मधेश देश का ही हिस्सा है : श्वेता दीप्ति

Shweta Deepti

श्वेता दीप्ति

आज जेहन को बार–बार एक सवाल परेशान कर रहा है, क्या सचमुच मधेश एक उपनिवेश ही है, या सिर्फ ये मधेशियों के दिमाग का फितुर । अगर उपनिवेश है, तो सत्तापक्ष जो कर रही है, बिलकुल सही है क्योंकि, उपनिवेश को कभी भी स्वतंत्र वायु में श्वांस लेने का अधिकार नहीं होता, या यूँ कहें कि उपनिवेश के शब्दकोश में स्वतंत्रता और अधिकार जैसे शब्द ही नहीं होता । वो बने ही होते हैं शोषित होने के लिए

आज जो मसौदा सामने आया है उसमें देश के एक अति महत्वपूर्ण हिस्से को ही मजाक बना दिया गया है । एक मुहावरा है, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना, जी हाँ कुछ ऐसा ही हुआ है नेपाल की राजनीति में भी

न्यायाधीश गिरिशचन्द्र लाल

न्यायाधीश गिरिशचन्द्र लाल

और स्वयं के अस्तित्व को नकार कर, खुद को मार कर, शासक वर्ग को संतुष्ट और खुश करने के लिए । किन्तु अगर राज्य यह मानता है कि मधेश नेपाल का ही हिस्सा है तो उसके साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों ? क्यों खसवादी मानसिकता मधेश को बार–बार दुत्कार रही है और खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चला रही है ?

सर्वोच्च के फैसले का मधेशीकरण , जान ने के लिए क्लिक करें

वक्त की नाजुकता को नहीं समझ कर देश के एक हिस्से को क्यों सुलगाया जा रहा है ? क्यों ये इस उक्ति को सच बना रहे हैं कि पहाड़ को सिर्फ मधेश चाहिए मधेशी नहीं ? मधेश आन्दोलन, मधेश के सपूतों का बलिदान, इसे महज सात वर्षों में भुला दिया गया । जिस आन्दोलन ने अंतरिम संविधान में संघीयता शब्द को जगह दिलाई थी उसे ही किनारे कर दिया गया और अफसोस तो यह कि इसमें वो भी शामिल हो गए जिनपर मधेश की जनता ने अपना विश्वास जताया था ।
मसौदा और हाशिए पर मधेश
चिर प्रतिक्षित संविधान का मसौदा हमारे सामने है । मसौदे में मधेश मुद्दा पूरी तरह हाशिए पर है । आलम ये है कि वर्षों के इंतजार के बाद अगर मधेश के हिस्से कुछ आया है तो वह है शिफर, शून्य । आन्दोलन और त्रासदीपूर्ण द्वन्द्ध के बाद जब २०७० में नेपाली काँग्रेस और नेकपा(एमाले) को दो तिहाई बहुमत प्राप्त हुआ और गौरतलब है कि मधेश की जनता ने भी इनपर भरोसा जताया और मधेशवादी दलों को नकारा, तभी यह उम्मीद जगी थी कि देश को एक सुव्यवस्थित, लोकतान्त्रिक जिसमें लोकतंत्र की मर्यादा का ख्याल रखा गया हो, जनता की भावनाओं का समावेश हो और जो सामाजिक न्याय पर आधारित हो ऐसा संविधान बहुत जल्द मिलने वाला है । किन्तु आज जो मसौदा सामने आया है उसमें देश के एक अति महत्वपूर्ण हिस्से को ही मजाक बना दिया गया है । एक मुहावरा है, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना, जी हाँ कुछ ऐसा ही हुआ है नेपाल की राजनीति में भी । प्रकृति ने विनाश का जो तांडव नेपाल की धरती पर खेला, जिसकी चोट से आज भी जनमानस त्रस्त है, उसी प्राकृतिक आपदा ने सत्ता के खिलाडि़यों का भाग्योदय कर दिया । जिस समय जनता कराह रही थी उस समय ये स्वार्थ की राजनीति में व्यस्त थे । संविधान की चाहत जनता को वर्षों से थी किन्तु आज जिस फास्ट ट्रैक का नाम देकर संविधान बनाने के नाम पर ये अपना भाग्य निर्धारण कर रहे हैं, उस फास्ट ट्रैक की आवश्यकता आहत जनता को थी जो आज भी खुले आकाश के नीचे जीवन बसर कर रहे हैं, भूख, धूप और मौनसून की मार झेल रहे हैं । स्वार्थ की पराकाष्ठा तो ऐसी है कि ये पहाड़ का ही दर्द भूल गए हैं, तो ऐसे में मधेश की मिट्टी का दर्द इन्हें कहाँ याद रहेगा ?
मसौदा मंथन में अमृत ही नहीं विष भी
चार दलों का अप्रत्याशित संगम हुआ, विभिन्न धार के नेता अचानक भूकम्प से पे्ररित होकर देश के प्रति समर्पित भावना को दिखाते हुए मूलधार में समाविष्ट हो गए और फिर मंथन हुआ, जिसमें से १६ बुन्दे सहमति अर्थात् १६ सूत्रीय अमृत कलश निकला जिसका पान कर के ये इतने शक्तिशाली हो गए कि, तत्क्षण ही जो मुद्दा वर्षों से नहीं सुलझ रहा था, वह चंद दिनों में सुलझ भी गया और जनता के हाथों में अमृत आ भी गया । जैसा सदियों से होता आया है, इस मंथन में अमृत ही नहीं विष भी निकला, जो मधेश के हिस्से में आया । जिसकी वजह से आज मधेश स्वयं को पूर्णरूप से ठगा हुआ महसूस कर रहा है । १६ बुन्दे सहमति की प्रक्रिया ही गलत थी । इसे करने से पहले सम्बद्ध दलों में ही कोई बहस नहीं हुई, न ही दलों से सम्बद्ध नेताओं की बातों को सुना गया और न ही दलों से जुड़े सभी नेताओं से सलाह ली गई । ऐसे में इस सहमति का कोई आधार और औचित्य ही नहीं था यह सिर्फ चंद सत्तापरस्त दिमागों की उपज थी । इस समझौते के विरुद्ध सर्वोच्च में रिट दायर की गई रिट दायर करने वाले थे पूर्व राजदूत विजय कर्ण, रीता शाह और बहस करने वाले अधिवक्ता थे दीपेन्द्र झा । बहस हुई और एक ऐतिहासिक फैसला सामने आया जो मुकदमा दायर करने वालों के पक्ष में था । जिसके अनुसार १६ बुन्दे सहमति के आधार पर संविधान प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई जा सकती थी । किन्तु न्यायालय के द्वारा दिए गए फैसले की अवमानना करते हुए कानून के रखवालों के द्वारा ही संविधान का मसौदा पेश किया जा चुका है । इतना ही नहीं फास्ट ट्रैक का ये आलम है कि वह नियमावली नियम ९३(३) जिसके तहत मसौदा पेश होने के पश्चात् सैद्धान्तिक विचार विमर्श के लिए सभासदों को सात दिन पहले एकीकृत मसौदा उपलब्ध कराया जाता था, उस नियम को निलम्बन कर के चार दिन पहले ही मसौदे के ऊपर विचार विमर्श शुरु किया जा चुका है । जबकि शायद इस औपचारिकता की भी आवश्यकता नहीं है । जब बहुमत और शक्ति का इतना मद है, जिसके तहत न्यायालय की अवमानना भी कर सकते हैं तो फिर इस दिखावे का क्या औचित्य ? विरोध और नारेबाजी के बीच सारे कार्य सम्पन्न होते जा रहे हैं क्योंकि उनके पास बहुमत है । पर सवाल यह है कि इन्हें बहुमत की शक्ति देने वाले कौन हैं क्या ये सिर्फ एक समुदाय की देन है या इसमें पूरा देश शामिल है और अगर पूरा देश शामिल है तो एक समुदाय विशेष और प्रांत को क्यों असंतुष्ट किया जा रहा है । मधेशी, जनजाति, दलित, महिला, मुस्लिम वर्ग इन सबको मसौदा सम्बोधन करने में असफल है ।
मधेश नेपाल का ही हिस्सा है
मधेश अगर नेपाल का हिस्सा है तो यह यकीन राज्य को दिलाना होगा, मधेश की भावनाओं को समझना होगा नहीं तो आज जो परिवेश दिख रहा है, वह भविष्य में आने वाले तुफान का संकेत दे रही है । सबसे अहम विषय था संघीयता, उसे ही अनदेखा किया जा रहा है । इतना ही नहीं नागरिकता के सवाल पर भी मधेश को कमजोर करने की पूरी साजिश की जा रही है । मधेश की सीमाएँ भारत से जुड़ी हुई हैं और वहाँ से मधेश के प्रायः हर घर में रिश्ते जुड़ते हैं । बेटियाँ ब्याह कर लाई जाती हैं । किन्तु आज जो प्रावधान सामने आ रहा है अगर वह पारित हो जाता है तो उधर से आने वाली बेटियाँ ही नहीं उनकी संतान भी अपने अधिकारों से वंचित होने वाले हैं । नेपाल के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर सिर्फ वंशज के आधार पर नियुक्ति हो सकती है इस हाल में तो मधेश के कई घरों के युवा, बच्चे, महिलाएँ अधिकारविहीन होने वाले हैं । पेश किए गए मसौदे में महिला अस्मिता पर भी प्रहार किया गया है, जहाँ उसे वैवाहिक, प्रजनन सम्बन्धी, गर्भपतन सम्बन्धी, माँ के नाम से नागरिकता सम्बन्धी सभी अधिकारों से वंचित किया जा रहा है । ऐसी कई खामियों का पुलिन्दा है, पेश किया गया मसौदा जिसमें सिर्फ जटिल और अनिर्णित विषयों को समावेश किया गया है । अभिव्यक्ति स्वतंत्रता को भी कमजोर करने की कोशिश की गई है प्रतिवेदन में । वर्षों के संघर्ष के पश्चात् प्रेस ने अनुसन्धान और प्रश्न का जो अधिकार प्राप्त किया था उसपर बन्दिश लगाया जा रहा है, यह कैसा लोकतंत्र है और यह कैसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से प्राप्त संविधान जो नेपाली जनता के हाथों में जाने वाली है । दृश्य जो दिख रहा है उसमें सत्ताधारी दलों के नेताओं में भी मतैक्य नहीं है । कई नेता असंतुष्ट हैं और अपनी आवाज उठा रहे हैं किन्तु उसकी परवाह नहीं की जा रही है । साथ देने वाले दल भी समानान्तर में अपना अलग मत रख रहे हैं फिर ऐसे मसौदे के औचित्य को कितना स्वीकार किया जाय ?
मधेश का मान या मर्दन
अब सवाल यह है कि जनता की भावना के विपरीत हुए इस फैसले को क्या मधेश और जनजातीय जनता स्वीकार करेगी ? मधेशी दलों ने जो आक्रोश संसद में दिखाया है, क्या इसका कोई असर सत्ता पर पड़ने वाला है ? क्या सरकार के इस निर्णय ने देश को द्वन्द्ध की राह पर नहीं धकेल दिया है ?  संघीयता को ताक पर रख कर और जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन प्रणाली की जो अनदेखी की जा रही है वह भविष्य में कौन सा रूप लेने वाली है यह तो समय बताएगा किन्तु आज के परिवेश में यह तो स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि प्राकृतिक प्रकोप ने सत्तालोलुप पक्ष के पौ बारह कर दिए हैं । एक ऐसे शासकीय स्वरूप का निर्माण होने जा रहा है जो आनेवाले वक्त में भी शोषित मधेश और जनजातियों की पक्षधर कभी नहीं हो सकती है । अगर पेश किया गया मसौदा इसी रूप में पारित हो गया तो जो शोषित थे उन्हें आगे भी अपने अतीत के साथ ही जीना होगा यह तो स्पष्ट तौर पर जाहिर हो रहा है । मधेश विकसित ना हो, संसद सभा में मधेश की उपस्थिति कम हो, मधेशी नागरिकताविहीन होकर रहें, राज्य के सभी निकायों में वो गौण रहें, मधेश को सैनिक छावनी बनाकर रखा जाय फिलहाल राज्य की ओर से मधेश के लिए यही नीति और नियम बनाए जा रहे हैं ।
मधेशी दलों की एकीकरण की आवश्यकता
आजतक मधेशी दल न जाने किस खुशफहमी में खोए हुए थे, अब तो उन्हें जगना ही चाहिए और संविधानसभा से निकल कर मधेश के हक की लड़ाई लड़नी चाहिए । मधेशी सपूतों के बलिदान को क्या ऐसे ही बेकार जाने देना चाहिए ? आज के परिवेश में आने वाले कल की नब्ज को पहचानना आवश्यक है । जिस एजेण्डा के साथ जनता ने उन्हें संविधान सभा का रास्ता दिखाया था आज वही अपना अस्तित्व खो चुका है । आज के समय में अगर सबसे बड़ी आवश्यकता कुछ है तो वह है मधेशी दलों का एकीकरण । यही वह राह है जिस पर चलकर वो अपने अधिकार की लड़ाई लड़ सकते है तथा मधेश को उसकी पहचान दिला सकते हैं । उन्हें मधेश से जुड़ना होगा, एक सक्षम नेतृत्व देना होगा, विश्वास जगाना होगा, एक ऐसी आवाज बुलन्द करनी होगी जिसके साथ मधेशी जनता चले और वो आवाज सत्ता के गलियारों में भी बुलन्दी के साथ अपनी बात पहुँचा सके । बहुत जल्द चुनाव भी कराए जाएँगे और अगर मधेशी दलों ने मधेश में जाकर उन्हें विश्वास में नहीं लिया तो नेपाल के मानचित्र पर मधेश की पहचान और भी धुमिल हो जाएगी ।
मधेश है तो देश है
अभी भी वक्त है सत्ता के रखवालों के लिए कि वो मधेश के महत्व को समझें, उनकी भावनाओं को उकसाएँ नहीं बल्कि वर्षों से शोषित मधेश की जनता को उनका अधिकार दें, उन्हें यह विश्वास दिलाएँ कि मधेश इस देश का ही हिस्सा है और समान अधिकार का हकदार भी । मधेश है तो देश है, क्योंकि मधेश का नेपाल में वही स्थान है जो शरीर में रीढ़ की हड्डी का होता है, जिसके ऊपर सम्पूर्ण शरीर का भार टिका होता है । समय परिवर्तित हो चुका है । चेतना और जागरुकता की हवा मधेश में  फैल चुकी है इसमें अगर असन्तोष की आग ऐसे ही भड़कती रही तो चेतना की यही आग ज्वाला बन सकती है और उसके बाद जो होगा उसका जिम्मेदार देश का शासन तंत्र होगा ।

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