मधेश बनेगा अब हिटलर का वधशाला, रास्ता अब स्वदेश घोषणा का : कैलाश महतो

कैलाश महतो, पराशी, १ असोज |

लोकतन्त्र सभ्य समाज का उत्तम गहना होता है, जो अपने आप में कुछ भी नहीं है–जैसे हीरे और मोती तबतक सिर्फ एक धातु ही है जबतक कोई सिल्पकार उन्हें गहना न बना दे । क्यूँकि जब वह गहना बन जाता है तो लोग उसे बडे हिफाजत से रखते हैं । वैसे भी उसकी पहचान भी जौहरी ही करता है, कोई बन्दर नहीं । लोकतन्त्र की भी सही पहचान hitसभ्य समाज के राजनीतिज्ञ ही कर सकता है, कोई नस्लवादी नहीं ।
शासक वर्ग जब लोकतन्त्र का अर्थ या परिभाषा समझ नहीं पाता या समझकर भी बेईमानी करता है तो नयाँ तानाशाह पैदा होता है । लोकतन्त्र में तो नेता को ही सब से पहले लोकतान्त्रिक होना चाहिए और जब वैसा नहीं होता तो नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म होता है, जिन्होंने फ्रान्स में राजतन्त्र खत्म होने के बाद संग्रहालय में सुरक्षित राजमुकुट को पहनकर अपने को राजा घोषित किया था । विभेद के विरोध में खडा होने तथा लोकतन्त्र का माला जपने बाला हिटलर ही लोकतन्त्र के सारे मूल्य और मान्यताओं को तख्तापर रखकर दुनियाँ का खुंखार तानाशाह बना था, लाखों यहुदियों को उन्होंने व्यक्तिगत बदले के भावनाओं के कारण आग के भट्ठी और ग्यास च्याम्बरों में मारा था । सन् १९३९ से १९४५ तक के ६ वर्षों तक चले द्वितीय विश्वयुद्घ में उन्होंने करीब ६० लाख यहुदियों को तरपा तरपाकर मारा था, जिनमें १५ लाख बच्चे बताये जाते हैं । कम्पूचिया मे राजतन्त्र की समाप्ति के बाद भी राजतन्त्र लौटकर स्थापित हुआ था । और नेपाल के खस नेताओं का अहंकार कहता है, “मैं ही राष्ट्र हूँ, मैं ही लोकतन्त्र हूँ, मैं ही गणतन्त्र भी हूँ” जो सर्वथा गलत है ।

मधेश के जनता अनवरत विगत ६५ वर्षों से अपने अधिकार के लिए लडते आ रही हैं, और नेपाली शासकों से भिख माँग रही है, दुआ माँग रही है । मगर अहंकार में चुर ये शासक रुपी बन्दर उनके साथ हमेशा विभेद और धोखाधरी ही करते आ रहे हैं । और शासकों के मनोकांक्षाओं को पूरा करने में हमारे मधेशी नेताओं ने भी कम भूमिका निर्वाह नहीं किया है ।
वास्तव में हमारे मधेशी नेता लोग अपने आप में ही कन्फ्यूज्ड रहें हैं । कोई कहता है कि वो नेपाली ही हैं, क्यूँकि नेपाल को मधेशीयों ने ही निर्माण किया है । कोई कहता है कि मधेश काठमाण्डौ से रिस्ता तोड सकता है, तो किसी का भाषण यह होता है कि पहले प्रान्त लें, इसके बाद देश । कोई धमकी देता है कि आश्विन ३ को मधेश में काला दिवस के रुप में अंकित किया जायेगा । कोई कहता है कि प्रान्त नहीं मिला तो देश बना लेंगे तो किसी को थरुहट–थारुवान मिल जाये, बनने बाली सरकार में उनके कहे अनुसार मन्त्रियों की संख्या मिल जाये तो मधेश जिन्दाबाद हो जायेगा । मधेश के बहुत लोग भी इन्हीं काल्पनिक संसार के इर्दगिर्द घुमते नजर आ रहे हैं जो सदा सर्वथा यह मान लें कि बालुओं को कोल्हु में पेलकर हम तेल निकालना चाहते हैं । मधेश से काठमाण्डौ अपना शोषण करने के रिश्तों के अलावा कोई सम्बन्ध नहीं रखा है और न रखेगा । अगर कोई नेता रिस्ता मानता है तो उनका राजनीति मधेश के लिए हो ही नहीं सकता ।

प्रान्त पहले ले लें, इसके बाद देश लेने बाले मित्रों से विचार करने का निवेदन यही किया जा सकता है कि कहीं ऐसा न हो कि हमारा चीज हमारे हाथ और लात दोनो से चला जाय । प्रान्त लेना असम्भव है, लेकिन स्वराज घोषणा करना संभव है । क्यूँकि प्रान्त हम माँग रहे हैं भिखारियों के तरह और भिखारियों को उतना ही मिलता है जितना उनके मालिक उन्हें दे देते हैं । स्वराज हम खुुुुद निर्माण करते हैं जो दुनियाँ ने किया है ।

नेपाल को नहीं छोडने का जिक्र करने बाले नेताओं को यह पता होना चाहिए कि वो उसे छोडे या न छोडे, नेपाल उन्हें पूर्णतः छोड चुकी है । दुसरी कारण, नेपाल को छोडना इसलिए भी बेहतर होगा कि वह हमसे इतनी दुर चली गयी है कि उसको लौटाना आकाश से तारों को तोडकर अपने चाहने बालों को भेट में देने के बराबर है । तीसरा, अगर हमें स्वस्थ्य होकर जीना है तो शरीर के किसी हात या पैर को कोई न छुटने बाला रोग लगी हो तो उस अंग को शरीर से हटाकर जिना ही बेहतर होगा, नहीं तो शरीर के बाँकी अंगो को भी नष्ट होना निश्चित है ।

थरुहट या थारुवान लेकर मधेशी और थारुओं को अधिकार सम्पन्न बनाने बाले नेताओं का चरित्र को थारु लोग सम्भवतः पहचान कर ही रहे होंगे, जिनका और जिनके बाँकी पीढियों को थारु–मधेशियोंओं से कुछ लेना देना ही नहीं है । वे मधेशी या थारुओं का नहीं, अपना इतिहास बनाने और अपने मौत पर राइफलों की सलामी लेने के अलावा कुछ नहीं चाहते ।

वैसे ही आश्विन ३ को मधेश में काला दिवस मनाने बाले नेता मित्रों से यही निवेदन है कि उससे न आपको, न मधेश को कुछ मिलने जा रहा है । आपको पता है कि आप के मित्र राज्य ने मधेशियों को कैसे बर्बरता पूर्वक गोली मारती है, मधेशीयों के घर के इज्जत से खेलती हैं ?, कितने मधेशियों को मारा है ? भैरहवा और रुपन्देही के बेथरी में ही पचासो मधशियों को मारने की बात सुना जा रहा है । ५ लाशों का प्रमाण दिया गया गया है और बाँकी के लाशों को गायब किया गया है, जो नेपाल के किसी तानाशाह या फाँसीवादों तक ने नहीं किया था ।
मधेश आप से गुजारिश करता है कि आश्विन ३ गते के दिन घोषणा होने बाला संबिधान नेपाल का होगा, हमारे पडोसी देश का होगा, मधेश का नहीं । जिस तरह दुनियाँ के बाँकी देश संबिधान बनाने तथा घोषणा करने पर धन्यवाद देंगे, हम भी उन्हें धन्यवाद दें और हो सके तो उसी रोज आजाद मधेश का घोषणा कर मधेशी दल तथा मधेशी नागरिक समाज के संयुक्त गठबन्धन में मधेश का अन्तरिम संसद तथा अन्तरिम सरकार का भी घोषणा करें ।

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