मधेश मुद्दों पर मंडराता संकट

कैलास दास

कैलाश दास

मधेश का मुद्दा संकट में है । मधेश के नेतृत्वकर्ताओं का मुद्दा एक होते हुए भी विचार एक नहीं है । ऐसी स्थिति में मधेश का अधिकार संविधान में सुनिश्चित सम्भव है या नहीं मधेशी जनता के लिए एक सवाल खडा कर रही है । मधेश नेतृत्व दलों का रवैया अभी भी स्पष्ट नही है । जनकपुर उद्योग वाणिज्य संघ में मधेश विरोधी संविधान मसौदा २०७२ विरुद्ध ‘विरोध सभा’ किया गया जिसमें तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष महन्थ ठाकुर, संघीय समाज फोरम नेपाल के अध्यक्ष उपेन्द्र यादव, सदभावना के अध्यक्ष राजेन्द्र महतो, तराई मधेश सद्भावना के अध्यक्ष महेन्द्र राय यादव सहभागी थे ।
सभी का लक्ष्य एक ही था । प्रारम्भिक मसौदा में मधेश के साथ किया गया विभेद जनता के समक्ष लाना । सभी ने अपनी अपनी रामकथा भी सुनायी । सवाल यह है कि मधेश के सवाल पर आम सभा का आयोजन सीमित जगहाें पर क्यों किया गया । उसमें भी अधिकांश पार्टी के कार्यकर्ता ही शामिल थे । जिस पार्टी के कार्यकर्ता जितना ज्यादा थे अपने अध्यक्ष के भाषणो पर उतनी ही अधिक ताली बजा रहे थे । बहस था मधेश के विभेद पर, किन्तु मधेश के विभेद हटाने से पहले उनमें  ही विभेद देखा गया ।
राजतन्त्र के अन्त के बाद यानी आठ वर्ष से निरन्तर अधिकार के वास्ते मधेशी जनता ने बन्द, हड़ताल, नारा जुलुस और कुर्वानी दी है क्या वह अधिकार हासिल हो सकेगा ? जिस अधिकार के लिए ५४ मधेशी शहीद हुए, सैकड़ौं घायल, अंपग, बेरोजगार इन सबको अधिकार इस संविधान में मधेश के नेतृत्वकर्ता दिला सकेंगे ?क्या ये भरोसा दिला सकते हैं कि  जिस प्रकार का हत्या हिंसा का सामना आज मधेश ने किया है आगे उसका शिकार अब नही होना पड़ेगा ? या फिर से मधेशी जनता को विगत जैसा ही करना पड़ेगा !  सवाल पर सवाल उठने स्वभाविक हैं । आखिर बार–बार मधेशी जनता को ‘आन्दोलन का रास्ता’ ही क्यों अपनाना पड़ रहा है ? कहीं न कहीं मधेश के नेतृत्वकर्ता में स्वार्थ और सत्ता का लालच हैं, तभी तो वर्षो के संघर्ष के बावजूद भी ‘सफलता’ हासिल नही हो सकी ।
एक बार ठोकर खाने से मुर्ख भी सम्भल जाता है । परन्तु हम बार–बार ठोकर खाकर भी खड़े नही हो सके । २०६३÷०६४ के मधेश आन्दोलन में स्मरण होना चाहिए कि पुलिस की लाठियाँ बरस रही थीं, लोग आँखे मीचते हुए अपने बचाव में लगे थे । कहीं अश्रु ग्यास तो कहीं गोली चल रही थी । चौक–चौक पर नारा जुलुस और धुआँ फैला हुआ था । जिन्दावाद का नारा हर ओर सुनाई पड़ता था । किसी एक चौक से बल जुलुस तो दुसरा चौक से अर्धनग्न जुलुस । पुलिस ‘जुलुस’ को तितर वितर करने में लगी थी । कितनी माँओं की गोद सूनी हो गयी तो कितनों के सुहाग मिट गए । तत्पश्चात, इस बार जो मसौदा आया है, उसमें न तो उस आन्दोलन में हुए शहीद को सम्मान मिला और न ही मिला विगत में हुए सम्झौते को कहीं पर स्थान । एक कहावत है ‘हम भले तो जग भले’ अर्थात आठ वर्ष के बाद भी मधेश नेतृत्वकर्ता सवल नही हुआ इसका दोषी भी हम ही है ।
हम दूसरों का नेतृत्व हमेशा स्वीकारते रहे हैं । सत्ता और सिंहासन के लिए एक दूसरे के पीछे चलते रहे । एक नहीं अनेक टुकड़ाें में बँटते रहे । सीधी सादी मधेशी जनता भी बार–बार गलतियों को भुलाती रही । फिर भी देखा जाए तो मधेश के नाम पर शासन करने वालो में ईमानदारी नहीं है । ३० दलीय मोर्चा गठन किया गया जिसके अध्यक्ष एमाओवादी के पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचण्ड’ थे । जिसमे अधिकांश दल मधेश के मुद्दों का नेतृत्व करने वाले मधेशी दल ही हैं । एमाओवादी तो मधेश के प्रति अपना चरित्र दिखा ही दिया । लेकिन मधेश के संघीय समाज फोरम नेपाल, तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी, सद्भावना पार्टी, तराई मधेश संघीय सद्भावना पार्टी नेपाल चार दल मात्र मधेश मुद्दा को लेकर आगे हैं । सवाल तो यह है कि क्या मधेश का नेतृत्व करने वाला यही चार पार्टी हैं ? अगर है तो २५ पार्टी कहाँ गुम हैं ? सत्ता और सिंहासन के लिए मात्र खोला गया है तो जनता उसका भी हिसाब अवश्य रखेगा । फिलहाल आवश्यक है संविधान में अधिकार कैसे सुनिश्चित किया जाए । वैसे मसौदा विरुद्ध मधेश में हुए आन्दोलन से शासक समझ चुके हैं कि मधेश का मिजाज क्या है । इसका मतलव यह नही विगत में हुआ सम्झौता कार्यान्वयन  करेंगे । ऐसा भी हो सकता है कि फिर शासक नया चाल चलें । इसमे हमें सर्तकता की आवश्यकता है ।
संविधान के प्रारम्भिक मसौदा में मधेशी जनता के साथ सबसे बड़ा विभेद नागरिकता में किया गया है । उसके बाद का जो विभेद है वह तो सभी के लिए है ही । सीमाकंन, नामांकन, संघीयता, लैङ्गिक असमानता, नश्लवादी चिन्तन, विभेदकारी भाषिक नीति, सर्वोच्च अदालत के आदेश को अवहेलना, विभेदकारी प्रस्तावना, संसदीय व्यवस्थापिका और निर्वाचन प्रणाली, एकल जातीय और एकात्मक न्याय प्रणाली, प्रेस स्वतन्त्रता उपर अंकुश, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध सम्बन्धी नीति सहित है । इसमें भी संशोधन होगा यह निश्चित है । परन्तु विगत में मधेशी दल के साथ जिस प्रकार से समझौता हुआ क्या वह शतप्रतिशत संविधान में लाऐगा । वैसे भी स्वायत मधेश एक प्रदेश की जगह मधेश में तीन प्रदेश तो हो ही चुका । अब रही बात नागरिकता की तो इसमें हमें दृढ़ और अडिग होना पड़ेगा ।
प्रारम्भिक मसौदा पर ‘राय संकलन’ के विरोध करने पर मधेशी जनता के ऊपर जिस प्रकार से बर्बता पूर्वक प्रहरी ने लाठी प्रहार किया वह लोकतन्त्र के नाम पर दमनतन्त्र है । इसका भी दोषी हमारे मधेश नेतृत्वकर्ता ही है । अगर इनमे थोड़ा भी निःस्वार्थ होता तो किसी कोठे में आम सभा वा अन्तरक्रिया नहीं जनता के साथ सड़क पर अधिकार के लिए संघर्ष करते । सी.के. राउत भी मधेश के सवालो को लेकर बारबार प्रहरी का यातना भोग रहे हंै । जेल से सड़क उनकी दिनचर्या बनी है । लेकिन उन्हें भी अपने साथ लेकर कदम से कदम मिलकर क्याें नही चलना चाहते हंै मधेश नेतृत्वकर्ता । अभी आवश्यक है मधेश का अधिकार संविधान में समावेश करना । हम हमेशा विरोध करते आए है । खस शासकों ने मधेशी जनता का शोषण दमन किया है । उसके प्रतिउत्तर में हमेशा मधेशी जनता को आन्दोलन में उतरना पड़ा है जिनमे अर्थ से लेकर भौतिक क्षति मधेशी जनता को ही भुगतना पड़ा है और उपलब्धि शून्य है ।
अब आन्दोलन, संघर्ष से ज्यादा महत्वपूर्ण है अपना मसौदा तैयार कर जनता के समक्ष लाएँ । आन्दोलन नेपाल के लिए महत्वपूर्ण है । अभी तक आन्दोलन के कारण ही नेपाल का अर्थतन्त्र खत्म हो चुका है । अब आवश्यकता है मसौदा के विरोध में अपना मसौदा मधेशी जनता को दिखाबें । मसौदा में मधेशी का अधिकार सुनिश्चित करे । इस मसौदा में केवल मधेशी जनता का अधिकार नहीं नेपाल के हरेक वर्ग समुदाय का अधिकार सुनिश्चित होना चाहिए । तब हम नेपाली जनता के आगे अच्छे अभिभावक के रूप में पहचान बना पाएँगें । राजनीति किसी क्षेत्र, समुदाय और जाति के लिए नहीं होनी चाहिए । राजनीति राष्ट्र, समाज और विकास के लिए होनी चाहिए । 

loading...

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz