मधेश बनाएँ

उगे न जहाँ घृणा की फसलें

Roshankumar jha

अधिवक्ता रोशनकुमार झा

मन मन स्नेह सिंधु लहराएँ
ऐसा मधेश  बनाएँ

जहाँ तृप्त आयत कुरान की हँस कर वेद मंत्र दुहराएँ
आसन पर बैठा गिरिजाघर गुरुवाणी के सबद सुनाएँ
’बुधम्मं शरणं गच्छामि’ से गली(गली गुंजित हो जाएँ
ऐसा मधेश  बनाएँ

वन में जहाँ वसंत विचरता, आम्रकुंज में हँसती होली
हर आँगन में दीवाली हो, चौराहों पर हँसी ठिठोली
दर्द अवांछित अभ्यागत हो, निष्कासित हों सब पीड़ाएँ
ऐसा मधेश  बनाएँ

रक्षित हों राधायें अपने कान्हा के सशक्त हाथों में
दृष्टि दशानन उठे सिया पर प्रलंयकर जागे माथों में
अभिनंदित साधना उमा की पूजित हों घर(घर ललनायें
ऐसा मधेश  बनाएँ

आँगन आँगन ठुमक ठुमक कर नाचे ताली बजा कन्हैया
चाँदी सी चमके यमुना रज रचे रास हो ताता थैया
पनघट पर हँसती गोपी के गालों पर गड्ढे पड़ जाएँ
ऐसा मधेश  बनाएँ

किसी आँख में आँसू आए सबका मन गीला हो जाए
अगर पड़ोसी भूखा हो तो मुझसे भोजन किया न जाए
ईद, दीवाली, बैसाखी पर सब मिल(जुल कर मंगल गाएँ
ऐसा मधेश  बनाएँ

हर विंध्याचल झुककर छोटी चट्टानों को गले लगाए
छोटी से छोटी सरिता को सागर की छाती दुलराए
हर घर नंदनवन हो जाए हँसे फूल कलियाँ मुस्काएँ
ऐसा मधेश  बनाएँ

’एक माटी के सब भांडे हैं’ कबिरा सबको भेद बताए
ब्रज की महिमा को गागा कर कोई कवि रसखान सुनाए
एक अकाल पुरुष के सच का नानक सबको भेद बताएँ
ऐसा मधेश  बनाएँ

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