मधेश में चल रहे “आन्तरिक–सामाजिक विभेद विरुद्ध क्षमायाचना अभियान” : बिनोद पासवान

बिनोद पासवान, २९,जून |
मधेसी बुद्धिजिवीयों की गर्मा–गर्मी ने मधेश के गर्मी मौसम को भी मात दे रखा है ।
प्रसँग है, मधेश मे चल रहे “आन्तरिक–सामाजिक विभेद विरुद्ध क्षमायाचना अभियान“ ।

binod paswan

अभी ये बिषय पर लोगों के राय मुख्य दो तरफ बटे हुए हैं । पहले वालों के बिचार से लगता है कि यही उपयुक्त समय भी है जब मधेश आन्दोलनके साथ्(साथ हमे अपने सामाजिक विकृति बिरुद्ध परिवर्तन और रुपान्तरण का भी प्रयास करना चाहिए । लेकिन दुसरे तरह सोचने वालोंके हिसाबसे अभी ये कतई उचित समय नही है, इससे समग्र मधेसी आन्दोलनमे असर पडेगा और ऐसा काम करनेसे मधेश मे जातिबाद फैलने का डर हो सकता है ।
शुरु करते है पहले वालों के बिचारसे, चुंकि ये सीधी सरल बात है तो समझ सकते है कि ये एक शुद्ध हृदयसे किया गया प्रयास है । फिर भी जैसे थोडे समयके लिए मानो नाट्यमन्च पर बीररस का प्रस्तुति होते होते अचानकसे भक्ति रस का मन्चन होने लगे तो थोडा असहज मशसुस हुआ हो । बस हुआ इतना हि है । इससे समग्र मधेश आन्दोलन मे प्रत्यक्ष प्रभाव पड्ने की बातसे कोइ लेना देना नही है । ये मात्र एक सामाजिक सचेतना अभियान है जैसे अन्य गैर सरकारी संस्था कोइ अभियान चलाने का काम करते है ।
दुसरा बिचारस चुंकी ये बडी बात है नही लेकिन कुछ लोगोंको तिल जितना चीज पहाड दिखाइ देने लगता है । वो सोचते है के ऐसा तो अभी कोइ अजेन्डा था ही नही, ये अचानक से आन्दोलन के समयपर कोइ षड्यन्त्र तो नही मधेश आन्दोलनका तेजोबध करनेका ?
मुझे लगता है, वे गलत फहमीके शिकार है जो मधेश आन्दोलनके समय राजधानी मे बैठे चाय के चुस्कीके साथ पत्रकार सम्मेलनर अन्तरवार्ता मार्फत मधेश मे हो रहे घटनाक्रम के बिश्लेषणमे ब्यस्त थे, या ऐसे लोग जो घर बैठे कुछ लोग, फेसबूक,ट्वीट्टर, टि.भी पर मधेश समाचार का लुत्फ उठा रहे थे । इन्हें जातिबादी हावी होनेका डर इसलिए है कि ये खुद सर्वसत्ताबादी सोचसे ग्रसित हैं । तुलना करें तो अभी राष्ट्रिय स्तरपर हो रहे राज्यसत्ताके बिरुद्ध मधेसी, मंगोल का पहिचानका संघर्श भी उन्हें ऐसे हि ब्यर्थ और जातिबादी लग सकता है ।
बहरहाल अभी इस “आन्तरिक–सामाजिक विभेद विरुद्ध क्षमायाचना अभियान“ मे बिशेषतः ऐसे लोग जुडे हुए है जो मधेश के दुख मे, मधेश आन्दोलन के क्रम मे राज्य द्वारा पीडित लोगों के दिलोंपर लगे जख्मपर मल्हम लगाने उनके घर घर तक पहुंचे । इस दौरान जब उन्होंने मधेशके ग्रामीण ईलाक ेमे जमिनी स्तर पर महशुस किया के यहाँ तो बिभिन्न सामाजिक समस्यायों का पहाड अभी और भी बाँकी है, हमे अपने आप से भी संघर्श करना अभी बाँकी है । तब जाकर वही उर्जावान लोग मिलकर ये अभियानके तहत मधेसी समाजमे ब्याप्त आन्तरिक बिभेद के बिरुद्ध स्वयम के परिवार द्वारा भी अगर बिगतमे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से बिभेद कार्य मे संलग्नता रहा हो जिसके कारण कुछ लोग जो पीछे पड गए, वे उपेक्षित समुदाय से क्षमा मांगने का अभियान शुरुवात किए । इसे सामाजिक रुपान्तरणका अहम कदम मान सकते है जब पीडक समुदाय के प्रतिनिधि स्वयम पीडित समुदाय के दर्द को महसुस करके पश्चातापयुक्त क्षमा मांगने पीडित के दरवाजे तक पहुंचते हैं । यह एक मनोबैज्ञानीक प्रकृया है जिससे बिभेद मे पडे लोगों को बराबरी का सम्मान देकर उन्हें मनोबैज्ञानीक रुप से सबल बनाने का काम कर रहे हैं । इसी तरह हरेक ब्यक्ति,समाजमे मानसिक परिवर्तनके माध्यम से ही सामाजिक रुपान्तरण सम्भव हो सकता है । ये तो मात्र पहला चरण है, गरीब और उपेक्छित समुदायको मानसिक तालिम देनेका प्रयास है । ये उनका आत्मबल, आत्मस्वाभिमान और हिम्मतको उठानेका प्रयास है । उनको एह्सास दिलानेका कि “मधेशी समाजमे हमारा भी उतना हि योगदान है जितना के औरोंका, हम भी बराबरके हकदार है और हमारे अन्दर भी वही काबिलियत हासिल करने का प्राकृतिक देन है ।“
अब बस इन्हें जरुरत है तो थोडी हिम्मत और कुछ सामाजिक सुरक्षा की । इसिलिए मधेशी अभियन्तालोग अभी उनका हिम्मत बढानेका काम कर रहे हैं, बाँकी उनको सामाजिक सुरक्षा जैसे शिक्षा,रोजगारी इत्यादिमे बिशेष अवसर देकर आगे लानेका काम ब्यक्तिगत,संस्थागत और सरकारीस्तर पर करना और भी बहोत बाँकी है ।
इस अभियानमे जिनका समर्थन नही है, उनको बस इतना कहना चाहुंगा कि यहाँ समाजिक परिवर्तन लानेके लिए हर क्षेत्र के लोग अपने अपने तरिके से काम करते हैं । गैर सरकारी संस्था चलानेवाले अपने तरिकेसे सोचेंगे, कलम चलानेवाले अपने तरिके से सोचेंगे, सरकार अपने तरिके से सोचेगी । इसलिए हम सबलोग मिलकर हम सभी का समान मिसन(सामाजिक बिकासके लिए एक दुसरेका साथ दें । एक दुसरे की खिंचाइ करनेसे भला किसी का नही होगा, इससे बल्की लोगोंमे बिपरीत प्रभाव पड सकता है । मधेशमे सामाजिक न्याय और समानताके लिए और क्या(क्या किया जा सकता है, उसपर सुझाव(सल्लाह दें और खुद भी आगे आकर काम करके दिखाएं । तब मात्र ऐसे अभियान सहि मायनेमे सार्थक हो सकेगा ।
आजकल जो मधेशके अगुवा, नागरिक समाजके अभियानी विद्वान लोगोंने मधेशके आन्तरिक अनुसन्धानके बाद शुरुवात किया है, यह अत्यन्त हि सराहनिय कार्य मानता हुँ । अभियानी सभी विद्वान महानुभावको बिशेष रुपसे प्रशान्त झा, दीपेन्द्र झा,तुलानारायण साह सभीको हार्दिक आभार प्रकट करता हुँ । ,साथ हि इस अभियानमे और लोगोंको भी सामिल होनेका आह्वान करता हुँ ।
अपेक्छा है कि इस अभियानसे खस नश्लबादीयों को भी थोडी बहोत सीख मिलेगी जिन्हें कभी महशुस भि नही हुआ के उनके हि कारण आजतक बिभिन्न भाषिक, साँस्कृतिक समुदाय प्रताडित और उपेक्छित बनी हुई है । और पता चले कि इस मामलेमे मधेसी समाज कितना उदार है । आशा है, ऐसा सदभाव भाइचारा हमेशा मधेश मे बना रहे, हर पर्ब(त्योहारोंमे भी बिशेष रुपसे देखनेको मिले । कामना करता हुँ कि ये अभियान केवल प्रचारात्मक न होकर, प्रतिफल दायक बने । (
कल करे सो आज कर – आज करे सो अब | Go together, Grow Together

loading...