मधेश में संभावना चुनौती और अवसर:
राज नारायण साह

नेपाल भौगोलिक एवं प्राकृतिक विविधता से परिपर्ूण्ा बहुभाषिक, बहुजातीय, बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक राष्ट्र है। उत्पति के हिसाब से करीब ३६ जातियाँ एवं ३५ जनजातियाँ यहाँ बसोबास करते हैं। सभी समुदायों की अपनी ही वेशभूषा, भाषा, बोली और संस्कृतियाँ है।
प्राचीन भारत के इतिहास में हिमालय और विध्य पर्वत के मध्य भू-भाग को मध्य देश कहते थे। भारत तथा आर्यावर्त में प्राचीनतम काल से आर्य संस्कृति का प्रधान केन्द्र मध्यदेश ही रहा है। वौद्धिक सहिष्णुता, ब्राह्मण ग्रन्थों तथा उपनिषदों की रचना यहाँ ही हर्ुइ है। रामायण और महाभारत का सम्बन्ध मध्यदेश से ही है। राम, कृष्ण आदिकवि, वाल्मीकी, गौतम बुद्ध तथा महावीर स्वामी ने पर्ूव मध्यदेश में ही जन्म लिया और अपने-अपने धर्मों का प्रचार किया। निर्वाण के प्राप्त हुए मौर्च तथा गुप्त साम्राज्य मध्यदेश की ही साम्राज्य थे।
संस्कृत, पाली अर्द्धमाग्धी, शौरसेनी, बज्रभाषा आदि का केन्द्र भी मध्यदेश ही रहा है। आजकल इसे हम साधारण तथा ‘हिन्दी प्रदेश’ कह सकते हैं। वर्तमान समय में मधेश जो नेपालका प्रमुख भू-भाग है, वहाँ की जनता जागृत हो रही है। उसके पीछे कुछ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण भी है। नेपाल के तर्राई अर्थात् मधेश की कला, साहित्य, संस्कृति और सभ्यता नेपाल और भारत दोनों देशों के गौरवान्वित करती आ रही है। मधेश का इतिहास ही नेपाल का प्राचीनतम इतिहास है।
मधेश -तर्राई) का अर्थः-
‘मधेश’ शब्द संस्कृत के ‘मध्यदेश’ शब्द का अपभ्रंस है, जिसका अर्थ है, बीच का देश। जिस प्रकार युनानियो ने ‘सिन्धु’ शब्द से ‘हिन्दु’ और ‘इण्डस’ शब्द से ‘इण्डिया’ शब्द का निर्माण किया, ठीक उसी प्रकार नेपाल वालो ने मध्यदेशीय शब्द को मधेशिया शब्दों में तथा ‘मध्यदेश’ शब्द को ‘मधेश’ में परिणत किया है। हिमालय पर्वत की निचली पहाडियों के दक्षिण और विंध्यपर्वत श्रृंखला के उतर का भाग मध्यदेश कहलता था। इस क्षेत्र के निवासियों को ही मधेशी अथवा मधेशिया कहते हैं। विनयपीटक जैसे पाली बौद्ध ग्रन्थों में भी मधेश अथवा मञ्भिmम देश का वर्ण्र्ाामिलता है। नेपाल के तर्राई समुदाय को सामूहिक रुप से मधेसिया कहा जाता है। इसका अन्य समुदाय से अलग वेश-भूषा, रहन-सहन, खान-पान, भाषा, साहित्य, संस्कृति, कला और पहचान है।
मधेश क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति
भौगोलिक रुप से नेपाल के तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया हैः हिमालय, पहाड और मधेश। मधेश को भी बाहरी मधेश और भीतरी मधेश में विभक्त किया गया है। मेधश नेपाल के दक्षिणी क्षेत्र का समतल भू-भाग है। जो पर्ूव में मेची नदी से पश्चिम में महाकाली नदी तक फैला हुआ हैं। मधेश का क्षेत्रफल ८२८२ वर्गमील है।
इस भूभाग में नेपाल के अति आकर्ष, मनमोहक, सुन्दर सदाबहार वन-जंगल, निरन्तर बहती रहने वाली छोटी-बडÞी सदानीरा नदियाँ, झरने और तालाव भरे पडेÞ हैं। कोशी, गण्डक, कर्ण्ााली, मेची, कनकई, कमला, महाकाली जैसी गंगा की सहायक नदियाँ इस भू-भाग में बहती है। प्रकृति ने इस भू-भाग को कृषियोग्य उर्वर भूमि प्रदान की है। अधिक अन्न उत्पादन बाली कृषि भूमि के साथ यह क्षेत्र महत्वपर्ूण्ा राजनीतिक, सांस्कृतिक केन्द्र भी रहा है। यह भूमि जगत जननी जानकी, राजषिर् जनक, सिर्द्धार्थ गौतम बुद्ध, राजा विराट आदि की जनम भूमि भी है। मधेश में १८ जिले हैं। भीतरी मधेश, चुरिया, श्रृंखला और महाभारत श्रृंखला के बीच का भू-भाग है, जिन में खासकर सर्ुर्खेत, दांग, चितवन, मकवानपुर, सिन्धुली और उदयपुर जिलों का कुछ भू-भाग पडÞता है।
मधेश की जनसंख्या
नेपाल की कुल जनसंख्या में मधेश की जनसंख्या ५१ प्रतिशत से ज्यादा है। सन् २००१ की जनगणना की अनुसार नेपाल में कुल जात/जातियों की संख्या १०३ है, जिसमें करीब ५६ से अधिक जातियाँ मधेशियों की है। राष्ट्र के अन्य भागों की तरह यहाँ का हिन्दु समाज चार जाति- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अनेक उपजातियों में विभाजित है। येन उपजातियों अति पिछडÞी हैं।
मधेश की भाषा
नेपाल एक बहुभाषिक देश है। यहाँ लगभग १०० से भी अधिक भाषाएँ बोली जाती हैं। मधेश में बोली जानेवाली भाषाओं में मैथिली, हिन्दी, भोजपुरी, अवधी, थारु, ऊर्दू, बंगला, राजवंशी, बज्जिका, मारवाडी, मगही, दर्रइ, माझी, दनुवार, नेपाली आदि प्रमुख भाषाएँ है। पर्ूव में मेची नदी से लेकर पश्चिम में महाकाली नदी तक के मधेशी समुदाय की सर्म्पर्क भाषा हिन्दी है। मधेश में हिन्दी एक महत्वपर्ूण्ा भाषा है। सम्पर्ूण्ा मधेश के लोग हिन्दी को सर्म्पर्क भाषा के रुप में प्रयोग करते हैं। पहाडÞ और मधेश के बीच में भी यह सर्म्पर्क भाषा के रुप में प्रयोग होता हैं। हिन्दी उनका विशिष्ट सांस्कृतिक एकता की पहचान है।
सामाजिक एवं सांस्कृतिक भेदभाव
भारतीय उप-महाद्वीप में नेपाल का मधेश क्षेत्र संस्कृति और परम्परा की दृष्टि से काफी समृद्ध है। मधेसियों की जाति प्रथा, खान-पान-भेष-भुषा, रहन-सहन, भाषा-संस्कृति आदि में खास विशेषता है। मधेश में शिक्षा कि विकास भी अच्छी तरह नहीं हो पाया है। सरकार की शिक्षा नीति और मधेसियों प्रति पर्ूवाग्रहपर्ूण्ा दृष्टिकोण होने के कारण और मधेशी समुदाय को भाषा और संस्कृतियों को विस्थापित कर यहाँ खस भाषा पहाडÞी संस्कृति की राज्य सत्ता के बल-बुते पर लादने की कोशिश हो रही है। यहाँ मधेशियों के ऊपर सांस्कृतिक अतिक्रमण हो रहा है। किसी जाति की पहचान को अगर समाप्त करना हो तो, पहले उसकी भाषा, संस्कृति को नष्ट कर दो, वह जाति या समुदाय अपने आप नष्ट हो जायगा।
आप्रवासन समस्या तथा मधेशियों पर इसका असर
पहाडी क्षेत्रों से मधेश में अप्रवासन को प्रोत्साहन दिया जाने लगा। पंचायत काल में मधेसियों को अल्पसंख्यक बनाने के उद्देश्य से वर्मा, बंगलादेश, भारत के असम, दार्जिलिङ, सिक्कम, मेघालय, देहरादुन आदि जगहो से नेपाली भाषा-भाषियों को नेपाल लाकर मधेश में बसाने के लिए सरकार द्वारा विशेष अभियान चलाया गया पहाडी आप्रवासियों के साथ-साथ उक्त विदेशी नागरिकों को भी मधेश में बसाया गया। झापा पर्ुनवास आयोजना, र्सलाही पुनर्वास आयोजना, कैलाली पुनर्वास आयोजना, कंचनपुर पुनर्वास आयोजना आदि इस प्रक्रिया में झापा, मोरंग, नवलपरासी, चितवन, सुनसरी अािद जिलों में थारुओं, राजवंशियों गनगाई, धिमाल, झागड, बांतर और सन्याल आदि को अधिकारों से बेदखला कर दिया गया है।
मधेसियों का आर्थिक शोषण
तर्राई के मूल निवासी मधेशियों का आर्थिक आधार कृषि, पशुपालन, वागवानी, मछली पालन, छोटे उद्योग और नौकरियाँ है। नेपाल के कृषि उत्पादन का ७०% भाग मधेश क्षेत्र है। सकल घरेलू उत्पादन की दृष्टि से तर्राई का योगदान ६५% है। इसी प्रकार देश के कुल कृषि उत्पादन ६८% भाग मधेश से प्राप्त होता है। देश के कुल औद्योगिक उत्पादन में मधेश का योगदान ७२% हैं। मधेश नेपालका अन्न भण्डार कहने के साथ-साथ देश का आर्थिक मेरुदण्ड भी कहा जाता है। जबकि नेपाल के राजस्व में ७६% मधेश से प्राप्त होती है।
नेपाल का शासक वर्ग अक्टोपस की तरह मधेश अपनी खूनी शिंकजे में जकडे हुए हैं। नेपाल का शासक वर्ग मधेसियों का आर्थिक शोषण कर उन्हें सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक रुप से पिछडेÞपन की अवस्था में ही कायम रखना चाहता है। नेपाल के अर्थतन्त्र के विकास में मधेश क्षेत्र की अति महत्वपर्ूण्ा भूमिका होते हुए भी इस क्षेत्र के विकास कार्यक्रमों पर सरकार संकर्ीण्ा और उदासीन है। मधेश सम्पर्ूण्ा देश के अर्थतन्त्र का मेरुदण्ड है, इस क्षेत्र की उपेक्षा करके नेपाल के अर्थतन्त्र का विकास असंभव है।
राजनीतिक भेदभाव और समानता
नेपाल के सत्ताधारी अभिजात वर्ग ने सदा यह प्रयत्न किया है कि मधेशियों को नेपाल के सत्ता संचालन में उचित प्रतिनिधित्व कभी न मिले। चाहे वह सेना हो या पुलिस हो या प्रशासनिक सेवा, राष्ट्रीय विधायिका या मंत्रिपरिषद चाहे कोई भी निकाय हो।
समस्या समाधान उपाय
मानवीय सम्मान, स्वायत्त शासन, राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा आत्मनिर्ण्र्ााके अधिकार के लिए संघीय प्रणाली के अन्तरगत नेपाल के भीतर अलग ‘मधेश’ राज्य ‘मधेश प्रदेश’ अर्थात् स्वायत्त ‘मधेश प्रदेश’ की स्थापना।
समानुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर संसद सहित राज्य की सम्पर्ूण्ा शक्ति संरचना सेना, पुलिस ये मधेशी, दलित, महिला, जनजाति, अल्पसंख्यक समुदाय एवं विविध भाषा-भाषियों के समानुपातिक प्रतिनिधित्व की संवैधानिक व्यवस्था होनी चाहिए। समायोजन जनसंख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्र का पर्ुनर्गठन हो ताकि मधेशी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधि सभा अर्थात् संसद के प्रतिनिधित्व प्राप्त कर सकें। नेपाल में जाति, लिंग, भाषा, धर्म, क्षेत्र, पेशा, वर्ग, संस्कृति, सामाजिक समुदाय पर आधारित सम्पर्ूण्ा भेद-भाव को अन्त कर समानता, स्वतन्त्रता और सामाजिक न्याय भी स्थापना होना चाहिए।
-लेखक सद्भावना पार्टर्ीीी जनसर्म्पर्क विभाग प्रमुख है)

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