मधेश ने दिया छह गैर-मधेशी प्रधानमंत्री

सभी मधेश के प्रति नमकहराम

गोपाल ठाकुर:गोरखा राज्य-विस्तार अभियान के अनुयायियों ने पहाडÞ तो कब्जा कर लिया लेकिन सौर्ंदर्य के साथ ही उनलोगों को खाद्यान्न के लिए अन्न भंडार की आवश्यकता थी। इस उद्देश्य से वे लोग पहाडÞ से नीचे समतल भूमि मधेश में तो उतरे लेकिन वहां आने के बाद उनलोगों को अंग्रेजों के साथ लडÞना पडÞा। आखिर में १८१६ की सुगौली सन्धि और अंग्रेजों की ताबेदारी करने के एवज में उनलोगों को ‘नया मुल्क’ पाकर ही नेपाल की वर्तमान सीमा से संतोष करना पडÞा।
लेकिन, इसके बाद नेपाली शासकों ने मधेश से बहुत ही अधिक प्रेम करना शुरू कर दिया। शाहवंश से लेकर राणा तक ने मधेश में महल खडÞा करना शुरू किया। महलों तक कम से कम बैलगाडिÞयों के चलने और चिÝी-पत्री पहुंचाने के लिए ‘हुलाकी सडÞक’ भी बनाया। विर्ता, मौजे, बख्शीस आदि में उनलोगों ने ‘मधेश की भूमि को ही लेने-देने’ का काम किया। उसी क्रम में ‘राष्ट्रीय पंचायत सदस्य’ से ‘सांसद’ और ‘प्रधानमंत्री’ तक बन जाने पर भी उनलोगों ने मधेश से ही प्रेम किया और आज भी भीक्षादान के रूप में मधेश का कायापलट करने का वायदा करते हंै।

मधेश ने दिया छह गैर-मधेशी प्रधानमंत्रीः सभी मधेश के प्रति नमकहराम

लेकिन, यहीं सवाल उठता है कि ‘आप गैरमधेशी शासक, केवल मधेश से ही प्रेम करते रहेंगे या मधेशियों से भी -‘ लेकिन, इस सवाल के उठते ही मधेश, उनलोगों की आंखों की किरकिरी बन जाता है, मधेश उनकी नजरों में साम्प्रदायिक बन जाता है, यहां तक कि राष्ट्रविरोधी भी बन जाता है, आखिर क्यों, थोडÞा विचार करें –
नेपाल की अर्थ-राजनीतिक पहचान, आज भी एक कृषि प्रधान देश ही है। देश की दो तिहाई जनसंख्या अभी भी कृषि पर ही निर्भर है फिर भी देश के कुछ गार्हस्थ्य उत्पादन में इस क्षेत्र का योगदान करीब एक-तिहाई में ही सीमित हो गया है। बताते हैं अन्य क्षेत्रों ने बहुत ही अधिक विकास किया है क्योंकि, देश का आयात बढÞ रहा है और जिस कारण बढÞता हुआ व्यापार घाटा हमारी कमर तोडÞने की स्थिति में पहुंच रहा है। इस परिस्थिति में जबतक हम कृषि क्षेत्र की उन्नति नहीं करते, सुधार आने की आशा भी नहीं कर सकते।

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लेकिन हां, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि कृषि क्षेत्र का उत्थान- केवल ‘मकानों की छतों पर रखे कुछ गमलों में की गई खेती अथवा जहां हल-बैलों का चलना भी असंभव है, वैसी पहाडÞी खेतों में कुछ उपजा लेने मात्र से, हो जाएगा। उसके लिए तो हमारे देश का अन्न भंडार मधेश को सुरक्षित कृषि क्षेत्र के रूप में विकास करना होगा। लेकिन, विडम्बना तो यह है कि मधेश में देश की कुल संख्या का लगभग एक तिहाई लोगों के रहते समय, मधेश अन्न का निर्यात करता था जबकि इस वक्त आधी से अधिक जनसंख्या के होते हुए भी कृषि का दिवालिया हो चुका है।
देश के राजनीतिक इतिहास को मधेश की सापेक्षता में देखने से स्पष्ट होता है कि राजनीतिक सुगमता के साथ ही मधेश, दर्ुगम बनता जा रहा है। स्वेच्छाचारी राजतंत्रात्मक पंचायती शासन प्रणाली के कार्यकाल में भी, मधेश खाद्यान्न निर्यात करता था। लेकिन, उसके उत्तर्रार्द्ध से ही अन्न निर्यात की स्थिति का खिसकना शुरू हो गया था। वह क्रम संवैधानिक राजतंत्रात्मक प्रजातंत्र और संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र में आने के बाद और अधिक नकारात्मक दिशा में आगे बढÞता हुआ दिखता है। अर्थात्, राजनैतिक सुधार से मधेश के उन्नत बनने की जगह, वह नीचे लुढÞकता जा रहा है। लेकिन, क्या इससे केवल मधेश ही आक्रान्त है – आखिर इसका कारण क्या – थोडÞा कुरेदने की कोशिश करें।
गोरखा राज्य विस्तार अभियान के तहत अंग्रेजों के साथ सन १८१६ की सुगौली संधि के कारण मधेश को नेपाली शासकों द्वारा चरम भेदभाव का समाना करना पडÞा, यह स्पष्ट है। भाषा, संस्कृति, जीवन शैली, भूगोल और पर्यावरण की दृष्टि से मधेश, गोरखा शासकों से भिन्न रहने के कारण, नेपाल के भूगोल से जुडÞा रहा लेकिन नेपाल राज्य मंे कभी भी वह ‘अंट’ नहीं सका। बल्कि, खस-गोरखा शासक इसे जब कभी भी विर्ता, मौजा, बख्शीस, के नाम पर शोषण करते चले गए। उन्होंने ‘राजा महेन्द्र के मण्डले राष्ट्रवाद’ से ऊपर उठने की कोशिश नहीं की। उनके मधेशी इकाइयों में भी खस नेतृत्व ही हाबी रहा फिर भी मधेशवाद और सिद्धान्त की निष्ठा में बांधकर, उन्हें ही स्वीकार करते गए। इसके अनुपम उदाहरण के रूप में हम देख सकते हैं कि मधेश ने नेपाल के इतिहास में छह खस ब्राहृमणों को प्रधानमंत्री बनाया। उन्हें ही स्थायी से लेकर केन्द्रीय स्तर के व्यवस्थापकीय अंगों में भी पहुंचाया। फिर भी जाति, भाषा, क्षेत्र, समुदाय, धर्म, सम्प्रदाय से निरपेक्ष रहने का दाबा करनेवाले कांग्रेस और मार्क्सवादी लेनिनवादी कम्युनिस्टों ने भी आज तक किसी एक मधेशी को किसी भी स्तर पर पहाडÞी क्षेत्र से उम्मीदवार तक नहीं बनाया। यह वह गैर-मधेशी प्रधानमंत्री या अन्य जनप्रतिनिधि, मधेश की नमक का सरियत देते तो भी संतोष होता लेकिन उन सभी प्रधानमंत्रियों एवं जनप्रतिनिधियों ने मधेश के प्रति नमकहरामीपने का ही पर््रदर्शन किया।
ऊपर के दृष्टान्त पर्याप्त हैं खस-ब्राहृमणवादी गोरखा-घरेलू साम्राज्यवाद और आन्तरिक उपनिवेशवाद के विषवमन में पडÞे मधेश के लिए। इन्हीं कृत्यों के विरुद्ध केन्द्रित था २०६३ और २०६४ साल का आन्दोलन जिसकी नींव पर देश में संघीयता स्थापित हो सकी। इसके साथ ही मधेश आन्दोलन द्वारा स्थापित पहिचान का मुद्दा, अब केवल मधेश तक ही सीमित नहीं रहा। अपितु इस मुद्दे ने पहाडÞ और हिमाली क्षेत्र के अदिवासी जनजाति, मुस्लिम आदि समुदायों में भी कुतूहल पैदा किया और पहिचान सहित संघीयता एवं संघीयता सहित संविधान, संविधान सभा द्वारा बनाया जाना चाहिए, यह मान्यता -स्टैंड) स्थापित हो गया।
पहिचान का मुद्दा स्थापित हुआ फिर भी उसके कुछ नकारात्मक पक्ष नहीं है, ऐसी बात भी नहीं है। जैसे मधेश में मधेशी, आदिवासी क्षेत्र में आदिवासी जनजाति, खसान क्षेत्र में खस, तथा दलित क्षेत्र में दलित के अलावा, अन्य लोगों के निर्वाचित होने की संभावना को न्यून बना दिया है, पहिचान के पक्षधर आन्दोलनों ने। लेकिन इसके लिए भी दोषी कौन – क्या मधेशी लोग – क्या आदिवासी जनजाति – क्या दलित लोग – क्या मुस्लिम लोग – -नहीं, इसके लिए जिम्मेबार है खस-ब्राम्हण अहंकारवादी घरेलू साम्राज्यवाद और आन्तरिक उपनिवेशवाद की मानसिकता। इसलिए जबतक उसी समूह द्वारा उसके हरजाने का भुगतान शुरू नहीं किया जाता तबतक पहिचान के मुद्दे को मंथर नहीं किया जा सकता। लेकिन, वह भी करंेगे कैसे –
विगत में जातीय और धार्मिक भेदभाव मिटाने के लिए आन्दोलन नहीं हुए हैं, ऐसी बात भी नहीं है। मानव का अन्तर्रर्ाा्रीय जाति बनाने के गीत नहीं गूंजे हंै, ऐसा भी नहीं है। पहिचान द्वारा लोकतंत्र और साम्यवाद को निरपेक्ष रखने का वचन नहीं दिया गया हो, ऐसा भी नहीं है। लेकिन, ये सभी वचन आन्दोलन के दौरान दिए गए थे। और, आन्दोलन के समाप्त होने के साथ ही पहिचान के सवाल पर राजतंत्र, लोकतंत्र और साम्यवाद- तीनों विचार क्षेत्रों की नेतृत्व मंडली में हाबी खस-ब्राहृमणवादी उच्चजातीय अहंकारवाद ने कोई भी भिन्नता नहीं दिखायी। राणा और पंचायती शासकों ने जमीन्दारी, विर्ता, मौजा, बख्शीस और राजनीतिक पीडिÞतों के नाम पर मधेश की जमीन को ही मनमानी ढंग से वितरण किया तो दूसरी ओर लोकतंत्रवादियांे और साम्यवादियों ने पार्टर्ीींगठन के नाम पर मधेश को नव सामन्ती जमीन्दारी में परिणत किया। उसके प्रमाण के रूप में अभी भी कांग्रेस, नेपाल कम्युनिस्ट पार्टर्ीीएमाले) और माओवादियों के न केवल केन्द्रीय समिति, अपितु मधेश केन्द्रित समिति और निकायों के नेतृत्व के खाका को देखने से दोपहर की धूप की तरह स्पष्ट हो जाएगा। इतना होते हुए भी मधेश में गैरमधेशियों को पार्टर्ीीनकायों के प्रमुख अथवा इंचार्ज बनाया ही नहीं जाए, ऐसा नहीं है। लेकिन हां, गैर मधेशी क्षेत्र में एक भी मधेशी को उस प्रकार की जिम्मेदारी नहीं देने की सोच को क्या कहेंगे – यह पाखण्ड नहीं तो और क्या है –
क्या, इसकी दबा ही नहीं है – अवश्य है – कहावत है जहां इच्छा, वहां उपाय। लेकिन, शर्ीष्ा कहे जानेवाले इन दोनों खेमे की नेतृत्व पंक्ति, क्या इस विषवृक्ष को काट-गिराने के पक्ष में हैं – इस सवाल का जबाब अभी तक नकारात्मक ही है। क्योंकि, मधेशी मोर्चा को लाँलीपाँप दिखाकर हस्ताक्षर करानेवाले यह दोनों खेमा थोडÞा सार् इमानदार हुआ होता तो संविधान सभा के अगला निर्वाचन के नाम पर चार पक्षीय सिंडीकेट और निर्दलीय सरकार का उपहार नेपाली जनता, नहीं ले पाती। बल्कि, दो वषर्ाें के अन्दर ही संविधान सभा, संविधान बना ली होती।
इन लोगों के साम्प्रदायिक होने के कारण ही न तो संविधान बना और न ही अभी तक संविधान सभा का अगला निर्वाचन ही सुनिश्चित हो सका है। संविधान सभा का निर्वाचन सुनिश्चित करना हो तो चार पक्षीय सिंडीकेट की जगह आम राजनीतिक सहमतीय संयंत्र बनाना होगा। संविधान सभा का आकार छोटा करना है तो समग्र में छोटा करना होगा न कि केवल समानुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा। निर्वाचन क्षेत्र २०६८ साल की जनगणना रिपोर्ट के आधार पर पुनः निर्धारित करना होगा, न कि २०५८ की जनगणना के आधार पर कराए गए २०६४ साल के निर्वाचन क्षेत्र निर्धारण को कायम रखने की धृष्टता – पेट में दांत रखते हुए कपट के जादूगर यह नहीं समझ पाए हैं कि ये लोग अपनी असफलता को ढकने का प्रयत्न कर रहे हैं जो ‘डेट एक्सपायर्ड दबाओं’ की तरह है। इसलिए यदि किया जा सकता हो तो उच्च जातीय खस-अहंकारवाद परोपकारी बनें, यदि ऐसा नहीं हो सकता तो कम से कम परपीडÞक नहीं बनें। फिर भी शर्ीष्ा नेतागण, अभी भी उच्च खस अहंकारवाद से ऊपर उठने का प्रयत्न कर रहे हैं, ऐसा नहीं दिखता। मधेश की धरती ही जन्मस्थल और कर्मस्थल होने पर भी कोई मधेशियों को कपडÞा-लत्ता और सवारी साधन बांटकर मधेश के साथ किए हुए गद्दारी का मुआब्जा चुकाना चाहता है। कोई पहचान विरोधी खेमा में मधेशियों को ही खडÞा करना चाहता है तो कोई मधेशी शहीदों के सपनों को पूरा करने के लिए मधेश से ही चुनाव जीतकर विगत की क्षति का हरजाना चुकाना चाहता है।
-सौजन्यः गो.प. प्रस्तुतिः हि.सं.)

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