मधेश में बैंकों की जमीनदारी, आर्थिक दोहन है जारी : कैलाश महतो


कैलाश महतो,परासी | अभी हाल फिलहाल ही नेपाल राष्ट्र बैंक ने एक ताजा अधिनियम लाकर बैंक ग्राहकों के लिए एक नयाँ समस्या खडा कर दिया है । राष्ट्र बैंक ने कहा है कि किसी भी बैंक में एक लाखतक का खाता खोलने के लिए खाता धारकों का पचियपत्र की आवश्यकतता होगी । वैसे यह अधिनियम पहले से ही कायम होने की बात कही जा रही है जिसके तहत KYC का ढाँचा बैंको में पूर्ण रुपेण लागू है । पर आश्चर्य की बात तब बन जाती है जब राष्ट्र बैंक यह नियम लागू करने की बात करती है कि किसी के द्वारा किसी व्यक्ति के खाते में चन्द पैसे भी अगर कोई रखें या ट्रान्सफर करें तो वो करने बाले व्यक्ति अपना परिचय और पैसे भेजने का प्रयोजन उल्लेख करें ।

राष्ट्र बैंक का कहना है कि इससे आतंक तथा आतंकी गतिविधियों पर नियन्त्रण किया जा सकता है । बैंक का अगर यह मनसुवा है कि आतंक और उससे जुडे अन्य हर गलत पहलूओं को रोकें तो यह निःसन्देह प्रशंसनीय बात है । मगर राष्ट्र बैंक का यह नेक उद्देश्य कहीं छल तो नहीं है मधेशियों को उल्लू बनाने तथा उसपर मनगढन्त बन्देज लगाने के लिए ? राष्ट्र बैंक के नजर में कौन से मधेशी ने कौन सा आतंकी गतिविधी का संचालन कब किया ? किस आतंकी को मधेश ने पनाह या सुरक्षा दी ? देश में शासन प्रशासन किसका है ? मधेशियों का…या… ? मधेश आतंक और आतंकी कृयाकलापों पर कभी भरोसा नहीं करता । किसी कारणवश किसी ने किया भी हो तो नेपाली शासन के ही रेखदेख में । उसीके फायदे के लिए । इतिहास यही बतलाता है ।

इतिहास यही कहता है कि नेपाली सरकार या उसके किसी भी निकाय ने जो भी नियम कानुन लगाने का काम किया है, वे सबके सब मधेशियों को बन्धक बनाने के उद्देश्य से, मधेश को लुटने के लक्ष्य से ।

संयोग से एक बैंक में ही काम करने बाले एक कर्मचारी मित्र मुझसे मिलने मेरे घर पर आज ही आये थे । बैकों के काम, कर्तव्य, चरित्र और उद्देश्यों के बारे में कई बातें हुई । बातों के क्रम में ही उन्होंने बताया कि नेपाल सरकार तथा राष्ट्र बैंक की जो रणनीति है, उसके अनुसार मधेश बहुत जल्द कंगाल होने के कगार पर है । उन्होंने यहाँतक कहा कि मधेश में बैंकों की जमीनदारी और आर्थिक दोहन इस कदर जारी है कि मधेश का आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और राजनीतिक शक्तियाँ खुद व खुद कुछ वर्षों में धरासायी हो जायेंगी ।

बातचीत के क्रम में उन्होंने बताया कि १.५ से लेकर २ं.० प्रतिशत् के ब्याजों पर लाये जाने बाले पैसों को नेपाली बैंकों ने बैंकों के ऋणियों को १८ से लेकर २१ प्रतिशत् के ब्याज पर ऋण उपलब्ध करायी गयी है । ताज्जुब की बात तो यह है कि सरकारी से लेकर गैरसरकारी बैंकों के ७० प्रतिशत् बैंक मधेश के भूमियों पर खोला गया है । मधेशी बस्तियों के बाहर भी खोले गये बैंकों का भी उद्देश्य सिर्फ मधेश को दोहन करने के रणनीति ही बनानी है । दूसरे ताज्जुब की बात उन्होंने यह बताया कि जनसेवा के नामपर खोले गये, या खोले जा रहे बैंकों की चरित्र को तुलना की जाय तो अत्याचारी जमीनदारों के अत्याचारों को भी मात देने बाला चरित्र बैंकों के हैं । जमीनदारी व्यवस्था में भी जमीनदार लोग अपने ऋणियों के साथ वो शलुक नहीं करते थे जो आजके विकास बैंकों का है । वे जमीनदार तो कम से कम उन ऋणियों पर दया, सहानुभूति या क्षमा कर देते थे जब कोई ऋणि उनके आगे हाथ पैर जोडकर खडे हो जाते थे । मगर समाज का सेवा करने बाले आज के बैंक और वित्तिय संस्थायें तो ऋणियों का सम्पति ही हजम कर लेते हैं बिना कोई मानवीय संवेदना के ।

उन बैंक कर्मचारी के अनुसार मधेश का ऐसा कोई घर नहीं जिसके नामपर बैंक का कोई न कोई कर्ज न हों । ७५ प्रतिशत् से ज्यादा ऋणि मधेशी हैं । नेपाल सरकार अपने योजना के अनुसार ही मधेशियों को ऋणि बनाने में सफल हो रही है । मधेश के हर घर, परिवार व व्यक्ति के उपर बैंकों का ऋण लादना ही नेपाल सरकार का अन्तिम लक्ष्य है । जिन बैंकिंग सुविधाओं को मधेश सुविधा मानता है, वह उसका मौत है, जो उधार में ही मधेश में बाँटा जा रहा है ।

उन्होंने इस बात को भी खोला कि बैंको की होने बाली कमाई में बिना कोई लगानी ३० प्रतिशत् रकम नेपाल सरकार ले लेती है । १० प्रतिशत् आम्दनी कर्मचारियों में बोनस के रुप में बाँट दी जाती है और बाँकी के ६० प्रतिशत् आम्दनी बाली रकम बैंक संचालकों में लाभांस के रुप में भागबण्डा लग जाता है । गौर करने बाली बात तो यह है कि बैंकों के शेयर धनियों में मुस्किल से ५ ही प्रतिशत् मधेशियों को भी रखा जाता है । सारा लाभांश ९५ प्रतिशत् के नेपाली लगानीकर्ता मधेश से उठाकर नेपाल ले जाते हैं ।

उन बैंक कर्मचारी का तीता अनुभव यह भी सुनने को मिला कि बेचारे मधेशी किसान और ऋणी हरदम इसी चिन्ता और फिराक में घुमते रहते हंै कि बैंकों का ऋण समय पर वो कैसे और कहाँ से तिरें । समयपर ऋण, साँवा या ब्याज चुक्ता न कर पाने के कारण बहुत से मधेशी किसानों की खेतबारी या तो निलाम हो जाने के अवस्था में है या कौडी के भावों में उसे बेचने को मजबूर होना पडता है और शनैः शनैः मधेशी किसान भूमिहीन होते जा रहे हैं जिसपर किसी राजनीतिक पार्टी या संघ संगठन की दृष्टिकोण नहीं है । आश्चर्य की बात तो यह उन्होंने बताया कि उन किसानों के बर्बादीयों में मधेशी दल के नेता समेत दिखायी देते हैं ।

उस कर्मचारी का सवाल यह रहा कि इसका समाधान क्या हो सकता है ?

यह सत्य है कि बदलाव किसी धनाढ्य या किसी व्यापारी से संभव नहीं होता । बदलता वही है जो बिगडता है । बिगडा हुआ परिस्थिती ही परिवर्तन को खोजता है । उस परिस्थिती के शिकार लोग व समुदाय या तो मर जाते हंै या मौजुदा परिस्थिती को बदलकर नयाँ हअलात को निर्माण करते हंै । यही शास्वत नियम है । यह हर युग में लागू हुआ है चाहे इरान के शासक लोग यूनान पर आक्रमण करने के समय हो या यूनान के महान् विश्व विजेता सिकन्दर का भारत वर्षपर हुए आक्रमण का अवस्था हो । शतिmशाली इरान के सामने जब हारता हुआ यूनान ने अपने हार आरै जित दोनों को प्राण प्रतिष्ठा मान लिया तो इरान की शतिm भी यूनान के सीमा से वापस आ गया । तक्षशिला के वीर सम्राट पोरस और उनके जनता ने अपने अवस्था को चुनौती मान लेने के कारण ही सिकन्दर को भारत से वापस लौटना पडा ।

मधेश तो अब अपना वजुद का लडाई लड रहा है । आजादी का लडाई लड रहा है । इस स्वराज के लडाई के बहुत सारे शान्तिपूर्ण तरीके और आयामें हैं । उसीके क्रम में हम नेपाल सरकार के विरुद्ध असहयोग आन्दोलन कर सकते हैं । उसे हम कर देना बन्द करेंगे । हमारे ही भूमियों पर हमारे उपर लादे गये अनैतिक तथा अमानवीय ऋणें को तिरना बन्द करेंगे । हम उसके राजनीतिक सञ्जालों को अस्वीकार करेंगे तथा अन्तर्राष्ट्रिय समर्थन जुटाते चलेंगे और नेपाली शासन चरमराकर गिर जायेगी ।

उन बैंक के कर्मचारी मित्र ने भी इस बात को स्वीकारा कि मधेशी किसानों के पास सबसे बडा हथियार अब उनके उपर लादे गये, और लादे जा रहे कर्जों को भुक्तान करना जिस रोज छोड दें, उसके कुछ महीनों के भितर ही नेपाली साम्राज्य मधेश से समाप्त हो जायेगा और मधेश को आजादी मिल जायेगी । और वही अन्तिम विकल्प है । आजाद मधेश ही मधेशियों का सुनहरा भविष्य है ।

 

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