह अपना काम कर रही है ।
० क्या २५ सूत्रीय समझौता के कारण हमारी परराष्ट्र नीति में कोई असर नहीं आया है ?
– २५ सूत्रीय सम्झौता के अन्दर जो ११ नम्बर का बुँदा है, शायद उसी में केन्द्रित होकर आप यह प्रश्न पूछ रहे हैं । हाँ, इसके सम्बन्ध में नेपाल में काफी बहस और आलोचना हुआ है । मुझे लगता है सिर्फ ११ नम्बर बुँदा में ध्यान केन्द्रीत करने से ऐसी समस्या आयी है । पहली बात, कोई भी दो राष्ट्र के सरकार प्रमुख बीच भेंट–वार्ता होती है और संयुक्त वक्तव्य जारी किया जाता है तो वहाँ दोनों देशों के बीच समान धारणा बनाने का प्रयास होता है, यह कोई गलती भी नहीं है । सिद्धान्तः ऐसा होता है । नेपाल और भारत के प्रधानमन्त्री बीच भी वही हुआ । भारत और चीन एवं भारत और युरोपियन मुल्क के बीच हुई मुलाकात और जारी संयुक्त वक्तव्य को आप देखते हैं तो वहाँ भी ऐसा ही हुआ है । दूसरी बात, ११ नम्बर में जो लिखा है, उस का आशय संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के प्रतिनिधित्व से जुड़ा हुआ है । पूरा वाक्य पढ़ने से पता चलता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के स्थायी सदस्यता के लिए भारत और नेपाल समान दृष्टिकोण रखते हैं । इसीलिए इस की अन्यथा व्याख्या करना न्यायोचित नहीं है । उक्त सम्झौता के बाद अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रम में जो बदलाव आया है, उससे भी यह पुष्टि हो चुकी है । सार्क सम्मेलन स्थगन सम्बन्धी सन्दर्भ को उदाहरण के रूप में लिया जा सकता है । १९वाँ सार्क सम्मेलन पाकिस्तान में होने जा रहा था । लेकिन भारत ने घोषणा किया कि पाकिस्तान के कारण हम उस सम्मेलन में सहभागी नहीं हो पाएंगे । साथ में सार्क में आवद्ध चार मुल्कों के साथ भारत ने गुटबन्दी किया, उन सभी राष्ट्रों ने भारत के साथ समान दृष्टिकोण बना लिया । लेकिन क्या नेपाल ने उसमें समान दृष्टिकोण बनाया ? नहीं । इसीलिए यह ताजा घटना प्रमाणित करती है कि उक्त सम्झौता संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की सहभागिता को लेकर हुई है ।
० सिर्फ २५ सूत्रीय ही नहीं, भारत के साथ किए गए प्रायः हर समझौता को लेकर उसके विरुद्ध नेपाल में बहस किया जाता है । क्यों ?
– नेपाल का कोई भी प्रधानमन्त्री अगर भारत जाता है तो नेपाली जनता को आशंका रहती है कि वह कोई गलत समझौता न करे, यह अस्वाभाविक नहीं है । इतिहास में नेपाल–भारत बीच जो गलत सन्धी–समझौता हुआ था, उसके कारण ऐसी आशंका होती रहती है । भारत के साथ किया गया हर समझौता गलत नहीं, लेकिन विरोध करने का गलत संस्कार नेपाल में हैं । हमारी इस आदत को सुधार करना चाहिए । साथ में विगत में भारत के साथ जो गलत समझौता हुआ है, उस में पुनर्विचार और संशोधन होना जरूरी है । नेपाल में भारत–विरोधी भावना क्यों विकासित हो रही है ? इस प्रश्न में भारत को भी गम्भीर होना चाहिए । मुझे लगता है इसके पीछे कुछ कारण है– जैसे कि,
नेपाल–भारत बीच सन् १९५० में किया गया समझौता और उसके बाद विभिन्न समय में हुए व्यापार–पारवहन सम्बन्धी समझौता को लेकर नेपाली जनता सन्तुष्ट नहीं है । इस को पुनरावलोकन होना चाहिए । दो सार्वभौम देशों के बीच स्वतन्त्र सम्झौता के रूप में इसको विकास करना चाहिए । दूसरी बात, नेपाल–भारत बीच सीमाओं की समस्या वर्षों से जारी है । सीमा क्षेत्र में १४८ जगह नेपाल का भू–भाग अतिक्रमित हुआ है, ऐसी अनुभूति नेपाली जनता कर रही है । सुस्ता, कालापानी और पिछली बार लिपुलेक का विवाद सबसे ज्यादा चर्चित है । इन विषयों पर नेपाल–भारत के अधिकारी बीच बहस भी हो रही है । मेरी जानकारी के अनुसार सीमा सम्बन्धी समस्या समाधान ९८ प्रतिशत हो चुका है, इस में दोनों देशों के पदाधिकारी राजी हो चुके हैं । लेकिन हस्ताक्षर नहीं हुआ है । सम्पूर्ण विवाद समाधान करने के बाद ही हस्ताक्षर किया जाएगा, ऐसी जानकारी आई है । मुझे लगता है– ऐसे विवादित विषयों को जितना जल्द हो सके समाधान करना चाहिए । इसके लिए भारत को ही ज्यादा पहल करनी चाहिए । क्योंकि नेपाल की तुलना में भारत विशाल और शक्तिशाली भी है ।
तीसरा कारण, व्यापार, आर्थिक सहायता, सहयोग और विकास निर्माण से सम्बन्धित है । नेपाल और भारत के बीच जो व्यापार है, उसमें थोड़ा सा नजर डालिए । भारत के साथ नेपाल का व्यापार–घाटा हर साल बढ़ रहा है, यह चिन्ताजनक अवस्था में पहुँच चुका है । साथ में हमारा व्यापार भारत के साथ परनिर्भर हो रहा है । नेपाली जनता के लिय यह दुःख की बात है । इसको सुधार करने के लिए भी भारत को पहल करना होता है । उसके सहयोग बिना हमारा व्यापार–घाटा कम नहीं हो सकता । इसी तरह भारत सरकार द्वारा घोषित आर्थिक सहयोग सम्बन्धी प्रतिवद्धता सिर्फ कागजों में सीमित नहीं होना चाहिए । उसका व्यावहारिक कार्यान्वयन हम चाहते है । जैसे कि नौमुरे जल विद्युत आयोजना वर्षों से अटका हुआ है । पञ्चेश्वर जलविद्युत आयोजना की अवस्था भी वैसी ही है । हुलाकी राजमार्ग कब बनेगा, इसका पता नहीं है । जल विद्युत लगायत नेपाल के अधिकांश बड़े–बड़े आयोजना भारतीय कम्पनी ने लिया है । बड़े–बड़े ठेक्का–पट्टा में भी भारतीय कम्पनी ही आगे है । लेकिन समय में सही ढंग से काम पूरा किया गया है, ऐसा इतिहास नहीं है । भारतीय कम्पनी द्वारा होल्ड होने के कारण कोई दूसरा कम्पनी, उस में काम नहीं कर पाता । इस तरह आयोजना रोक कर रखने से हमारा विकास अवरुद्ध हो रहा है । कुछ ऐसे ही कारण है, जो नेपाली जनता में भारत विरोधी भावना को बढ़ावा देता है । इस में गम्भीर समीक्षा की आवश्यकता है ।
चौथी, जो सबसे ज्यादा चर्चा में भी है । नेपाल में एक आम विश्वास है कि भारत, नेपाल में ‘सुक्ष्म व्यवस्थापन’ करना चाहता है । सीमा और अर्थ व्यवस्था में ही नहीं, भारतीय का हस्तक्षेप सिंहदरबार तक है । नेपाली जनता में भारत के प्रति ऐसी तरह का राजनीतिक चेतना विकसित हो रही है ।
० नेपाल में भारतीय प्रभाव, भारत के कारण होता है कि नेपाली नेताओं की असक्षमता के कारण ?
– इस में सिर्फ भारत ही दोषी है, ऐसा नहीं है । कुछ सन्दर्भ में हमारी भी कमजोरी है । लेकिन जनता समझती है कि भारत ही नेपाल को अपने प्रभाव में रखना चाहता है । मेरे कहने का मतलब है– आम जनता में ऐसा मनोविज्ञान क्यों मजबूत होता जा रहा है ? इस प्रश्न में भारत के साथ हमें भी सचेत होना चाहिए । साथ में समस्या समाधान के लिए नेपाली राजनीतिक दलों में भी प्रतिवद्धता, इच्छा शक्ति, नेतृत्व और भीजन होना जरूरी है ।
बड़े दुःख के साथ यहाँ और एक बात कहना चाहता हूँ– नेपाल को अपने प्रभाव में रखने की चाह से भारत में एक समूह सक्रिय है, जो सन् १९४७ की औपनिवेशक मानसिकता रखती है । खासकर यह समस्या भारत की व्युरोक्रेसी में है । राजनीति के एक लेभल में भी यह समस्या है । यही चिन्तन के प्रति नेपाली जनता दुःख प्रकट कर रहे है । अगर नेपाल–भारत सम्बन्ध को अधिक उँचाई देना और विवाद रहित बनाना चाहते है तो औपनिवेशक चिन्तन से बाहर आकर भारत को सोचना जरूरी है ।
यहाँ एक दूसरा प्रसंग भी सान्दर्भिक है– भारत और चीन की जनसंख्या को इकठ्ठा करके देखे तो यह संख्या, विश्व जनसंख्या का लगभग ४० प्रतिशत होता है । १२८ करोड़ भारत की जनसंख्या है, १४० करोड़ चीन का है । अनुमान किया जा रहा है कि आगामी ५–७ साल के बाद भारत, विश्व जनसंख्या में भी लीड करनेवाला है । दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य– विश्व में सबसे ज्यादा क्रियाशील और उत्पादनशील युवा जनशक्ति भारत के साथ ही है । समग्र आर्थिक अवस्था में चीन आगे तो है, लेकिन आर्थिक वृद्धिदर में चीन से आगे भारत है । इसका मतलव होता है– विश्व अर्थतन्त्र का लीडरशीप दक्षिण एसिया में आ रहा है । बात साफ है कि उस का नेतृत्व भारत या चीन के हाथ होने वाला है । विश्व अर्थतन्त्र में इस तरह प्रतिस्पर्धात्मक रूप में आगे आ रहे भारत को, नेपाल जैसे देशों के साथ छोटे–छोटे विषयों में विवाद करना सही नहीं है । नेपाल–भारत सम्बन्ध में अगर विश्वास का वातावरण नहीं बनेगा तो इसका दुष्परिणाम दोनों को भुगतना पड़ेगा है । इसीलिए मेरा कहना है कि नेपाल–भारत बीच जो विवाद होता आ रहा है, उसके समग्र पक्ष में भारत और नेपाल को सम्वेदनशील होना चाहिए ।
० भारतीय सञ्चार माध्यमों में भी कहा जाता है कि नेपाल, भारत को छोड़कर चीन की ओर निकट होने लगा है और इसमें दिल्ली चिन्तित हैं । आप को क्या खयाल है ।
– अगर नेपाल–चीन सम्बन्ध मजबूत बनता है तो इस में भारत को नाराज होने के लिए कोई कारण नहीं है । भारत को तो खुश होना चाहिए । क्या नेपाल को सिर्फ भारत के साथ ही अपना सम्बन्ध बनाया रखना चाहिए ? ऐसा तो हो ही नहीं सकता । एक स्वतन्त्र देश के लिए दोनों पड़ोसी देश, समान होते हैं । मैं चाहता हूँ भारत और चीन दोनों के साथ नेपाल का मजबूत सम्बन्ध कायम रहे । एक के साथ निकट और दूसरे के साथ दूर नहीं होना चाहिए । इस तथ्य को भारत और चीन दोनों को स्वीकार करना होगा । हाँ, कुछ भारतीय मित्र कभी कभार मुझसे भी दुःख प्रकट करते हैं कि नेपाल, चीन की ओर करीबी होते जा रहा है । लेकिन इस तरह समझना ठीक नहीं है । अभी हाल में भारत की गोवा में सम्पन्न ब्रिक्स सम्मेलन में भी नेपाल के प्रधानमन्त्री पुष्पकमल दाहाल प्रचण्ड ने भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी तथा चीन के राष्ट्रपति सी जीङ पिङ के साथ यही बात स्पष्ट कह दिया है । उन्होंने कहा है कि भारत, चीन और नेपाल आपसी विवाद में नहीं, त्रिदेशीय सहकार्य और साझेदारी के साथ आगे बढ़ना चाहिए । त्रिदेशीय साझेदारी के लिए नेपाल सदैव उत्सुक और प्रयत्नशील भी हैं ।
० कुछ लोग तो कहते है कि त्रिदेशीय सझेदारी तथा सहकार्य के लिए भारत इच्छुक नहीं है । इसके बारे में आप को कुछ पता है ?
– आफिसियल बातचीत में तो भारत, चीन और नेपाल तीनों देशों के मित्र, इसमें सहमत हैं । लेकिन बाहर कहा जाता है कि भारत उसमें सहमत नहीं है । कुछ परिघटना को अध्ययन करें तो इसमें आशंका भी किया जाता है । उसके लिए गोवा में सम्पन्न ब्रिक्स सम्मेलन को ही ले सकते हैं । उक्त सम्मेलन में त्रिदेशीय सहकार्य के सम्बन्ध में बहस किया गया था । बहस को ही मध्यनजर करते हुए चीनी परराष्ट्र मन्त्रालय के प्रवक्ता ने स्वागत मन्तव्य जारी किया, लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया । यहाँ तक कि भारत का कहना है– इस सम्मेलन में त्रिदेशीय सहकार्य के सम्बन्ध में कोई भी बहस नहीं हुई है । लेकिन ब्रिक्स में सहभागी कुछ मित्र, इस कथन को स्वीकार नहीं करते हैं । इस घटना को देख कर कह सकते है कि त्रिदेशीय सहकार्य के लिए भारत इच्छुक नहीं है ।
० उसकी वजह क्या है ? कुछ जानते है आप ?
– हो सकता है– इसके पीछे कुछ मान्यता काम कर रही है । दूसरा कारण हो सकता है– आफिसियल काम ठीक समय में नहीं हो पाया है । नहीं तो नेपाल, भारत और चीन के बीच कोई संयुक्त कार्य नहीं हो, ऐसी मान्यता तो नहीं है । क्योंकि वर्षों से भारत–चीन के बीच कई मामलों में संयुक्त कार्य हो रहा है । साथ में वार्षिक अरबों डालर का व्यापार दो देशों के बीच होता आ रहा है । उस में एक छोटा सा देश नेपाल सहभागी हो जाता है तो उस में कैसे ऐतराज हो सकता है ?
० लेकिन भारत उत्साहित ना होने के पीछे कोई कारण तो हो सकता है ?
– पहले भी कह चुका हूँ कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्रविन्दु पश्चिमी देशों से एसियाई देशों में आ रहा है । क्योंकि जो भौतिक और मानवीय विकास होना चाहिए, वह पश्चिमी देशों में हो चुका है । अब की बारी हमारी (एसिया) ही है । इस क्षेत्र में विकास के लिए सम्भावित जगह और उत्पादनशील जनशक्ति दोनों है । चीन, भारत, जापान, कोरिया आर्थिक रूप में शक्तिशाली हो रहे है । उसमें भी प्रमुख राष्ट्र तो चीन और भारत ही है । कोई भी आशंका नहीं है कि कुछ दशक के लिए आर्थिक विकास का केन्द्रविन्दु एसियाई देश ही है । उसके लिए यहाँ नया–नया प्रयोग और विकास में काम हो सकता है । आर्थिक नेतृत्व के साथ–साथ एशिया राजनीतिक नेतृत्व भी करेगी । शीत युद्ध के बाद पहली बार विश्व राजनीति में इस तरह लीडरशीप परिवर्तन होता नजर आ रहा है । इस का नेतृत्व भारत अथवा चीन कौन करेगा ? इस में दो देशों के बीच विरोधाभास दिखाई देता है । वास्तव में यह विवाद भारत और चीन का नहीं है । यह तो पश्चिमी राष्ट्र और चीन का विवाद है । इसमें भारत का द्वैद्ध चरित्र दिखाई देता है । जिसके चलते यह विवाद चीन और भारत के जैसा दिखाई देता है । इसके पीछे कुछ कारण है– भारत का पेट चीन के साथ जुड़ा हुआ है तो सर पश्चिमी राष्ट्रों के साथ । अर्थात् अमेरिका और भारत के सोचने का तरीका समान है, लेकिन भारत का व्यापार निर्भरता चीन के साथ बढ़ रहा है । भारत चाहता है कि वह पश्चिमी राष्ट्र और चीन दोनों के साथ मिलकर विकास किया जाए । इसीलिए यह विरोधाभास हो रहा है । कुछ साल के लिए तो इसी तरह चल सकते हैं, लेकिन लम्बे समय के लिए ऐसा नहीं हो सकता ।
विश्व नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धी भारत और चीन के बीच भौगोलिक रूप में छोटा सा देश है– नेपाल । शक्तिशाली दो देशों के बीच उस का प्रभाव नेपाल में पड़ता है । आर्थिक रूप में सशक्त बन रहे इन राष्ट्रों के बीच नेपाल कमजोर और गरीब नहीं होना चाहिए । दोनों देशों की आर्थिक प्रगति से नेपाल कैसे फायदा ले सकता है, यह सोचने का समय आ चुका है । व्

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