Thu. Sep 20th, 2018

मधेश में विकास का मतलव, निश्चित है इसका विनाश : कैलाश महतो


कैलाश महतो, पराशी | गुलाम समुदायों के लिए विकास ठीक वैसा ही होता है, जैसा कि कोई चतुर आदमी किसी के कटे हुए हाथों के लिए सोने की घडी उपहार में दे दी हों, पैरहीन इंसान के लिए महंगे जुत्ते खरीदने की बात करते हों ।
विकास किसी गुलाम समुदाय के लिए नहीं होता । अगर होता तो बडे बडे शहरों में झुग्गियाँ नहीं होती । झोपडपट्टियाँ नहीं होती । वहाँ के लोग दाने दाने के लिए नहीं तरसते । अशिक्षा का शिकार नहीं होते । रोजगार और आरामदायी जीवन के लिए नहीं तरसते । विकास गरीबों को नहीं सुधारता, उसके गरीबी को बढाता है । विकास श्रम पैदा नहीं करता, श्रमिक और मजदूरों की संख्या बढाती है । विकास गरीबी को खत्म नहीं करता, उनपर दोहन फैलाती है ।
आज हर समाज में विकास की बात हो रही है । हर नेता और बुद्धिजिवी विकास की बात करते हैं । हर सरकार और पार्टी विकास का नारा देता है । हर एनजिओ और आइएनजिओ विकास का नारा देता है । सालों से नहीं दशकों से और दशकों से भी ज्यादा शताब्दियों से यह बात होती आ रही है । पर विकास के लिए ही विकास के आलावा किसान, मजदूर, श्रमिक, दलित, महिला आदि के जीवन में कोई क्रान्ति नहीं आयी । राजधानियाँ बनी तो शासकों के लिए । शहरों का निर्माण हुआ तो प्रशासकों के लिए । महलें बनी तो सत्ताधारियों ने कब्जा कर ली । सडकें बनीं तो बडे बडे व्यापारी एवं चमचमाती गाडियों ने छेक लीं ।

‐1_ Gilbert Rist s] History of Development cg’;f/, æDevelopment is a situation which denotes either a state or a process associated with such concepts as material well-being, process, social justice, economic growth, personal blossoming, or even ecological equilibrium.Æ

‐2_ Peit Robert Dictionary ‐1987_ s] cg’;f/, æDevelopment contains people’s economic growth, blossoming, progress, extension and expansion.Æ

‐3_ The Report of South Commission s] cg’;f/, æDevelopment is a process which enables human beings to realize their potential, builds self-confidence, and leads lives of dignity and fulfilment. It is the process which frees people from the fear of want and exploitation. It is a  movement away from political, economic, or social opression. Through development, political independence acquires its true significance. And it is a process of growth, a movement essentially springing from within the society that is developing.Æ

‐4_ The Human Development Report of 1991, by United Nations Development Programme s] d’tfljs, æThe basic objective of Human Development is to enlarge the range of people’s choices to make development more democratic and participatory. These choices should include access to income and employment opportunities, education and health, and a clean and safe physical environment. Each individual should also have the opportunity to participate fully in community decisions and to enjoy human, economic and political freedoms.Æ

उपर के चारों परिभाषा के इर्दगिर्द भी मधेश और मधेशी समुदाय पडते हैं क्या ? सारे के सारे विद्वान् और क्षेत्रों ने व्यतिm और समाज के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक न्याय, व्यतिmत्व की विकास, सहभागितामूलक राज्य तथा उनके वातावरणीय स्वास्थ्य पर चर्चा करते हुए उन तमाम क्षेत्रों में उनकी भेदभावरहित पहूँच तथा सहभागिता की बात की हैं । शासक लोग जनता के भूमियोंपर बडे बडे सडकें, महलें, कार्यालय आदि बनाने को ही विकास का परिभाषा बडे चालाकी और चतुरतापूर्ण ढंग से करते हैं, जबकि वह सर्वथा प्रपंच और धोखा है । जनता को उल्लू बनाने का रणनीति है ।
शासक के अनुसार का विकास जनता का विकास तबतक नहीं हो सकता, जबतक विकास के पहले चरण में लोगों की आर्थिक, शैक्षिक, सामाजिक तथा रोजगारी के आवश्यकताओं के उत्थान के साथ साथ उनके स्वाभाव, मनोदशा, अभिरुची, भाषा, साहित्य, संस्कृति, परम्परा, रीतिरिवाज, तथा समग्र रुप में उनकी जीवन शैली की विकास नहीं कर पाता हो । इन विकासों के आलावा जनता के नामपर किए जाने बाले हर बाह्य भौतिक विकास उनके लिए भ्रम तथा छल है । क्योंकि उससे जनता को हानियों के आलावा और कुछ मिलने बाला होता नहीं है ।
जिस विकास का नारा देकर नेपाल की राजनीतिक पार्टिंयाँ तथा उनके नेतागण निर्वाचन के सीढियों से सत्ता के आगोस में शरण लेने बाले हैं, उस विकास से मधेश और मधेशियों को कितना लाभ होने बाला है, इसकी जानककारी विगत के विकासों से मधेश को अवगत होना होगा ।
मधेश के राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक तथा बौद्धिक नेतृत्वों को यह जानकारी रखना बेहद जरुरी है कि नेपाल के शाह, राणा, पंचायत, प्रजातन्त्र या गणतन्त्र के विकास नीतियों से नेपाली साम्राज्य के पञ्जे में आये काठमाण्डौ के नेवार, विभिन्न राज्यों के आदिवासी जनजाति या मधेश के किसी मधेशी समुदाय को कोई लाभ हुआ हो । जनता के विकास के नामपर निर्मित सारे सडकें, कार्यालय एवं कार्यालीय भवनें, विभिन्न संघ संगठनों के नामपर खडे किये गये इमारतें लगायत सम्पूर्ण भौतिक सम्पतियाँ और संसाधनों पर क्रमशः शाह, राणा, पंचायत, प्रजातान्त्रिक तथा गणतान्त्रिक खस शासकों का ही कब्जा रहा है । उन विकास और आर्थिक संरचनाओं में किसी मधेशी या अन्य पीडित समाजों का नेतृत्व को पनपनेतक नहीं दी गयी है । सारे के सारे विकासों पर खस आर्यों का कब्जा रहा है । उन विकासों से उन भूमियों के मूल निवासियों को आघात मिलने के अतिरितm कोई लाभ नहीं हो पाया है । वे सारे विकास एक वर्ग की प्रगति, रोजीरोटी का आधार, ऐशो आराम का साधन तथा वहाँ के रैथानियों के लिए काल के अतिरितm कुछ भी सावित नहीं हो पाया है ।
काठमाण्डौ लगायत नेपाल अधिनस्थ सम्पूर्ण भूमियोंपर हुए सडक विकासों के कारण उन भूमियों के मूल वासियों की बचीखुची घर व जमीन सडकों में चली जा रही हैं । उनकी पूरानी बस्तियाँ उजडती जा रही है और नये बस्तियों में उन्हें स्थान नहीं दिए जाने की रणनीतियाँ बनायी जा रही हैं । उनके जमीनों पर शासकों की महंगी गाडियाँ चलती है और वे बेघर होते जा रहे हैं । जनसेवा के नामपर खुले और खुल रहे सरकारी तथा गैरसरकारी कार्यालयों व निकायों में बेहिचक खस लोगों की भर्ती की जा रही हैं । सुरक्षा के नामपर शासकों का खौफनाक साम्राज्य हर तरफ फैलता जा रहा है । यातायात साधनों के विकास के नामपर मधेशियों के खेतों में उगाये गये अन्नों को दोहन इस तरह हो रहे हैं जैसे दिनभर गडेरिये किसी के खेत में अपने घरेलु जानवरों को चराकर शाम को अपने घर चले जाते हैं और उसका सारा माल अपने पास रख लेते है, किसानों को ठूल्लू दिखा देता है । मधेशी लगायत अन्य पीडित समुदायों को लुटने के लिए हर चौक चौराहे पर दारु और शराब की दुकानें खोलकर समाज और परिवारों को बिगाडने का धन्धा फैलाया जा रहा है ।
मधेशियों के विकास की चाहत के बारे में कुछ दिन पूर्व एक मधेशी नेता ने “भोट दिने बेला रक्सीको माग गर्नेले विकास को ईच्छा राख्नु गलत हो” कहते हुए मधेशियों की विकास की चाहत की खण्डन कर दी है । इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मधेश में नेपाली नेतृत्व ही नहीं, मधेशी नेतृत्व भी विकास करना नहीं चाहती है । बाध्यतावश मधेश में विकास के काम शुरु भी होते हैं तो वह मधेशियों से बदला लेने के हिसाब से ही संभव है । क्योंकि नेताओं ने अरबों रुपयों का शराब, मांस, भोजन, पेट्रोल आदि जो खर्च किए हैं, वे उन्हीं मतदाताओं से ही तो वसूलेंगे न ! उसके लिए वे नेपाली पार्टियों के साथ राष्ट्र और राष्ट्रियता के नामपर सहमति कर सरकारें बनायेंगे, योजनायें बनेंगी और विकास का नाटक शुरु होगा ।
मधेश के विकास के नामपर होने बाले विकासों के साथ साथ दारुओं की हजारों दुकाने खुलेंगी । पहाडों से अन्धाधुन्ध नेपालियों की मधेश में आवागमन तथा बसाईसराई बढेगी, भूमि दलालों का व्यापार बढेगा, जमीनों की दलाली बढेंगी, मधेश की भाषा, संस्कृति तथा रीतिविाजों पर थप संकटें बढेंगे । विकास, सुरक्षा, स्वास्थ्य और रोजगारी के नामपर अनेक संस्थायें खुलेंगे, गैर मधेशी शासक, प्रशासक, कर्मचारी आदि की चहलपहल बढेगी , मधेश विरोधी कृयाकलाप बढेंगे, मधेशपर सुरक्षाकर्मियों की असुरक्षा बढेगी, मधेश का राजनीति मधेश के नियन्त्रण से बाहर जायेगा और सिमटते सिमटते उत्तर से दक्षिण के तरफ आते आते भारतीय और नेपाली शासनों के बीच उसे प्राणहीन बनना भी तय है ।
इतिहास यही कहता है कि २५० वर्षों में खस शासकों ने वही किया है जो अब भी उनके वंशज करना चाहते हैं । मधेश अगर बेहोशी में सिर्फ विकास का रट लगाता है तो यह निश्चित है कि उन विकासों से इसका विनाश तय है ।
विकास आजाद लोगों के लिए ही फलदायक होता है । अंग्रेजों ने तो विकास का ठेक्का ही लिया था भारत में । फिर भारत ने उन्हें क्यों ठुकराया ? विकास ही सारी चीज होती तो ब्रिटेन से स्कट्ल्याण्ड और स्पेन से क्याटेलोनिया अलग होने की बात ही क्यों करता ? अमेरिका से क्यालिफोर्निया सम्बन्ध तोडने का सोंच क्यों बनाता ?

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