मधेश, नेपाल में ही रहे, इस का कोई कारण नहीं है : सीके लाल

राजनीतिक विश्लेषक तथा स्तम्भकार सीकेलाल ने कहा है कि मधेश नेपाल में रह जाए, इस का कोई कारण नहीं है । उन का मानना है कि मधेश के साथ वर्षों से विभेद हो रहा है और राज्य सत्ता से मधेशी नागरिकों के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं हो रहा है । विश्लेषक सीके लाल का कहना है कि मधेश और पहाडी राज्य सत्ता के बीच एक दास और मालिक का संबंध हैं । उन्होंने कहा कि ऐसी अवस्था में मधेश, पहाड से अलग होना चाहता है लेकिन उसके लिए भू–राजनीतिक परिस्थिति और अन्य आधार नहीं ह । रातोपाटी डटकम के लिए नरेश ज्ञावली से की गई एक लम्बी अन्तरवार्ता के क्रम में उन्हों ने यह बात बताया है । नेपाली भाषा में प्रकाशित उक्त अन्तरवार्ता की कुछ अंश (अनुवादित और सम्पादित कर) यहां प्रस्तुत किया है–

मधेशी को भारतीय देखने का नजरिया
व्यक्तिगत सोच, संस्कार, समाजिक मूल्य–मान्यता आदि के कारण पहाड़ में रहने वाले नेपाली मधेश में रहने वाले नेपाली को भारतीय समझते हैं । मधेशी जनता की जो भेषभूषा, भाषा, संस्कृति है, वह भारतीय के साथ ही मिलता है । और भारत से भी यह प्रचार हो रह है कि नेपाल में रहने वाले मधेशी भारतीय मूल के हैं, ऐसी अनेक कारण है कि पहाड़ी लोग मधेशी को भारतीय समझते हैं । दूसरी बात पृथ्वी नारायण शाह के शासन काल से ही काठमांडू आने के लिए पासपोर्ट की व्यवस्था की गई, राणा शासनकाल में भी वही हुआ । उस समय मधेश में रहने वाले लोग, पहाड़ो में रहने वालों की तुलना में साक्षर थे, नाप–तौल जानते थे, व्यापार में सहभागी होते थे । ऐसी अवस्था में जानबुझ कर प्रचार किया गया कि मधेशी लोग ‘ठग’ होते हैं । जिसके चलते भी मधेशी और पहाड़ियो की मानसिकता में अन्तर दिखाई दे रहा है ।

काठमांडू और दिल्ली के बीच मधेश
हर भावनात्मक विकास में डर और लालच प्रमुख कारण रहता है । नेपाल के सत्ताधारियों में एक डर रहता है कि भारत, नेपाल को नियन्त्रण में रखेगा । और लालच रहता है कि उस को रोकेंगे तो सत्ता में एकाधिकार बनी रहेगी । उधर भारत का लालच यह है कि मधेशियों को ‘भारतीय मूल’ के कहते हैं वे लोग हमारे होंगे । और डर यह है कि कहीं वे लोग (मधेशी) नेपाल के साथ न मिले । काठमांडू और दिल्ली के बीच रही मानसिकता के कारण आज मधेश और मधेशी संकट में पड़ रहे हैं ।
इतना होते हुए भी अब मधेशी जनता जान चुकी है कि बिना संघर्ष अधिकार प्राप्त होने वाला नहीं है । लम्बा संघर्ष करना पड़ेगा है और निरन्तर संघर्ष के बाद ही कुछ हो सकता है । लेकिन अभी जनता में निराशा, वितृष्णा कुछ ज्यादा दिखाई दे रहा है । समानता और अधिकार के लिए होने वाला आन्दोलन के क्रम में ऐसा ही होता है । अगर काठमांडू थोड़ी ही सही, सहिष्णु नहीं बनगी तो मधेश मुद्दा खत्म होने वाला भी नहीं है ।
दिल्ली को इस में कोई भी लेना–देना नहीं है । दिल्ली को जो चाहिए, वह तो सिर्फ काठमाडू के सत्ता से प्राप्त हो सकता है, मधेश और मधेशी से नहीं । मोदी ने कहा है– पानी और जवानी पहाड़ में नहीं रह जाता । यह सत्य वचन है । पानी का मतलव नेपाल कें नदी है और जवानी का मतलव गोरखा भर्ती है । दिल्ली को यही दो चीजों से मतलव है । मधेश तो सिर्फ एक ‘कार्ड’ के रुप में प्रयोग किया जाता है ।

कमजोर हो रहा है रोटी–बेटी का संबंध
भारत–पाकिस्तान के बीच कोई म्याच होता है तो पहाड़ में पाकिस्तानी झण्डा लेने वाले हैं । क्योंकि यहां भारत विरोधी भावना ज्यादा पाई जाती है । लेकिन मधेश में भारत के समर्थक होते हैं । क्योंकि यहाँ हर घर का संबंध भारत से जुड़ा हुआ है । बेटी या बहू में से एक न एक का संबंध भारतियों से होता है । यह संबंध राजनीति में भी प्रतिबिम्बित हो, यह नहीं भी हो सकता है । हां नेपाल–भारत बीच रोटी–बेटी का जो संबंध है, वह आज का नहीं है । पृथ्वीनारायण शाह तथा राणा काल से ही यह होता आ रहा था । लेकिन अभी आकर रोटी–बेटी का संबंध, संकट में पड़ने लगा है, सान्दर्भिकता खत्म होते जा रहा है, संबंध कमजोर होता जा रहा है ।

सिक्कीमीकरण तथा फिजीकरण की हावादारी गफ
काठमांडू के स्थायी सत्ता एक भ्रम फैला रही है कि मधेश को ‘सिक्कीमीकरण’ तथा ‘फिजीकरण’ किया जा रहा है । यह तो विल्कूल झूट का खेती है । अगर ‘सिक्कीमीकरण’ तथा ‘फिजीकरण’ हो रहा है तो वह मधेश में पहाडियों से हो रहा है । फीजकरण नेपाल में नहीं मधेश हो रहा है । क्योंकि पहले मधेश में १० प्रतिशत पहाड़ियों की जनसंख्या थी, अभी आकर वह एक तिहाई से ऊपर हो गया है । नेपाल को कोई भी सिक्किमीकरण तथा फिजीकरण नहीं कर सकता । दूसरी बात, जहां सिक्कीमीकरण, भुटानीकरण तथा तिब्तीकरण हो गया है, वहां जाकर पुछ्ना चाहिए कि जनता क्या महसूस कर रही है । सिक्कम, भुटान तथा तिब्बत में रहनेवालों के लिए ठीक हो रहा या नहीं, यह जानना जरुरी है ।

देश, मधेश और राष्ट्र निर्माण अभियान
एक बात याद रखना होगा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब संयुक्त राष्ट्रसंघ का स्थापना हुर्इी, उस समय सिर्फ ४५ देश थी, बाद में ४५ देश ६० हो गयी । अभी आकर २०० हो गई है । इस तरह का राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया मंगलग्रह से आए ‘एलियन’ नहीं कर रहे हैं । पृथ्वी में ही रहे लोग स्वतन्त्रता प्राप्त कर देश निर्माण कर रहे हैं । भारत से पाकिस्तान, पाकिस्तान से बंगलादेश, मलेसिया से सिंगापुर जो भी राष्ट्र बना है, उसके पीछे कई कारण है ।
राष्ट्र निर्माण कैसे हो सकता है ? इसमें कुछ आधार रहता है । प्रथमतः केन्द्र सरकार कमजोर होना । अगर ऐसा होता है, तो वहां अलग होने की इच्छा जागृत होता है । दूसार– शोषण बढ़ते जाना । ऐसी अवस्था में पीड़ित समूह राष्ट्र के रुप में खड़ा हो जाते हैं, जैसे– बंगलादेश । तीसरा– सभी नागरिकों को समान आत्म सम्मान प्राप्त नहीं होना । चौथा, व्यक्ति की महत्वांकाक्षा, जैसे– पाकिस्तान, जहां मोहमत अलि जिन्ना ने विश्वमान चित्र में पाकिस्तान नामक देश निर्माण किया ।
नेपाल के सन्दर्भ में उल्लेखित सभी कारण विद्यमान है । दमन, चरम सीमा पर है, मधेशियों को सम्मान प्राप्त नहीं हो रहा है, मधेश के दृष्टिकोण से केन्द्र कमजोर है । साधन, स्रोत और सत्ता में खसआर्यों कि एकाधिकार है ।
इतना होते हुए भी मधेश और मधेशी स्वतन्त्र न होने के पीछे तीन कारण है । पहला– नेतृत्व की कमी । सीके राउत जिन्ना नहीं हो सकते । दूसरा– भू–राजनीतिक अवस्था । बंगलादेश का निर्माण भारत ने चाहने के कारण सम्भव हुआ था । भारत ने इन्कार करने के कारण तमिल–इलम निर्माण नहीं हो सका । अष्ट्रेलिया के चाहत के कारण इष्टटिमोर निर्माण हुआ है, लेकिन किसी का भी साथ नहीं मिला । बेलायत के चाहत के कारण मलेसिया से सिंगापुर निर्माण हो गया । लेकिन मधेश के पक्ष में इस तरह का भू–राजनीतिक स्थिति नहीं है । भारत सोचता है कि अपनी महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश और बंगाल के बीच में एक अलग देश निर्माण नहीं हो । और गोरखा पल्टन को आक्रोसित करना भी भारत नहीं चाहता है । इसीलिए भारत स्वतन्त्र मधेश के पक्ष में नहीं है । चीन का हांलात भी यही है । अन्य पश्चिमी शक्ति राष्ट्र भी चाहता है कि जो भारत और चीन नहीं चाहता है, वह नहीं हो पाएगा ।
तीसरा कारण– आर्थिक स्रोत–साधन का है । राष्ट्र निर्माण के लिए आर्थिक स्रोत मजबूत होना चाहिए । लेकिन मधेश में वह नहीं है । मधेश में इराक की तरह तेल और सेरालियोन का खानी नहीं है । अगर होता था तो अमेरिका ही मधेश को अलग राष्ट्र बनाने के लिए अग्रसर हो जाता था और न जाने कब अलग राष्ट्र के रुप में स्थापित हो चुका होता । क्योंकि मधेश, नेपाल–राज्य के साथ ही रहना चाहिए, इसका कोई भी कारण नहीं है । क्योकि सेना, पुलिस, प्रशासन, सत्ता, मीडिया कहीं भी मधेशी नहीं है । हर दृष्टिकोण से नेपाल के साथ न अपनत्व है, न ममत्व । मधेश और पहाड़ के बीच तो सिर्फ दास और मालिक का संबंध हैं । यह मधेशियों के लिए बाध्यता बन रही है ।
अब मधेशियों के बीच तीन विकल्प बचा है । एक– सत्ता के साथ बाफदारी देखाना । दो– वहां से बाहर निकल कर जाना, जैसे बहुत मधेशी विदेश पलायन भी हो रहे हैं । तीसरा– खुद को बुलन्द करना । जब यह तीनों रास्ता बंद हो जाता है, तब बाकी रहता है– विद्रोह, जो सीके राउत कर रहे हैं । विद्रोह– शान्तिपूर्ण या सशस्त्र ? यह तो खास प्रश्न नहीं है । उद्देश्य विद्रोह बनता है, तो परिस्थिति अनुसार वह विद्रोह शान्तिपूर्ण तथा हिसांत्मक कोई भी हो सकता है ।
आज भी मधेश का मूल मुद्दा नागरिकता, भाषा की सम्मान और समान प्रतिनिधित्व का ही है, जब तक यह मांग पूरा नहीं होगा, तब तक संघर्ष तो चलता ही रहेगा ।

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