‘मधेश में बसाेवास करनेवाले मुस्लिम ही वास्तविक मधेशी” : अब्दुल खान

msjidअब्दुल खान, भैरह्बा, ५ मई |  मानव का बसाेवास और जीवन शैली पहचान दर्शाने का काम करती है। मानवों की बसाेवास करनेवाले भू-क्षेत्र ही पहचान निर्धारण करने का मुख्य भुमिका निर्वाह करती है। संसार रुपी ईस पृथ्वी मे शासन करने की महत्वकाक्षां के कारण मनुष्यों ने जमीनी बनावट को टुक्रा-टुक्रा किया तत्पश्चात देश का सिमाङकण हुआ । देश के हिसाब से मानव का पहचान कायम हुआ , उसमे भाषा, संस्कृति, मनाेवैज्ञानिक विचार नें पहचान कायम करने मे सोने मे सुहागा का काम किया। अाज मनुष्य जिस देश में बसाेवास करते हैं उसी मुलुक की वासिन्दा के नाम से परिचित होते हैं । उदाहरण के लिए नेपाल में रहनेवाले नेपाली,जापान में रहनेवाले जापानी होते हैं । मधेश में मानव की हत्या होती है , लडकीयाँ बिक्री बेचविखन होती है , अागलगी,बाढ/ डुवान होती है , वो समाचार राष्ट्रिय मिडीया का हेडलाईन नही बनता लेकिन जहाँ समाज को ताेडने का कार्य होता है, अापस के सामाजिक मेलमिलाप में खलल पडने किसीम की बात हो तो वो हेडलाईन न्युज बनता है । परन्तु सैंकडाे सर्वसाधारण उपर देशद्राेह का मुद्दा लगने पर वो समाचार नही बनता ।

मैं मानता हुँ मुस्लिम नेपाली होते हैं, मुस्लिम अमेरिकन होते है, किन्तु मैं दावे के साथ कहता हुँ मुस्लिम मधेशी अावश्य होते है । मधेश की भु-भाग में बसाेवास करनेवाले सम्पूर्ण मुस्लिम सामुदाय मधेशी है, ये बात सत्य है की मधेश वर्तमान अवस्था में नेपाली सम्राज्य अन्तर्गत रहा है, जैसा किसी वक्त हिन्दुस्तान उपर बेलाईती सम्राज्य कायम था, उस समय में हिन्दुस्तान की मुसलमान अपने को बेलायती नही केहते थें, वैसा ही अवस्था अभी मधेशी मुस्लिमों का रहा है । मधेश का ईतिहास को निहारने पर मधेश में मुस्लिम राजा और नवाब ने शासन किया हुआ देखा जाता है, मुस्लिम बादसाह गयासुद्दीन ने सन् १३२४ में मधेश के राजा को युद्ध में पराजित कर मुस्लिम शासन कायम कर कूछ हाथी और नजराना वसुल करने का चलन भी चलाया था । बाद में सन् १५७७ मे बादसाह अकबर ने जनकपुर क्षेत्र से कर उठाने की जिम्मा देकर पण्डित महेशवर ठाकुर को न्युक्त किया था । वर्षौं से मुस्लिम मधेशीयों के साथ मिलकर बार-बार नेपाली के साथ क्या नही लडा है, मधेशी, मुस्लिम एकजुट होकर नेपाल के साथ की लडाई लडा है, युद्ध का नजीर कायम है। मधेश में बसनेवाले मुस्लमानों की भाषा और मनाेविचार समानरुपी यानी एक जैसा है । धार्मिक संस्कार में भिन्नता अावश्य है जो की अपनी जाति में भी पाई जाती है । अापसि सुख: दुख में एक-अापस में मिलजुल कर समस्या समाधान करते है ।

नेपाल में अन्य मधेशीयों के जैसे ही मुस्लिमों की समस्या है, नागरिकता, राेजगार, सेना पुलीस, कर्मचारी और अन्य समस्याएँ भी वैसी की वैसी है । विभेद तो और मुस्लिम उपर अन्य मधेशी से अधिक है । ईराक में १२ नेपाली मारे जाने पर काठमाडाैं लगायत अन्य जगहों में मुस्लिम मस्जिद ताेडफाेड, अागजनी, घर दुकान में घूस-घूस कर क्या नही पिटा गया है, कुर्आन सडक पे नही फेका गया क्या ? अभी ही अान्दाेलन मे पानी माँग रहे मुस्लिमों पर क्या नेपालीयों ने दया किया है । क्या हम मुस्लमानों को काले धाेती, मुसल्टे, ईन्डियन नही कहते है, तो फीर हम कैसे मधेशी नही है कैसे कहने को मिलेगा । मैं कहता हुँ हमारे पुर्वजों द्वारा शासन की गई जमिन मधेश है, हम वास्तविक मधेशी हैं। देशमा सदियों से विधमान खस-बाहुन- क्षेत्री की दमनकारी संस्कार के कारण मुस्लिम समुदाय भी राजनैतिक, भाषिक, सांस्कृतिक शोषण और विभेद का शिकार हुआ है । सन् 2001 की एक तथ्यांक अनुसार ईस्लाम धर्मावलम्बियों की संख्या देश भर में 4.3% से ज्यादा औरर मधेस में 8.7% से अधिक है। मधेस के प्राय: सभी जिलों मे मुस्लमानों का बसोबास है। गोरखा, कास्की आदि जिलों में रहे मुस्लिम को पहाड़ी मुस्लमान कहा जाता है । सन् 1996 की मानव विकास सूचकांक प्रतिवेदन के अनुसार मुस्लिमों की सुचकांक मात्र 0.239 है, जो मुस्लिमों की पिछड़े होने का प्रमाण है। नेपाल सरकारका से मिलने वाली अवसर और सुविधाएँ अधिकांशत: पहाड़ी मुस्लमान को ही प्राप्त होती है। थारू के जैसे मुस्लमान को भी मधेस में अपनी भूमिका को सशक्त और महत्वपूर्ण बनाने के लिए और मधेस के सभी अंगो में अपना प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक तथा सामुदायिक एकता के प्रति कटिबद्ध होना आवश्यक है । शान्तिपूर्ण मार्ग द्वारा मधेस स्वराज की आन्दोलन के सफलता से ही मधेस के मुस्लमानों का भी अभीष्ट पूरा हो सकता है। मधेश किसी जाती विशेष की विर्ता नही, वल्कि सदियौं से याँ बसोवाश करते आ रहे सभी जाती, वर्ग, समुदाय औ सम्प्रदाय का साझा भूगोल है । हम सब का साझा सम्पत्ति, सँस्कृति एवं भौगोलिक राष्ट्र है जब मधेश समृद्ध होगा तब यहाँ रहनेवाले सभी पना समान हक अधिकार प्राप्त कर शान्तिपूर्वक जीवन निर्वाह करने की सुअवशर प्राप्त करेंगे तसर्थ वर्तमान अवस्था में हरेक मधेसी जनता को एकजुट होकर संघर्ष करने की आवश्यकता दिख रही है ।

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