मधेश पर राज्य की त्रास नीति, खरीद नीति तथा सेना नीति कायम है : कैलाश महतो

सेना के बिना राजनीति का कोई मूल्य नहीं


कैलाश महतो, परासी | The very idea of somebody governing somebody else is inhuman.

Government is a game, the ugliest and the dirtiest game in the world.

राजनीति शास्त्र के कई विद्वानों का कहना है कि शक्ति प्राप्ति के लिए किए जाने बाले संघर्ष ही राजनीति कहलाता है । Politics is struggle for power.
नेपाल की राजनीति आज बीच चौराहे पर खडा है । सिंह दरबार की राजनीति को मधेश ने धक्का मारकर चौराहे पर लाया दिया है । नेपाल की राजनीति अभी ठीक उस कुल्टा की तरह है जिसे लोग उसके कुल्टापन के कारण घर से बाहर निकाल देते हैं ।
कुल्टा वेश्याओं से अलग चरित्र की होती हैं । वेश्या शरीर से बिकने के बाद भी मन से प्रतिष्ठित हो सकती है । कारण वो अनेक मुसिवतों को टालने के लिए भी वेश्यालय को स्वीकार करती हैं । वहीं कुल्टा शरीर और मन दोनों से फुहड होती है । उसका बाहरी आवरण भले ही साफ सुथरा दिखता हो, पर मन मैला होता है । और वही कारण है कि वेश्यालय से भी लोग कई महिलाओं को घर लाकर इज्जत की जिन्दगी जीते हैं । मन से साफ सुथरा रहने के कारण वो घर को सजा देती है तो वहीं कुल्टा बने हुए घर को उजाड देती है ।

नेपाल की राजनीति की हविगत भी एक कुल्टा सी ही है जिसने अपने घर के साथ अपने आसपास समेत को मैला कर चुकी है । वो बिगडी सिर्फ तन से नहीं, मन से भी है । लेकिन गाली वो अपने पडोसी को देता है । वह यही आरोप लगाकर अपने मैले चरित्र को मखमली कपडों से ढकने का प्रयास करता रहा है कि उसे उसके पडोसी ने बिगाड दी है ।

मधेश के राजनीति नेपाल के कुल्टे राजनीति का निर्लज्ज ग्राहक बन बैठा है । शानदार सुन्दर लिवासों में लिपटे कुल्टे नेपाली राजनीति के गन्दे चरित्र को गौर से देखने के बजाय उसके बाहरी आवरणों में खोये मधेश के राजनीतिज्ञ नेपाली राजनीति के कामवासनाओं में लिप्त रहा हैं। उन्हें तनिक भी ज्ञात नहीं कि वासना के हवस में वे क्या क्या खोने बाले हैं । उन्हें इस बात का थोडा भी याद नहीं कि बेहोसी के हालत में उसने अपनी भूमि, जल और जंगल खो दी । नेपाली सुन्दरता के बाहरी आवरण पर उसने मधेश की अवसर, यूवाओं का भविष्य और इतिहास की गरिमा खो दी । अधिकार के नाम पर छः दशकों से ज्यादे लडे लडाइयों में उसने मधेश की शान, मान और पहचान गवाँ दी । समानता के नाम पर लडे लडाइयों से उसने मधेश में नेपाली सेना, सशस्त्र और प्रहरी कैम्पों की पहरा लगाकर मधेश में असुरक्षा बढा दी ।

देखते ही देखते मधेशी दलों के लाख ना नुकुर तथा विरोध करने के बावजुद नेपाली शासन ने मधेश में चुनाव करवा ही ली । लेकिन आज भी मधेशी दलों की अकडन में कोई सुधार आने की संकेत नहीं दिख रही है । किसी समय मोर्चा में रहे मधेशी दल ही नेपाली चुनाव में भाग लेता है तो दूसरा समूह उसके विरोध में चुनाव वहिष्कार करता है । वहिष्कार भी जब सफल नहीं हुआ तो चुनाव में जाने का जब रास्ता ढुँढता है तो उसके विरोध में रहे मधेशी दल नेपाल सरकार से स्थानीय चुनाव नहीं हो जाने तक संविधान में किसी प्रकार का संसोधन न करने का सरकार से माँग करती है । क्या इन मधेशी दलों के आपसी तानातान तथा नेपाली राज्य के मकरजाल से यह स्पष्ट नहीं होता कि अब मधेशी दलो को मधेश के समस्या समाधान से ज्यादा इनके अन्दर रहे समस्याओं को ही समाधान करने में असफल प्रयास करने होंगे ?

मधेश की समस्या अब सिर्फ राजनीतिक नहीं, अपितु सैनिकीय और आर्थिक भी है । मधेश की भावना विपरीत नेपाली राज्य ने सेना लगाकर मधेश में एक तरफ आतंक फैलाया है, वहीं दूसरी तरफ राज्य ने मधेश का भोट भी खरीदकर निर्वाचन कराया है । अभी मधेश के जिलों में डुबान की समस्या है । वहाँ पर सरकार की उपस्थिती या तो होगी ही नहीं । हो भी जाय तो औपचारिकता के लिए । क्यूँकि अभी चुनाव कराना बाँकी जो है । उन डुवान पीडित लागों में पैसे तब बाँटे जायेंगे जब चुनाव की वातावरण गर्म होगी । एक तरफ पैसा और दूरसी तरफ सेना का आतंक कायम रहेगा । दोनों शक्तियों के बीच निर्वाचन होना तय है जिससे नेपाली राज्य को राजनीतिक फायदे हों ।

यही सत्य है कि सेना के बिना राजनीति का कोई मूल्य नहीं होता । यही कारण है कि मधेश पर नेपाल का कोई राजनीति नहीं, त्रास नीति, खरीद नीति तथा सेना नीति कायम है । संसार में जिसके पास सेना नहीं, उसका राजनीति कभी सफल नहीं हो सकता । क्यूँकि सेना ही किसी राष्ट्र और उसके जनता का अन्तिम रक्षक होता है । वहाँ के संविधान तथा नियम कानुन का संरक्षक होता है । सेना से ही किसी देश के राजनीतिज्ञ वहाँ राजनीति करता है ।

कुछ लोग राजनीति को दुनियाँ का सबसे गन्दा खेल भी इसिलिए कहते हैं, क्यूँकि राजनीति युद्ध में विश्वास रखता है । बिना युद्ध का कोई राजनीतिज्ञ शासक बन ही नहीं सकता । युद्ध को न्यौता देने बाला शख्स ही सफल राजनीतिज्ञ कहला सकता है । युद्ध से ही उसकी पहचान कायम होती है । युद्ध के बिना उसका कोई मूल्य नहीं होता । युद्ध में ही नायकत्व की प्राप्ति होती है । और युद्ध सेना के कारण ही संभव है ।

अगर युद्ध न भी हो तो राजनीतिज्ञ उसका वातावरण निर्माण करता है । जनता अगर शान्ति में रहे तो फिर लडाकू का पहचान मिट जाता है । युद्ध के बिना शासक का कोई अस्तित्व नहीं, कोई अहमियत और उँचाई नहीं । इसिलिए राजनीतिज्ञ हमेशा खतरे को जिन्दा रखना चाहता है । खतरा न भी हो तो उसके अवस्था को निर्माण किया जाता है । और बेहिचक खतरा अशान्ति से होती है । अशान्ति युद्ध से बनता है और युद्ध सेना द्वारा तैयार की जाती है ।

army is the largest military branch of a nation with tremendous multiple trainings to defend the nation and its citizens. Æ–goarmy.com

Adolf Hitler, in his autobiography, has many insights; and he is a man worth understanding because he is the purest politician – I mean, the dirtiest. He says that war is an absolute necessity if you want to remain in power. If you cannot create war people start thinking of you as nobody. Only in wartime are heroes born.

Hitler says that if you cannot create war then at least continue to propagate the idea that war is coming. Never leave people in peace, because when they are in peace, you are nobody. They don’t need you; your very purpose is not there. They need you when there is danger. Create danger. If there is not real danger, at least create the climate of a false danger.

अशान्ति, खतरा और युद्धों से राजनीतिज्ञों को फायदे होते हैं और वहीं जनता भयभित होती है जो हर शासक का उच्च आकांक्षा होता है । मधेश का राजनीतिज्ञ नेपाल के राजनीति में कभी शासक नहीं बन सकता । उसका शिकार रहा है और जबतक उसकी अपनी सेना न हो, तबतक वह सही मायने में राजनीतिज्ञ हो ही नहीं सकता । मधेश का सेना नेपाली राज में नहीं, स्वतन्त्र मधेश में ही संभव है

सिंह दरबार की राजनीति को मधेश ने धक्का मारकर चौराहे पर ला दिया है : कैलाश महतो

मधेश पर राज्य की त्रास नीति, खरीद नीति तथा सेना नीति कायम है : कैलाश महतो

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