मधेश भेर्सेज राष्ट्रीयता

कुमार सच्चिदानन्द

JP gupta

JP gupta

मधेशी राजनीति के आधार पर संविधानसभा में पहुँचे एक और मंत्री मधेश के मुद्दे  पर विवादों के घेरे में हैं। आरोप यह है कि एक पत्रकार सम्मेलन में उन्होंने काठमाण्डू से मधेश का सम्बन्ध-विच्छेद होने की बात कही थी। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार सम्बन्धी आरोप तय कर उनके लिए डेढÞ वर्षकारागार और ८४ लाख का धन वसूलने की सजा भी निर्धारित कर दी। माननीय सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करते हुए उन्हों ने आत्म र्समर्पण भी कर दिया और फिलहाल कारागार की सजा भुगत रहे हैं। लेकिन उनके मधेश सम्बन्धी इस कथन को आधार बनाकर उनकी राष्ट्रीयता की भावना पर प्रश्न-चिहृन उठाया जा रहा है। इससे पर्ूव भी श्री भट्टर्राई के मंत्रिमण्डल के ही रक्षामंत्री श्री शरद सिंह भण्डारी को ऐसे ही विवादास्पद कथन के कारण अपने पद की कर्ुबानी देनी पड थी और श्री राजेन्द्र महतो भी अपनी तल्ख टिप्पणी के कारण कुछ दिन पर्ूव विवादों में उलझे थे। वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति, संसदीय गणित और मंत्रीपरिषद की संरचना देखते हुए संभव है कि श्री गुप्ता को मंत्री पद नहीं त्यागना पडÞता। फिर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद एक तरह से इस घटना पर पटाक्षेप हो चुका है। लेकिन अगर यह फैसला तत्काल नहीं आता तो लम्बे बहस का यह मुद्दा था और जिस तरह इस मुद्दे ने तूल पकडÞा है उससे यह बात साफ है कि अभी भी मधेश की माँगों के प्रति राष्ट्रीय स्तर पर सहिष्णुता का अभाव है। इस मुद्दे पर अगर राजनैतिक तौर पर श्री गुप्ता को अभयदान मिल भी जाता है तो इसे सरकार का नेतृत्व कर रहे दल और उसके नेताओं की सदाशयता मानी जाती क्योंकि राष्ट्र के वृहत्त राजनैतिक वृत्त में उनके आलोचक अधिक हैं जो उनके इस्तीफे की माँग कर रहे थे और यह आवाज संविधानसभा की चाहरदीवारी से लेकर व्यापक सूचना-तंत्र में गूँज रही थी।

sharadsingh Bhandari

यद्यपि जिस समय श्री गृुप्ता का यह बयान आया उस समय उन पर कुछ न्यायिक मुद्दे भी न्यायालय में विचाराधीन थे और उनकी तथाकथित उग्रता को इससे भी जोडÞकर देखा जा रहा था। मतलब साफ है कि जब कभी मधेश के मुद्दे की बात होती है तो उसे राष्ट्र की एकता और अखण्डता से जोडÞकर देखा जाता है और सम्बद्ध व्यक्ति को किसी न किसी रूप में हाशिये पर धकेलने का प्रयास होता है। श्री गुप्ता आज निश्चित तौर पर अन्य मुद्दे के कारण सजा भुगत रहे हैं मगर किसी न किसी रूप में मधेश सम्बन्धी तल्ख टिप्पणी के कारण वे विवादों में उलझे थे। फिलहाल विवाद टल गया और न्यायिक सजा प्रारम्भ हो चुकी है।
आज मधेशी राजनीति की सबसे बडÞी विडम्बना है उसका बिखराव जिसके कारण उनकी माँगों को गम्भीरता से नहीं लिया जाता। वैसे भी श्री गुप्ता जितने बडÞे दल का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और जितना उनका संख्या-बल है, इस आधार पर उन्हें समग्र मधेश का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। अतः उनकी आवाज को मधेश की आवाज भी नहीं मानी जा सकती। कथन चाहे भण्डारी का हो या महतो का या गुप्ता का- विभाजित रूप में इनकी आवाज मधेश की आवाज नहींं हो सकती। क्योंकि इनमें से कोई भी समग्र मधेश की बात ही छोडÞ दें, बहुजन का भी प्रतिनिधित्व नहीं करते। मधेश में और भी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल सक्रिय हैं। उनके भी जनाधार हैं। लेकिन राष्ट्रीय दलों की बात छोडÞ भी दें तो भी उनकी इस आवाज को समग्र मधेश की आवाज नहीं मानी जा सकती। काठमाण्डू से सम्बन्ध टूटने से अगर उनका मतलब राष्ट्र से अलग होना है तो उनका यह कथन मधेश में कितना र्समर्थन पाएगा कहना मुश्किल है क्योंकि अलगाव मधेश का मुद्दा नहीं है। बार-बार किसी के व्यक्तिगत बयानों के आधार पर मधेश को कठघरे में खडÞा करना उचित नहीं है। फिलहाल कोई भी अगर विखण्डन की बात करता है तो यह बात र्समर्थन योग्य नहीं है।
अपनी चतर्ुर्ििक आलोचना होती देख श्री गुप्ता ने अपनी सफाई प्रस्तुत की और इस सम्बन्ध में महामहिम राष्ट्रपति से मिलकर अपना पक्ष भी रखा जिसमें मधेश के हिंसक आन्दोलन की मनःस्थिति में रहने की बात कही गई। यह भी कहा गया कि मधेश की जनता में व्रि्रोह की मानसिकता है। ऐसी अवस्था रही तो मधेश और काठमाण्डू का सम्बन्ध टूट सकता है। अपनी माँगों को लेकर मधेश को निर्ण्र्ााक व्रि्रोह में जाने की संभावना है। व्यावहारिक धरातल पर यह बात कही जा सकती है कि सफाई प्रस्तुत करना एक तरह से एक कदम पीछे हटना है। एक कदम पीछे हटकर श्री गुप्ता ने यह संकेत दिया है कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता के प्रति उनकी संवेदनशीलता है, लेकिन मधेश का प्रतिनिधित्व करने के कारण उसके प्रति दायित्व निर्वहन भी उनका कर्त्तव्य है। इसलिए इस मुद्दे पर फिलहाल पटाक्षेप किया जाना चाहिए।
वैसे भी मधेशी राजनीत की डगर थोडा कठिन है। मधेश और मधेशियों के हितों की बात करना राष्ट्रीय हितों के अनुकूल नहीं माना जाता। कमोवेश सभी मधेश आधारित दलों के नेता इन आरोपों से अतीत में आरोपित हुए हैं और जब कभी वे अपने मुद्दे और एजेण्डे की बात करेंगे तो फिर से उनके आरोपित होने की संभावना है। अब उनके लिए एक ही उपाय है कि या तो वे मुद्दे को छोडÞ दें या राष्ट्र के तथाकथित राष्ट्रवादी दलों से वैचारिक एकता कायम कर अपने राजनैतिक व्यक्तित्व का विर्सजन कर दें या यथास्थितिवाद में राम-नाम का जप करें। आज विवादों के घेरे में श्री गुप्ता अपने कथन को लेकर हैं और मधेश आधारित दलों के अन्य नेता भी महज इसलिए विवादों के घेरे में हैं कि इस कथन पर वे खामोश हैं और तटस्थ हैं। कुल मिलाकर उनकी यह खामोशी उन्हें तमगा दिलाने की स्थिति में नहीं है। उनके द्वारा श्री गुप्ता के कथन का विरोध नहीं किया जाना भी किसी न किसी रूप में उनके राष्टर््रधर्म पर प्रश्न-चिहृन खडÞा कर रहा है। मधेश तो उनकी ओर प्रश्न भरी निगाह से देख ही रहा है।
यहाँ यह कहना उद्देश्य नहीं कि श्री गुप्ता या श्री भण्डारी के कथन आदर्श थे। अगर उनके कथनों से राष्ट्र की एकता-अखण्डता पर प्रश्न-चिहृन खडÞा होता है तो उनकी आलोचना होनी चाहिए और खुलकर होनी चाहिए। इस विषय पर राष्ट्राध्यक्ष ने जो संज्ञान लिया, उसे भी अनुचित नहीं ठहराया जा सकता। राष्ट्रप्रमुख होने के कारण उनका भी दायित्व है कि राष्ट्र की एकता और अखण्डता के प्रति सजग रहें। लेकिन सवाल यह है कि जब कभी मधेश के अधिकारों, अवसरों और पहचान की बात होती है तो उसे राष्ट्रीय हितों के विपरीत क्यों समझा जाता है – क्यों मधेश की पीडÞा को सहानुभूति की नजर से नहीं देखी जाती – क्यों बार-बार मधेश पर अलगाव का मनोविज्ञान पालने का आरोप लगाकर उसे अपमानित करने का प्रयास किया जाता – यह सच है कि अनिश्चितता और निराशा में कभी -कभी मधेशी नेताओं के वचन तल्ख हो जाते है। एक तरह से यह शांतिपर्ूण्ा आन्दोलन के प्रति उनके घटते अविश्वास का भी संकेतक है। जरूरत है अन्ना हजारे की तरह शांतिपर्ूण्ा आन्दोलन का दामन थामकर राष्ट्र और उसकी राजनीति का मिजाज जानने और समझने की।
पिछले दिनों राष्ट्र ने लगातार दो आन्दोलनों को झेला। जनान्दोलन-२ तानाशाही और राजतंत्र के विरुद्ध था और चरणबद्ध रूप में सम्पन्न हुआ मधेश आन्दोलन उपेक्षित वर्ग के अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में बढÞा हुआ एक कदम था। इन आन्दोलनों से देश की राजनैतिक चेतना बदली, विचार बदले। जो वर्ग सदियों से स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे थे वे राज्य में अपनी पहचान और समानता के आधार पर अपनी हिस्सेदारी खोज रहे हैं। लेकिन जो पारम्पकि राजनैतिक सोच है उनके लिए उनकी हर आवाज    राष्ट्र के लिए अहितकारी माना जाता है। एक बात तो निश्चित है कि जिस आशा और अपेक्षा से जनान्दोलन-२ को लोगों ने मुकाम पर पहुँचाया, मधेश आन्दोलन विभिन्न चरणें में सम्पन्न हुए, आम लोगों की वे अपेक्षाएँ अब तक अधूरी हैं। लंबे संक्रमणकाल के कारण नीतिगत स्तर पर महत्वपर्ूण्ा फैसले नहीं लिए जा रहे। राजनैतिक खींचतान और आरोपों-प्रत्यारोपों के कारण जनता गुमराह है और कुछ हद तक निराश भी। इस निराशा में कभी-कभी तिक्त और तीक्ष्ण अभिव्यक्तियाँ आती हैं। इसलिए ऐसी अभिव्यक्तियों का मूल तलाशने का प्रयास किया जाना चाहिए। मौजूदा समय में मधेश आधारित दलों के अनेक ऐसे नेता हैं जो अपनी मुखरता के कारण विवादों के घेरे में हैं और वे भी नेता विवादों से मुक्त नहीं हैं जो इस मुद्दे पर खामोश हैं। कुल मिलाकर पूरी मधेशी राजनीति ही विवादास्पद बन चुकी है।
आज छोटी छोटी बातों के कारण तूफान खडÞा होता है। इसका मूल कारण है कि राजनैतिक स्तर पर हमारा तंत्र कहीं न कहीं कमजोर है और सही को सही और गलत को गलत कहने की स्थिति में हम नहीं। आज मधेश की राजनीति कर रहे नेताओं की बात छोडÞ भी दें तो भी प्रधानमंत्री जैसे जिम्मेवार पद को सुशोभित कर रहे व्यक्ति जिनकी विद्वता भी राष्ट्रीय स्तर पर असंदिग्ध मानी जा रही, वे भी राष्ट्र के र्’मर्ज’ या ‘सबमर्ज’ हाने की बात कर रहे हैं। अपनी उदारवादी छवि और साफगोई के कारण वे भी विवादों के घेरे में हैं और एक कदम पीछे आकर उन्होंने भी अपनी सफाई प्रस्तुत की है। एक बात तो निश्चित है कि जो गलत है वह गलत है और उसका शमन करने के लिए राज्य को मजबूत होना चाहिए। राज्य तब तक मजबूत नहीं होता जब तक लम्बी-लम्बी बातों को छोडÞकर आधारभूत धरातल पर ठोस काम न हो, राज्य के निकाय स्वतंत्र और निष्पक्ष न हो। जिस लोकतंत्र को स्थापित करने के लिए लोगों ने संर्घष्ा किया, शहादत दी ( उसके नाम पर र्समर्थ-अर्समर्थ जनप्रतिनिधियों का बोझ राष्ट्र को मिला, एक अंतहीन संक्रमण काल और एक कमजोर होती अर्थव्यवस्था। जनान्दोलन के पाँच साल गुजरने को हैं। लेकिन देश संविधान प्राप्त करने की दृष्टि से अभी भी दोराहे पर खडÞा है। कुल मिलाकर जनान्दोलन-२ की उपलब्धियों को अब तक संस्थागत नहीं किया जा सका और न ही मधेश आन्दोलन की संवेदना को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोडÞा जा सका। असफलता राष्ट्रीय और क्षेत्रीय-दोनों ही स्तरों के नेताओं का माना जा सकता है।
आज मधेश के मुद्दे पर राजनीति के ऊपरी स्तर पर चाहे जितना क्षोभ-विक्षोभ दिखलाई दे मगर जनस्तर पर एक तटस्थता की स्थिति देखी जा रही है। कोई भी घटना या कथन फिलहाल मधेश में तूफान लाने की स्थिति में नहीं है और न ही कोई नेता समग्र मधेश को सडÞकों पर उतारने में सक्षम हैं। इसका कारण है मधेश की राजनीति कर रहे नेताओं के प्रति तेजी से क्षय होता जनविश्वास। अवसरवादी मधेशी राजनीति में आज श्री गुप्ता के प्रतिद्वन्द्वी और विरोधी निश्चित ही किसी न किसी रूप में सन्तुष्ट होंगे। स्वयं उनके दल में भी आज अनेक ऐसे नेता होंगे जो मंत्री की जगह खाली होने पर स्वप्न-लोक में विचरण कर रहे होंगे। लेकिन अपने इस राजनैतिक मनोविज्ञान में मुद्दों को लेकर वे कहाँ तक की यात्रा कर पाएँगे कहना मुश्किल है।
आज सबसे अधिक महत्वपर्ूण्ा है कि विवादों और आरोपों-प्रत्यारोपों से आगे निकलकर संवैधानिक रूप में राष्ट्र को निकास दिया जाए। दाता का मनोविज्ञान छोडÞकर एक ऐसा शासनतंत्र राष्ट्र में स्थापित हो जिसकी छाया में हर वर्ग के लोग स्वयं को आश्वस्त समझें और कदम से कदम मिलाकर राष्ट्र-निर्माण में अपना योगदान दे। जिस दिन समता और निष्पक्षता पर आधारित शासन की स्थापना होगी, सामाजिक न्याय की बात हर राजनैतिक दल की प्राथमिकता होगी, वास्तव में उस दिन नव-नेपाल की स्थ्ाापना होगी और तब अगर इस तरह के बयान आएँगे जिससे पृथकतावादी चिंतन की बू आएगी तो जनता उसे कभी माफ नहीं करेगी। ±±±

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